आधिकारिक संदर्भ (Official Reference): यह संपूर्ण तकनीकी गाइड भारतीय रेलवे के अनुसंधान अभिकल्प और मानक संगठन (RDSO) द्वारा जारी नवीनतम स्पेसिफिकेशन नंबर TM/HM/CSM/485 Rev. 03 (नवंबर 2021) के मानकों पर आधारित है।
09-32 CSM Track machine भारतीय रेलवे की रीढ़ है ,भारतीय रेलवे के इतिहास में 09-32 CSM Track Machine एक क्रांतिकारी तकनीक है। भारतीय रेलवे का विशाल नेटवर्क का विशाल नेटवर्क दुनिया के सबसे व्यस्त और घने रेल नेटवर्कों में से एक है। समय के साथ ट्रेनों की गति में वृद्धि, भारी एक्सल लोड (Heavy Axle Loads) और लगातार बढ़ते ट्रैफिक घनत्व के कारण रेलवे ट्रैक पर अत्यधिक तनाव और स्ट्रेस पैदा होता है। यह एक प्राकृतिक नियम है कि जब भी किसी इलास्टिक सिस्टम (जैसे रेल, स्लीपर, इलास्टिक फास्टनिंग्स और गिट्टी/बैलास्ट) पर से भारी वजन गुज़रता है, तो उसमें विकृति (Deformation) आती है।
यदि इस विकृति को समय रहते ठीक न किया जाए, तो ट्रैक की ज्यामिति (Track Geometry) खराब हो जाती है, जिससे ट्रेनों की सुरक्षा को खतरा हो सकता है और गति प्रतिबंध (Speed Restrictions) लगाने पड़ते हैं। इसी समस्या के समाधान और ट्रैक ज्यामिति के पूर्ण सुधार (Correction of Track Geometry) के लिए 09-32 CSM (Continuous Action Tamping Machine) का उपयोग किया जाता है। यह मशीन आधुनिक रेल इंजीनियरिंग का एक बेजोड़ उदाहरण है जो ट्रैक की लिफ्टिंग, lining, लेवलिंग और टैम्पिंग का काम पूरी सटीकता से करती है।
ट्रैक मशीनों का संक्षिप्त इतिहास (Brief History of Track Machines)
ट्रैक के रखरखाव को मशीनीकृत करने का सफर वैश्विक स्तर और भारतीय रेलवे दोनों के लिए बेहद दिलचस्प रहा है:
वैश्विक विकास (Global Development)
- 1920 का दशक: दुनिया में सबसे पहले मैकेनिकल ऑफ-ट्रैक टैम्पर (Off-Track Tamper) का परीक्षण किया गया, जो केवल पैकिंग का काम करता था।
- 1945: स्विट्जरलैंड की कंपनी MATISSA ने दुनिया का पहला ‘ऑन-ट्रैक टैम्पर’ (Model B-60) बनाया।
- 1953: ऑस्ट्रिया की प्रसिद्ध कंपनी Plasser & Theurer की स्थापना हुई, जिसने ऑस्ट्रियन फेडरल रेलवे के लिए पहला हाइड्रोलिक टैम्पर (HGL) विकसित किया।
- 1965: पहले डबल स्लीपर टैम्पर “Duomatic” की शुरुआत हुई।
- 1983: प्लासर एंड थ्यूरर ने क्रांतिकारी विचार पर काम करते हुए दुनिया की पहली कंटीन्यूअस एक्शन टैम्पिंग मशीन 09 CSM का निर्माण किया।
भारतीय रेलवे में आगमन (Introduction on Indian Railways)
भारतीय रेलवे में मशीनीकृत रखरखाव की शुरुआत मुख्य रूप से इस प्रकार हुई:
- B-60: यह भारत में आने वाली शुरुआती मशीनों में से थी, जो केवल टैम्पिंग का काम करती थी।
- 06-16 SLC: यह पहली सिंगल स्लीपर टैंपर मशीन थी, जो रुक-रुक कर काम करती थी।
- 08-32 Duomatic: भारतीय रेल में कार्य प्रगति बढ़ाने के लिए इस डबल स्लीपर टैम्पर को लाया गया।
- 09-32 CSM: भारतीय रेल के इतिहास में तकनीक का सबसे बड़ा लीप वर्ष वह था, जब पहली 09-32 CSM मशीन को सेवा में शामिल किया गया। इसने पूरी तकनीक को प्रोग्रामेबल Logic Control (PLC) के एक नए युग में प्रवेश कराया।
09-32 CSM के लिए आवश्यक वातावरणीय परिस्थितियाँ (Climatic Conditions)
RDSO के मानकों के अनुसार, यह हाई-स्पीड मशीन भारत के अत्यधिक धूल भरे और प्रतिकूल मौसम में भी निरंतर काम करने के लिए डिज़ाइन की गई है:
- तापमान की सीमा (Ambient Temperature): यह मशीन -5°C से लेकर 55°C तक के तापमान में कुशलता से काम कर सकती है।
- रेल का तापमान (Max Rail Temperature): पटरियों का तापमान जब 70°C तक पहुँच जाता है, तब भी यह मशीन काम करने में सक्षम है।
- मौसम की अनुकूलता: मशीन के सभी संवेदनशील और इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे एक मजबूत वेदर-प्रूफ छत/कवर से ढके होते हैं, जिससे भारी बारिश के दौरान भी काम नहीं रुकता।
- ऊंचाई (Altitude): यह समुद्र तल से 1750 मीटर तक की ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में भी बिना पावर लॉस के काम कर सकती है।
‘क्यों खास है CSM?’ – मूल कार्य सिद्धांत (The Core Concept: Why CSM?)
पुरानी मशीनें इंटरमिटेंट मोड (Intermittent Mode) यानी रुक-रुक कर काम करती थीं। उन मशीनों की सबसे बड़ी सीमा यह थी कि उन्हें हर एक स्लीपर को पैक करने के लिए पूरी मशीन को रोकना पड़ता था और पैकिंग के बाद फिर से आगे बढ़ाना पड़ता था। इससे निम्नलिखित समस्याएं होती थीं:
- कार्य उत्पादकता (Productivity) बहुत कम थी।
- बार-बार भारी मशीन को रोकने और चलाने से ड्राइविंग सिस्टम में टूट-फूट (Wear and Tear) बहुत अधिक होती थी।
- ऑपरेटर को लगातार झटके (Braking Jolts) लगते थे, जिससे उनका आराम प्रभावित होता था।
- पहियों के बार-बार फिसलने से पटरियों पर स्किडिंग मार्क्स (Skidding Marks) पड़ने का डर रहता था।
दो-भाग डिज़ाइन का जादू (The Two-Part Design Theory)
09-32 CSM Track Machine की अपार सफलता का रहस्य इसके दो-भागों में विभाजित ढांचे में छिपा है:
- मेन फ्रेम यूनिट (Main Frame Unit): इस मुख्य ढांचे पर इंजन, दोनों ड्राइविंग केबिन (फ्रंट और वर्किंग केबिन) और कंट्रोल पैनल फिट होते हैं। काम के दौरान यह मुख्य फ्रेम बिना रुके पटरी पर लगातार (Continuously) आगे बढ़ता रहता है। चूंकि केबिन मुख्य फ्रेम पर होते हैं, इसलिए ऑपरेटर को बार-बार ब्रेक लगने या चलने के झटके महसूस नहीं होते।
- सैटेलाइट फ्रेम यूनिट (Satellite Frame/Sub-Frame): यह एक छोटा सब-फ्रेम होता है जो मुख्य फ्रेम के नीचे लगा होता है और इसका अपना एक अलग एक्सेल (Satellite Axle) होता है। सभी मुख्य वर्किंग असेंबली जैसे- टैम्पिंग यूनिट, लिफ्टिंग-लाइनिंग यूनिट और ऑटो-ग्रीसिंग सिस्टम इसी सैटेलाइट फ्रेम पर लगे होते हैं। जब मुख्य फ्रेम लगातार आगे बढ़ रहा होता है, तब यह सैटेलाइट यूनिट स्लीपर-दर-स्लीपर (Cyclic mode) रुककर लिफ्टिंग, लाइनिंग और टैम्पिंग का काम तेजी से निपटाती है और फिर अगले स्लीपर पर जंप कर जाती है।
इस क्रांतिकारी तकनीक के कारण मशीन की कार्य क्षमता (Work Capacity) सीधे 50% बढ़ जाती है और यह 2200 से 2400 स्लीपर प्रति घंटे की बेजोड़ गति से काम कर सकती है।
भाग 2: तकनीकी पैरामीटर्स और ओल्ड बनाम न्यू CSM का तुलनात्मक विश्लेषण
09-32 CSM मशीन की कार्यप्रणाली को पूरी गहराई से समझने के लिए इसके भौतिक आयामों (Physical Parameters) और समय के साथ आए तकनीकी बदलावों को जानना आवश्यक है। भारतीय रेलवे पर वर्तमान में काम कर रही CSM मशीनों को उनकी निर्माण अवधि और तकनीकी अपग्रेड के आधार पर मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है: ओल्ड (Old) CSM और न्यू (New) CSM।
भौतिक और सामान्य तकनीकी पैरामीटर्स (Physical Parameters)
मशीन की डिज़ाइन और इसकी क्षमताओं को समझने के लिए निम्नलिखित सामान्य तकनीकी डेटा बेहद महत्वपूर्ण हैं:
- बफ़र्स के ऊपर कुल लंबाई (Overall Length): 20670 mm
- रेल स्तर से कुल ऊँचाई (Overall Height): न्यू CSM में इसे बढ़ाकर 3895 mm किया गया है (जबकि ओल्ड CSM में यह 3600 mm थी)।
- कुल चौड़ाई (Overall Width): न्यू CSM में यह 3140 mm है (ओल्ड CSM में यह 3040 mm थी)।
- पहियों का व्यास (Wheel Diameter): नया पहिया 730 mm का होता है, जो पूरी तरह से फोर्ज़्ड फुल डिस्क (Forged Full Disc) डिज़ाइन में आता है।
- ट्रैक गेज (Track Gauge): 1676 mm (भारतीय रेलवे का ब्रॉड गेज)
- सेंटर पिन दूरी / बोगी पिवट स्पेसिंग (Centre Pin Distance): 13700 mm
- बोगी व्हीलबेस (Bogie Wheel Base): 1830 mm (न्यू CSM) / 1800 mm (ओल्ड CSM)
- मशीन का कुल वजन (Total Weight): लगभग 56 से 64 टन (विभिन्न मॉडलों के आधार पर)
- न्यूनतम वर्किंग रेडियस (Minimum Working Radius): न्यू CSM को न्यूनतम 175 मीटर के घुमाव (Curve) पर काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जबकि ओल्ड CSM 100 मीटर के रेडियस पर भी काम कर सकती थी।
- अधिकतम यात्रा गति (Maximum Permissible Travelling Speed):
- स्व-चालित (Self-propelled): 80 से 95 किमी प्रति घंटा (केबिन ड्राइविंग सुविधाओं के अनुसार)
- ट्रेन फॉर्मेशन में (Towed): 100 किमी प्रति घंटा
- आरडीएसओ (RDSO) द्वारा स्वीकृत गति: 60 किमी प्रति घंटा
संशोधित तकनीकी पैरामीटर्स
RDSO और मूल निर्माता (Plasser & Theurer) के आधिकारिक मानकों के अनुसार, 09-32 CSM मशीन के भौतिक आयामों और क्षमताओं का सटीक डेटा निम्नलिखित है:
- नया पहिया व्यास (New Wheel Diameter): मशीन का नया फोर्ज़्ड फुल डिस्क पहिया 730 mm का होता है।
- घिसा हुआ पहिया व्यास (Condemning Limit): पहिया पूरी तरह घिस जाने के बाद (वियर होने पर) इसका न्यूनतम व्यास 680 mm से 700 mm की स्वीकृत सीमा के भीतर होना चाहिए (ताकि यह रेल स्ट्रेस नियमों का पालन कर सके)।
- न्यूनतम ग्राउंड क्लीयरेंस (Minimum Clearance): पहिया अपनी अंतिम घिसावट सीमा पर होने के बावजूद, मशीन का कोई भी पार्ट रेल स्तर से 91 mm से नीचे नहीं आना चाहिए।
- एक्सेल लोड (Axle Load): भारतीय रेल के ब्रॉड गेज (1676 mm) पर काम करते समय इसका अधिकतम एक्सेल लोड 15 टन से 20.32 टन के बीच (विभिन्न मॉडलों के अनुसार) होता है। प्रति मीटर लोड 7.67 टन से अधिक नहीं होना चाहिए।
- मोड़ और ढाल पर क्षमता (Negotiability): यात्रा मोड में यह मशीन अधिकतम 10° के तीव्र मोड़ (175 मीटर रेडियस), 185 mm सुपर-एलिवेशन और 3% (1 in 33) तक के भारी ढाल/ग्रेडिएंट को आसानी से पार कर सकती है।
- मशीन का रंग और कोटिंग: मशीन की पूरी बॉडी को गोल्डन येलो (Golden Yellow – IS Colour Code 356) रंग में रंगना अनिवार्य है, जिसके लिए पॉलीयूरेथेन (Polyurethane) आधारित पेंट सिस्टम का उपयोग किया जाता है।
ओल्ड CSM और न्यू CSM में मुख्य अंतर (Difference Between Old and New CSM)
तकनीकी रूप से न्यू CSM को पुरानी मशीनों के मुकाबले कहीं अधिक संवेदनशील, ऑटोमैटिक और रखरखाव में आसान बनाया गया है। नीचे दी गई तालिका इन दोनों मॉडलों के बीच के मुख्य अंतरों को स्पष्ट करती है:
| क्र.सं. | विवरण (Description) | ओल्ड CSM (Old CSM) | न्यू CSM (New CSM) |
|---|---|---|---|
| 1 | इंजन मॉडल (Engine Model) | KTA-1150-L या MWM TBD 232V12 | KTA-19-L (ज्यादा आधुनिक और कुशल) |
| 2 | प्रोग्रामर सिस्टम (Programmer System) | P500 सिस्टम | P600 सिस्टम |
| 3 | कंप्यूटर मापन प्रणाली (CMS) | उपलब्ध नहीं (-NA-) | पूर्ण रूप से उपलब्ध (Available) |
| 4 | स्वचालित गाइडिंग कंप्यूटर (ALC) | उपलब्ध नहीं (-NA-) | पूर्ण रूप से उपलब्ध (Available) |
| 5 | एसपीएस डायग्नोसिस (SPS Diagnosis) | उपलब्ध नहीं (-NA-) | पूर्ण रूप से उपलब्ध (Available) |
| 6 | अल्टरनेटर ड्राइव (Alternator Drive) | केवल बेल्ट संचालित (Belt driven) | बेल्ट एवं हाइड्रोलिक मोटर संचालित |
| 7 | अल्टरनेटर प्रकार (Alternator Type) | 28V/55A के 2 नंबर्स | 28V/55A के 2 नंबर्स + 28V/120A का 1 नंबर |
| 8 | रेल क्लैंप कंट्रोल सिस्टम | फ्रंट और रियर संयुक्त कंट्रोल | प्रत्येक रोलर के लिए व्यक्तिगत (Individual) कंट्रोल |
| 9 | सैटेलाइट लेटरल मूवमेंट | लिमिट स्विच द्वारा नियंत्रित | पीसीबी (PCB) द्वारा पूरी तरह नियंत्रित |
| 10 | इनडायरेक्ट ब्रेकिंग (Indirect Braking) | उपलब्ध नहीं (-NA-) | उपलब्ध (कैंपिंग कोच टो करने के लिए सुरक्षित) |
| 11 | वर्किंग ड्राइव ब्रेक (Work Drive Brake) | उपलब्ध नहीं (-NA-) | हाइड्रोलिक कंट्रोल ब्रेक उपलब्ध |
| 12 | हाइड्रोलिक पंपों की संख्या | 05 नंबर्स | 04 नंबर्स (सिस्टम को सरल बनाया गया) |
| 13 | हाइड्रोलिक मोटरों की संख्या | 08 नंबर्स | 09 नंबर्स |
| 14 | सिस्टम एक्युमुलेटर (Accumulator) | 01 नंबर | 02 नंबर्स (प्रेशर स्थिरता के लिए) |
| 15 | मल्टी-चैनल रिकॉर्डर | उपलब्ध नहीं (-NA-) | डेटा एक्विजिशन रिकॉर्डर (Data Acquisition Recorder) |
| 16 | सेंट्रलाइज्ड लुब्रिकेशन सिस्टम | उपलब्ध नहीं (-NA-) | पूर्ण रूप से उपलब्ध (स्वचालित ग्रीसिंग) |
| 17 | इलेक्ट्रिकली ऑपरेटेड इमरजेंसी पंप | उपलब्ध नहीं (-NA-) | बैकअप सिस्टम के लिए उपलब्ध |
मुख्य असेंबलियाँ और उनके कार्य (Major Assemblies)
09-32 CSM मशीन कई प्रकार की मैकेनिकल, हाइड्रोलिक और इलेक्ट्रिकल प्रणालियों का एक जटिल मिश्रण है। इसके सुचारू संचालन के लिए निम्नलिखित असेंबलियाँ मुख्य भूमिका निभाती हैं:
- प्राइम मूवर (इंजन): मशीन के मुख्य ढांचे पर वाटर-कूल्ड डीजल इंजन फिट होता है, जो लगभग 473 BHP की रेटेड पावर जेनरेट करता है। यह ड्राइविंग और वर्किंग दोनों मोड के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत है।
- ZF हाइड्रोडायनामिक गियर बॉक्स: यह 4-स्पीड गियर बॉक्स है जो पूरी तरह से इलेक्ट्रिकल कंट्रोल द्वारा संचालित होता है। यह इंजन से सीधे इनपुट पावर लेता है और ट्रैवलिंग के दौरान कार्डन शाफ्ट के माध्यम से ड्राइविंग एक्सेल को पावर ट्रांसफर करता है।
- फंक गियर बॉक्स (Pump Distributor Gear Box): यह इंजन से सीधे जुड़ा होता है। वर्किंग मोड के दौरान यह हाइड्रोलिक पंपों को रोटेशनल पावर देता है, जिससे पूरे सिस्टम के लिए हाइड्रोलिक प्रेशर जेनरेट होता है।
- सैटेलाइट एक्सेल और बोगी: मशीन में कुल 4 मुख्य एक्सेल (2 ड्राइविंग और 2 रनिंग) होते हैं जो मेन फ्रेम में लगे होते हैं। इनके अलावा सैटेलाइट फ्रेम का अपना एक अलग एक्सेल होता है जो काम के दौरान स्लीपर-दर-स्लीपर मूवमेंट में मदद करता है।
भाग 3: टैम्पिंग यूनिट, लिफ्टिंग-लाइनिंग गियर और क्वालिटी कंट्रोल पैरामीटर्स
09-32 CSM मशीन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसका वर्किंग गियर है, जो सीधे ट्रैक के संपर्क में आकर उसकी ज्यामिति को सुधारता है। यह सभी असेंबलियाँ मशीन के सैटेलाइट फ्रेम (Sub-Frame) पर लगी होती हैं, जिससे मेन फ्रेम के लगातार चलने के बावजूद ये पूरी सटीकता से अपना काम कर पाती हैं।
टैम्पिंग यूनिट का गहन विश्लेषण (Tamping Unit Details)
टैम्पिंग का मुख्य उद्देश्य स्लीपरों के नीचे गिट्टी (Ballast) को समान रूप से संकुचित (Compact) करना है ताकि ट्रैक को पर्याप्त असर क्षमता (Bearing Capacity) और स्थिरता मिल सके।
- टूल्स और संरचना: इस मशीन में कुल 2 टैम्पिंग यूनिट्स (एक बाईं और एक दाईं ओर) होती हैं। इसमें कुल 32 टैम्पिंग टूल्स (Tamping Tines) लगे होते हैं, जिसके कारण यह एक बार में दो स्लीपरों को एक साथ पैक कर सकती है।
- वाइब्रेशन शाफ्ट और मोटर्स: प्रत्येक यूनिट में 2 वाइब्रेशन शाफ्ट होते हैं और प्रत्येक शाफ्ट पर 11 बेयरिंग्स लगे होते हैं। कंपन को टूल्स तक ट्रांसफर करने के लिए 2 शक्तिशाली हाइड्रोलिक वाइब्रेशन मोटर्स का इस्तेमाल किया जाता है।
- असिंक्रोनस समान दबाव सिद्धांत (Asynchronous Equal Pressure Principle): यह मशीन पूरी तरह से इस सिद्धांत पर काम करती है। इसका मतलब है कि सभी टैम्पिंग टूल्स गिट्टी के भीतर उसकी प्रतिरोधक क्षमता (Resistance) के अनुसार स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ते हैं। टूल्स तब तक स्क्वीज़िंग (दबाव) जारी रखते हैं जब तक कि पहले से निर्धारित सटीक टैम्पिंग प्रेशर प्राप्त नहीं हो जाता, चाहे उनके द्वारा तय की गई दूरी कुछ भी हो।
कट्टेड टैम्पिंग टूल्स की आवश्यकता (Need for Cut Tamping Tools)
डबल स्लीपर टैम्पिंग असेंबली में दोनों स्लीपरों के बीच की जगह बहुत कम होती है, जिससे अंदरूनी छोटे आर्म्स (Small Arms) के टैम्पिंग टूल्स के आपस में टकराने (Infringement) का गंभीर खतरा रहता है।
- इस टकराव से बचने के लिए छोटे आर्म्स के टूल बोर की सेंटर लाइन को थोड़ा शिफ्ट (विस्थापित) किया जाता है।
- सेंटर लाइन शिफ्ट होने से स्क्वीज़िंग एक्शन (Squeezing Action) टेढ़ा होने लगता है। उसे दोबारा एक सीधी रेखा में रखने के लिए छोटे आर्म्स में विशेष कट्टेड टैम्पिंग टूल्स (Cut Tamping Tools) का उपयोग किया जाता है।
- आकार का अंतर: सामान्य मानक टूल ब्लेड का आकार 70mm × 140mm होता है, जबकि आवश्यकता और स्थिति के अनुसार कट्टेड टूल्स का आकार 70mm × 110mm या 70mm × 90mm रखा जाता है।
लिफ्टिंग और लाइनिंग यूनिट (Lifting and Lining Unit)
ट्रैक के क्रॉस लेवल (Cross Level), लोंगिट्यूडिनल लेवल (Longitudinal Level) और अलाइनमेंट (Alignment) को सुधारने के लिए यह यूनिट सर्वो वाल्व (Servo Valves) और हाइड्रोलिक सिलेंडरों की मदद से काम करती है।
- ट्रैक लिफ्टिंग (Lifting): पटरी को ऊपर उठाने के लिए यूनिट के प्रत्येक तरफ 4 डिस्क क्लैंप रोलर्स (Disc Clamp Rollers) लगे होते हैं। ये रोलर्स हाइड्रोलिक रेल क्लैंप सिलेंडर की मदद से पटरी को मजबूती से पकड़ते हैं और सर्वो वाल्व के नियंत्रण में ट्रैक को वांछित ऊंचाई तक उठाते हैं।
- ट्रैक लाइनिंग (Lining/Slewing): ट्रैक के अलाइनमेंट (सीधेपन) को ठीक करने के लिए प्रत्येक तरफ 2 लाइनिंग रोलर्स (Lining Rollers) दिए गए हैं।
- स्पेशल वाल्व कंट्रोल: ट्रैक लिफ्टिंग के लिए 2 सर्वो वाल्व और लाइनिंग के लिए 1 सर्वो वाल्व का उपयोग किया जाता है। टैम्पिंग यूनिट को ऊपर-नीचे करने के लिए 2 प्रोपोर्शनल वाल्व और सैटेलाइट मूवमेंट के लिए 1 प्रोपोर्शनल वाल्व काम करता है।
ट्रैक गुणवत्ता नियंत्रण पैरामीटर्स (Quality Control Parameters)
काम के बाद ट्रैक की बेहतरीन मजबूती और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित मानकों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:
- बैलास्ट कुशन (Ballast Cushion): मशीन के उचित और सुरक्षित संचालन के लिए स्लीपर के नीचे कम से कम 150 mm का साफ गिट्टी का कुशन होना अनिवार्य है।
- स्लीपर के अनुसार टैम्पिंग (Squeezing) प्रेशर: गिट्टी को दबाने का प्रेशर स्लीपर के प्रकार पर निर्भर करता है:
- PSC (कंक्रीट) स्लीपर: 110 से 120 kg/sq.cm (प्लेन ट्रैक के लिए)
- ST या लकड़ी (Wooden) का स्लीपर: 100 से 110 kg/sq.cm
- CST-9 स्लीपर: 90 से 100 kg/sq.cm
- सिस्टम और वाइब्रेशन प्रेशर: मुख्य हाइड्रोलिक सिस्टम का प्रेशर 120-140 kg/sq.cm और वाइब्रेशन प्रेशर 150 kg/sq.cm पर सेट होना चाहिए।
- टूल वियर और गहराई (Tool Wear & Depth): टैम्पिंग यूनिट में कोई भी टूल गायब नहीं होना चाहिए। यदि टूल का ब्लेड 20% से अधिक घिस चुका है, तो उसे तुरंत बदला जाना चाहिए। टूल की सटीक गहराई का फॉर्मूला है:
स्लीपर की ऊंचाई + रबर पैड + रेल की ऊंचाई + 10 से 12 mm। - स्क्वीज़िंग टाइम (Squeezing Time): आदर्श स्क्वीज़िंग समय 0.8 सेकंड से 1.2 सेकंड होना चाहिए। नए ट्रैक के लिए निचली सीमा (0.8 सेकंड) और पुराने रखरखाव वाले ट्रैक के लिए ऊपरी सीमा (1.2 सेकंड) का उपयोग बेहतर परिणाम देता है।
- वाइब्रेशन फ़्रीक्वेंसी और एम्पलीट्यूड: सर्वोत्तम संघनन के लिए वाइब्रेशन की फ़्रीक्वेंसी 33-35 Hz और आयाम (Amplitude) 3-5 mm होना चाहिए। 35 Hz से अधिक फ़्रीक्वेंसी पर गिट्टी का “तरलीकरण” (Liquefaction) होने लगता है और वह बह जाती है।
- जनरल लिफ्ट (General Lift): सामान्य परिस्थितियों में ट्रैक को लिफ्ट देने का अनुपात 1:1000 के रैंप में होना चाहिए।
RDSO के अनुसार अचीवेबल ट्रैक टॉलरेंस (Track Geometry Tolerances)
मशीन द्वारा अलाइनमेंट और लेवलिंग का काम पूरा होने के बाद, ट्रैक पर निम्नलिखित सटीक ज्यामितीय सीमाएं (Tolerances) हासिल होनी अनिवार्य हैं:
| ट्रैक पैरामीटर (Parameters) | RDSO स्वीकृत मानक सीमा (Achievable Tolerance) |
|---|---|
| अनइवननेस (Unevenness) | ± 1 mm (3.6 मीटर कॉर्ड लेंथ पर) |
| क्रॉस लेवल (Cross Level) | ± 1 mm (सपाट और मोड़ों पर) |
| अलाइनमेंट (Alignment) | ± 2 mm (7.2 मीटर कॉर्ड लेंथ पर) |
| ट्विस्ट (Twist) | 1 mm/m (3.0 मीटर बेस पर) |
कार्य उत्पादकता की नई सीमाएं (Output Capabilities)
- पीक आउटपुट (Peak Output): ट्रैफिक ब्लॉक के दौरान यह मशीन कम से कम 10 मिनट के निरंतर ब्लॉक में 2600 स्लीपर प्रति घंटा की अधिकतम (Peak) रफ्तार से पैकिंग कर सकती है।
- औसत आउटपुट (Average Output): कार्य स्थल पर काम शुरू होने से लेकर खत्म होने तक, मशीन का औसतन आउटपुट 2000 स्लीपर प्रति घंटा होना चाहिए।
भाग 4: लाइनिंग सिस्टम का संपूर्ण कार्य सिद्धांत (The Core Mechanics of Lining System)
ट्रैक का अलाइनमेंट (Alignment) यानी उसका सीधापन या वक्रता (Curvature) ट्रेनों की सुरक्षित और तेज गति के लिए सबसे आवश्यक तत्वों में से एक है। 09-32 CSM मशीन में ट्रैक के अलाइनमेंट को सुधारने के लिए एक बेहद उन्नत और संवेदनशील हाइड्रोलिक-इलेक्ट्रॉनिक अलाइनमेंट सिस्टम होता है जिसे लाइनिंग सिस्टम कहा जाता है।
इस सिस्टम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल एक पटरी (जिसे डेटम रेल या बेस रेल कहा जाता है) के खिलाफ सभी त्रुटियों को मापता है और उसे पूरी तरह से ठीक करता है। चूंकि दोनों पटरियां स्लीपरों के माध्यम से आपस में दृढ़ता से बंधी होती हैं, इसलिए जब बेस रेल पूरी तरह सीधी या सही ज्यामिति में आ जाती है, तो दूसरी रेल स्वचालित रूप से अपनी सही स्थिति में आ जाती है। यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि यह मशीन केवल अलाइनमेंट सुधारती है, यह ट्रैक गेज (दोनों पटरियों के बीच की दूरी) की गड़बड़ियों को ठीक नहीं करती।
सिंगल कॉर्ड लाइनिंग सिस्टम की संरचना (Single Chord Lining System)
09-32 CSM मशीन में सिंगल कॉर्ड लाइनिंग सिस्टम का उपयोग किया जाता है। पुराने समय में डबल कॉर्ड प्रणालियां आती थीं जो अब व्यावहारिक रूप से बंद हो चुकी हैं। इस आधुनिक सिस्टम की बनावट और कार्यप्रणाली निम्नलिखित स्तंभों पर टिकी है:
- स्टील कॉर्ड वायर (Chord Wire): मशीन के नीचे एक विशेष स्टील वायर (तनावग्रस्त तार) लगा होता है। इस तार को न्यूमैटिक प्रेशर (हवा के दबाव) की मदद से दोनों सिरों पर पूरी तरह से कसकर और खींचकर (Pneumatically Tensioned) रखा जाता है। यह तार ही मशीन के लिए ‘संदर्भ रेखा’ (Reference Line) का काम करता है।
- सेंसिंग ट्रॉलियां (Sensing Trolleys): पटरी की वास्तविक स्थिति को लगातार भांपने के लिए पहियों वाली विशेष ट्रॉलियां लगी होती हैं। इन ट्रॉलियों को न्यूमैटिक सिलेंडरों की मदद से हमेशा डेटम रेल के खिलाफ दबाकर (Pressed against Datum Rail) रखा जाता है, ताकि पटरी का थोड़ा सा भी घुमाव सीधे पकड़ में आ सके।
- फॉर्क और ट्रांसड्यूसर (Fork & Transducers): स्टील कॉर्ड वायर के ऊपर विशेष कांटेदार फॉर्क (Forks) लगे होते हैं जो सीधे लाइनिंग ट्रांसड्यूसर से जुड़े होते हैं। जैसे ही पटरी में कोई मोड़ आता है, ट्रॉली हिलती है और फॉर्क के जरिए ट्रांसड्यूसर को सिग्नल मिलता है कि पटरी अपनी सही जगह से कितनी दूर है।
लाइनिंग की मुख्य विधियाँ (Methods of Lining)
सिंगल कॉर्ड लाइनिंग सिस्टम मुख्य रूप से दो गणितीय और ज्यामितीय सिद्धांतों पर काम करता है:
1. 4-पॉइंट लाइनिंग विधि (4-Point Lining Method)
इस विधि में मशीन के भीतर बंद रहने वाली चौथी ट्रॉली को भी बाहर खोल दिया जाता है, जिससे कॉर्ड की कुल लंबाई बढ़ जाती है। अब मशीन के पास ट्रैक को मापने और सुधारने के लिए चार बिंदु (A, B, C और D) उपलब्ध होते हैं।
- बिंदु A (Rear Bogie): यह सबसे पीछे की ट्रॉली है जो पहले से ठीक किए जा चुके (Corrected Track) हिस्से पर खड़ी होती है।
- बिंदु B (Measuring Bogie): यह बीच की मापन ट्रॉली है जो ठीक हो चुके ट्रैक के ठीक आगे की स्थिति को मापती है।
- बिंदु C (Lining Bogie): यह वह वास्तविक कार्य बिंदु है जहाँ हाइड्रोलिक सिलेंडर पटरी को धक्का देकर ठीक कर रहे होते हैं।
- बिंदु D (Front Bogie): यह सबसे आगे की ट्रॉली है जो अभी अन-अटेंडेड यानी खराब ट्रैक पर चल रही होती है।
- कार्य सिद्धांत (Principle): यह विधि इस सिद्धांत पर काम करती है कि यदि हम एक निश्चित लंबाई की कॉर्ड पर दो निश्चित स्थानों पर वर्साइन (Versine – पटरी का झुकाव/मोड़) मापते हैं, तो एक आदर्श वृत्ताकार वक्र (Circular Curve) या पूरी तरह से सीधे ट्रैक (Straight Track) पर उन दोनों वर्साइन का अनुपात (\(H_1 / H_2\)) हमेशा स्थिर (Constant) रहता है।
- मशीन बिंदु B पर वास्तविक वर्साइन (\(H_{2}\)) को मापती है और उसके आधार पर बिंदु C के लिए सैद्धांतिक वर्साइन (\(H_{1}\)) की गणना करती है। यदि वास्तविक मान और सैद्धांतिक मान में अंतर होता है, तो लाइनिंग सिलेंडर काम करना शुरू कर देते हैं।
2. 3-पॉइंट लाइनिंग विधि (3-Point Lining Method)
इस विधि में चौथी ट्रॉली को अंदर ही मोड़कर बंद रखा जाता है। अब केवल तीन बिंदु (B, C और D) ही काम में आते हैं। यहाँ संदर्भ तार बिंदु B (मेज़रिंग ट्रॉली) और बिंदु D (फ्रंट ट्रॉली) के बीच कड़ा खींचा जाता है।
- कार्य सिद्धांत (Principle): यह इस सीधे सिद्धांत पर काम करती है कि एक निश्चित रेडियस वाले मोड़ पर या सीधे ट्रैक पर, एक निश्चित कॉर्ड लंबाई के बीच का वर्साइन हमेशा एक समान और स्थिर (Constant) होना चाहिए। सीधे ट्रैक के लिए यह मान शून्य (Zero) होता है और मोड़ों के लिए इसकी गणना एक विशेष फॉर्मूले द्वारा की जाती है:
\(\text{Versine\ }(H)=\frac{BC\times CD\times 1000}{2R}\)
(जहाँ BC और CD ट्रॉलियों के बीच की दूरी मीटर में हैं और R मोड़ का रेडियस है।) - इस विधि में जो भी सैद्धांतिक मान आता है, उसे फ्रंट केबिन में ऑपरेटर द्वारा सीधे फीड कर दिया जाता है, और मशीन बिंदु C पर पटरी को तब तक पुश करती है जब तक कि वहां का वास्तविक वर्साइन इस फीड किए गए मान के बराबर न हो जाए।
लाइनिंग के कार्य मोड (Modes of Working)
चाहे 3-पॉइंट विधि हो या 4-पॉइंट विधि, दोनों में काम करने के दो अलग-अलग तरीके या मोड होते हैं:
अ. स्मूदनिंग मोड (Smoothening Mode)
यह मोड तब चुना जाता है जब ट्रैक की मौजूदा स्थिति कुल मिलाकर संतोषजनक होती है, लेकिन उसमें छोटे-मोटे झटके या मामूली खामियां होती हैं।
- इस मोड में मशीन पटरी के बड़े दोषों को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाती, बल्कि उन्हें एक बड़े हिस्से में फैलाकर “स्मूथ” (चिकना या कम झटका देने वाला) बना देती है।
- चूंकि इस मोड में फ्रंट ट्रॉली (बिंदु D) हमेशा खराब ट्रैक पर चल रही होती है, इसलिए वहां की त्रुटि (\(F_{D}\)) पूरी तरह समाप्त नहीं होती। मशीन में एक ‘त्रुटि कमी अनुपात’ (Error Reduction Ratio – \(n\)) होता है। काम के बाद ट्रैक पर एक मामूली अवशिष्ट त्रुटि (Residual Error) बच जाती है, जिसका मान \(\frac{F_{D}}{n}\) होता है। ओल्ड CSM में 3-पॉइंट के लिए इस अनुपात का मान 3.14 होता है।
- सीधे ट्रैक पर स्मूदनिंग मोड के लिए हमेशा 3-पॉइंट विधि का उपयोग किया जाता है क्योंकि वहां वर्साइन की गणना की आवश्यकता नहीं होती (यह शून्य होता है)। मोड़ों पर यदि उनकी ज्यामिति अज्ञात हो, तो 4-पॉइंट विधि का उपयोग किया जाता है।
ब. डिज़ाइन मोड (Design Mode / Precision Mode)
जब ट्रैक को उसकी मूल और बिल्कुल सटीक ज्यामिति (Ideal Alignment) में वापस लाना होता है, तब डिज़ाइन मोड का चयन किया जाता है।
- इस मोड में काम शुरू करने से पहले रेल इंजीनियरों द्वारा ट्रैक का गहन सर्वे (Track Survey) किया जाता है। प्रत्येक स्टेशन या खंभे पर पटरी को दाईं या बाईं ओर कितना खिसकाना है (उसे स्लेव या स्लू वैल्यू – Slew/Offset Value कहते हैं), इसकी गणना अग्रिम रूप से कर ली जाती है।
- इन गणना किए गए मानों को स्लीपरों के ऊपर उनके खिसकाने की दिशा के साथ लिख दिया जाता है।
- जब मशीन काम करती है, तो जेई या एसएसई फ्रंट केबिन में बैठकर उन लिखे हुए मानों को स्लू पोटेंशियोमीटर (Slew Potentiometer) की मदद से मशीन में फीड करते जाते हैं। मशीन इन मानों को बढ़ाती है और फ्रंट ट्रॉली के दोष के ठीक बराबर और विपरीत दबाव बनाकर बिंदु C पर शत-प्रतिशत त्रुटिहीन डिज़ाइन ज्यामिति स्थापित कर देती है।
स. लेज़र मोड (LASER Mode)
यह भी डिज़ाइन मोड का ही एक अत्यंत आधुनिक रूप है। इसमें किसी अग्रिम बड़े सर्वे की आवश्यकता नहीं होती। मशीन के आगे एक अलग ट्रॉली पर लेज़र ट्रांसमीटर (Transmitter) फिट कर दिया जाता है जो एक सीधी लेज़र बीम छोड़ता है। मशीन की फ्रंट ट्रॉली पर लगा रिसीवर (Receiver) इस बीम को पकड़ता है और पटरी के खिसकाव (Offset) की गणना पूरी तरह स्वचालित रूप से करके मशीन को सिग्नल भेजता है। यह तकनीक बहुत ही कम मशीनों में उपलब्ध होती है।
ट्रांजिशन कर्व और वर्साइन मुआवजा (Transition Curve & Versine Compensation)
जब एक सीधा ट्रैक अचानक किसी तीव्र मोड़ (Circular Curve) में बदलता है, तो उसके बीच में एक घूमता हुआ हिस्सा दिया जाता है जिसे ट्रांजिशन कर्व कहते हैं। इस हिस्से में पटरी का रेडियस लगातार बदल रहा होता है, इसलिए वर्साइन का मान भी हर कदम पर बदलता है।
- ऐसी स्थिति में स्वचालित अनुपात काम नहीं कर पाता। इसके लिए मशीन में वर्साइन मुआवजा (Versine Compensation – \(V\) और \(V_{m}\)) की व्यवस्था की गई है।
- जब मशीन ट्रांजिशन कर्व में प्रवेश करती है, तो ऑपरेटर फ्रंट केबिन में लगे वर्साइन पोटेंशियोमीटर की मदद से धीरे-धीरे सुधार मान (\(V\)) देना शुरू करता है। जब मशीन पूरी तरह से ट्रांजिशन में आ जाती है, तो यह मान अपने अधिकतम स्तर (\(V_{m}\)) पर पहुँच जाता है।
- अधिकतम वर्साइन मुआवजे की गणना इस फॉर्मूले से की जाती है:
\(V_{m}=\frac{AC\times CD\times BC\times 1000}{6RL}\)
(जहाँ \(R\) सर्कुलर कर्व का रेडियस है और \(L\) ट्रांजिशन कर्व की कुल लंबाई है।) - इन मानों को आसानी से सेट करने के लिए मशीन के साथ विशेष संदर्भ तालिकाएँ (Tables) दी जाती हैं, जिनसे मान देखकर पोटेंशियोमीटर को घुमाया जाता है।
भाग 5: लेवलिंग और लिफ्टिंग सिस्टम का संपूर्ण कार्य सिद्धांत (Core Mechanics of Levelling & Lifting System)
ट्रैक का अलाइनमेंट (सीधापन) सुधारने के बाद सबसे महत्वपूर्ण कार्य ट्रैक के ऊर्ध्वाधर प्रोफाइल (Vertical Profile) को दुरुस्त करना होता है। इसमें रेल की ऊँचाई-निचाई, दोनों पटरियों के बीच का आपसी झुकाव और मोड़ पर दिया जाने वाला ढाल शामिल हैं। 09-32 CSM मशीन में इस कार्य को अंजाम देने के लिए एक अत्यंत संवेदनशील और सटीक हाइड्रोलिक-इलेक्ट्रॉनिक प्रोपोर्शनल लेवलिंग और लिफ्टिंग सिस्टम दिया गया है।
यह सिस्टम मुख्य रूप से तीन प्रकार के ज्यामितीय दोषों को एक साथ ठीक करता है:
- लोंगीट्यूडिनल लेवल (Longitudinal Level): एक ही पटरी पर लंबाई में आने वाले उतार-चढ़ाव या गढ्ढों को दूर करना।
- क्रॉस लेवल (Cross Level): एक ही स्लीपर पर मौजूद दोनों पटरियों के शीर्ष स्तर (Top Level) को एक-दूसरे के सापेक्ष बिल्कुल सही और समानांतर बनाए रखना।
- ट्विस्ट (Twist): बहुत ही कम दूरी के भीतर क्रॉस लेवल में आने वाले अचानक बदलाव को रोकना, जिससे ट्रेनों के डिरेल (पटरी से उतरने) होने का खतरा टल जाता है।
लेवलिंग सिस्टम की बनावट और संदर्भ बिंदु (Structural Reference Points)
मशीन जब पटरी पर खड़ी होकर काम करती है, तो वह हवा में तैरती हुई स्थिति (Floating Condition) में तीन मुख्य क्षेत्रों से ट्रैक के स्तरों को लगातार मापती है:
- लोकेशन F (Front Tower / Front Feeler): यह सबसे आगे का टावर होता है जो अभी तक अन-अटेंडेड यानी उबड़-खाबड़ और खराब ट्रैक पर चल रहा होता है। यह बिंदु आगे के वास्तविक स्तर (Actual Level) को भांपकर मशीन के लिए ‘अग्रिम संदर्भ बिंदु’ (Front Reference Point) तैयार करता है।
- लोकेशन M (Middle Tower / Measuring Point): यह मशीन का मुख्य कार्य स्थल है जहाँ टैम्पिंग और लिफ्टिंग यूनिट लगी होती हैं। यहाँ पर लगा सिस्टम हाइड्रोलिक लिफ्टिंग सिलेंडरों को आनुपातिक रूप से (Proportionally) नियंत्रित करता है ताकि पटरी को सही ऊंचाई तक उठाया जा सके।
- लोकेशन R (Rear Tower / Rear Measuring Point): यह मशीन का सबसे पिछला हिस्सा होता है जो ठीक हो चुके (Corrected Fault-Free Track) हिस्से पर खड़ा होता है। यह मशीन के लिए ‘स्थिर और शुद्ध संदर्भ बिंदु’ (Rear Measuring Reference Point) का काम करता है।
वर्किंग मैकेनिज्म (Working Mechanism)
मशीन की न्यूमैटिक प्रणाली (हवा के दबाव) द्वारा दोनों पटरियों के ठीक ऊपर लोकेशन ‘F’ से लेकर लोकेशन ‘R’ के बीच दो स्वतंत्र स्टील तारों (Levelling Chords) को पूरी तरह से तानकर (Tightened) रखा जाता है। ये दोनों तार ही लोंगिट्यूडिनल लेवल को मापने के लिए मुख्य आधार रेखा का निर्माण करते हैं।
ऊंचाई ट्रांसड्यूसर और इलेक्ट्रॉनिक पेंडुलम (Transducers & Pendulums)
तारों के इस जाल और पटरियों के वास्तविक अंतर को डिज़िटल संकेतों में बदलने के लिए दो मुख्य इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे काम करते हैं:
- हाइट ट्रांसड्यूसर (Height Transducers): ये मिडल टावर (M) पर लगी हुई बीच की फीलर रॉड (Feeler Rod) के ऊपर माउंटेड होते हैं। इन ट्रांसड्यूसर की कंट्रोल आर्म्स सीधे ऊपर तने हुए लेवलिंग कॉर्ड (तार) से जुड़ी होती हैं। यह डिवाइस अपने शून्य स्तर (Zero Level) और तार के बीच के अंतर (Gap) को लगातार मापता है। जैसे ही कोई अंतर मिलता है, यह तुरंत ट्रैक लिफ्टिंग सर्वो हाइड्रोलिक सिस्टम को सिग्नल भेजता है, जिससे लिफ्टिंग सिलेंडर एक्टिव होकर पटरी को ऊपर उठा देते हैं और यह अंतर समाप्त हो जाता है।
- इलेक्ट्रॉनिक पेंडुलम (Electronic Pendulums): क्रॉस लेवल और ट्विस्ट को नियंत्रित करने के लिए मशीन में तीन जगहों पर भारी संवेदनशील पेंडुलम (Pendulum) लगाए जाते हैं:
- फ्रंट पेंडुलम: यह सबसे आगे के संदर्भ बिंदु पर दोनों स्टील तारों के आपसी क्रॉस स्तर को स्वचालित रूप से नियंत्रित रखता है।
- मिडल पेंडुलम: लिफ्टिंग और टैम्पिंग के दौरान कार्य क्षेत्र में दोनों पटरियों के आपसी झुकाव को लगातार चेक करता है, जिसे आवश्यकता पड़ने पर ऑपरेटर मैनुअली भी सुधार सकता है।
- रियर पेंडुलम: यह सबसे पीछे लगे टावर पर होता है। इसका काम यह जांचना है कि जो पटरी अभी-अभी लिफ्ट होकर और पैक होकर पीछे छूटी है, क्या उसके क्रॉस लेवल में कोई कमी रह गई है? यदि कोई अवशिष्ट त्रुटि (Remaining Error) बचती है, तो यह तुरंत लिफ्टिंग कट-ऑफ पॉइंट को स्वचालित रूप से संशोधित कर देता है, जिससे ट्विस्ट की समस्या जड़ से खत्म हो जाती है।
बेस रेल या डेटम रेल का चयन (Selection of Base Rail)
09-32 CSM मशीन में केवल ट्रैक को ऊपर उठाने (Lifting) की सुविधा होती है, इसे नीचे दबाने का कोई सिस्टम नहीं होता। इसलिए लोंगिट्यूडिनल प्रोफाइल को दुरुस्त करने के लिए दोनों में से किसी एक पटरी को बेस रेल या डेटम रेल (Base/Datum Rail) के रूप में चुनना पड़ता है। मशीन सबसे पहले बेस रेल के गढ्ढों और स्तर को ठीक करती है और फिर दूसरी रेल (जिसे कैंट रेल कहा जाता है) को बेस रेल के सापेक्ष ऊपर उठाकर क्रॉस लेवल सही करती है। बेस रेल का चयन निम्नलिखित नियमों के आधार पर किया जाता है:
- सिंगल लाइन सीधे ट्रैक पर: जो पटरी ज्यादा ऊंची या कम खराब (Higher/Less Disturbed Rail) होती है, उसे बेस रेल बनाया जाता है।
- डबल लाइन सीधे ट्रैक पर: जो पटरी सेस (Cess – ट्रैक का बाहरी किनारा) की तरफ नहीं होती, यानी अंदरूनी पटरी (Non-Cess Rail) को बेस रेल चुना जाता है।
- घुमावदार ट्रैक (Curves) पर: मोड़ पर हमेशा अंदर वाली पटरी (Inner Rail) को ही बेस रेल बनाया जाता है।
- कंट्रोल मैकेनिज्म: वर्किंग केबिन में कैंट पोटेंशियोमीटर के पास एक कैंट सेलेक्टर स्विच (Cant Selector Switch) होता है। मशीन को सही कमांड देने के लिए इस स्विच की दिशा हमेशा चुनी गई बेस रेल के विपरीत (Opposite) रखनी पड़ती है।
जनरल लिफ्ट का गणित और रैंप के नियम (General Lift & Ramping Rules)
ट्रैक पर मौजूद सभी छोटे-बड़े गड्ढों और लहरों (Undulations) को पूरी तरह से कवर करने के लिए बेस रेल को एक न्यूनतम ऊंचाई तक उठाना पड़ता है, जिसे जनरल लिफ्ट (General Lift) कहा जाता है।
- मानक मान (Standard Values): काम शुरू करने से पहले पी.वेवे सुपरवाइजर द्वारा ट्रैक के सबसे गहरे गड्ढे (Dips) की पहचान की जाती है। जनरल लिफ्ट का मान हमेशा सबसे गहरे गड्ढे से अधिक होना चाहिए।
- सीमाएँ (Limits): एक बार में जनरल लिफ्ट का मान कभी भी 50 mm से अधिक नहीं होना चाहिए। यदि ट्रैक को 50 mm से ज़्यादा उठाने की ज़रूरत है, तो इसे दो या तीन बार में (Multiple Passes) किया जाएगा। वहीं, न्यूनतम जनरल लिफ्ट का मान 20 mm से कम नहीं होना चाहिए, अन्यथा गिट्टी को नीचे खिसकने के लिए पर्याप्त जगह (Void) नहीं मिलेगी।
रैंप अप और रैंप डाउन का नियम (Ramping Rules)
जब मशीन दिन का काम शुरू करती है या ब्लॉक बंद करके वापस लौटती है, तो अचानक से ट्रैक को उठाना या छोड़ना प्रतिबंधित होता है, क्योंकि इससे ट्रेनों के चलने के लिए एक खतरनाक झटका (Bump) बन जाएगा। इसके लिए 1 in 1000 के ढाल में धीरे-धीरे ट्रैक को उठाया या गिराया जाता है जिसे रैंप कहते हैं:
- रैंप डाउन (Ramp Down): ब्लॉक समय समाप्त होने पर चलते हुए काम की लिफ्टिंग को धीरे-धीरे घटाते हुए 1:1000 के अनुपात में शून्य (Zero) पर लाया जाता है।
- रैंप अप (Ramp Up): अगले दिन जब काम दोबारा शुरू होता है, तो मशीन को ठीक उसी बिंदु पर वापस लाया जाता है जहाँ से पिछले दिन का रैंप डाउन शुरू हुआ था। वहां से 1:1000 के अनुपात में धीरे-धीरे लिफ्टिंग बढ़ाते हुए वांछित जनरल लिफ्ट तक पहुँचा जाता है, ताकि दोनों दिनों का काम आपस में बिल्कुल सुचारू रूप से जुड़ जाए।
लेवलिंग के कार्य मोड (Modes of Levelling)
लाइनिंग की तरह ही लेवलिंग प्रणाली भी दो मोड में काम कर सकती है:
A. आनुपातिक या मुआवजा मोड (Proportional or Compensation Mode)
इस मोड में जनरल लिफ्ट का मान स्थिर कर दिया जाता है और मशीन केवल ‘स्मूदनिंग’ का काम करती है। चूंकि फ्रंट टावर हमेशा unleveled (खराब) ट्रैक पर चल रहा होता है, इसलिए जब भी आगे कोई बड़ा कूबड़ (Hump) या गड्ढा आता है, तो संदर्भ तार का अगला सिरा भी अपनी सही पोजीशन से भटक जाता है।
- इसके कारण काम के बाद भी ट्रैक पर एक आनुपातिक त्रुटि शेष रह जाती है जिसे लेवल ऑफसेट कहा जाता है।
- मिडल टावर पर बची हुई यह त्रुटि के बराबर होती है, जहाँ (r) मशीन का रिडक्शन रेशियो है, (a और b ट्रॉलियों के बीच की आंतरिक दूरियां हैं)। यह मोड केवल छोटे तरंगदैर्ध्य (Short Wave Defects) वाले दोषों को हटा पाता है।
B. डिज़ाइन या प्रिसिजन मोड (Design or Precision Mode)
जब ट्रैक से लॉन्ग वेव (Long Wave) और शॉर्ट वेव दोनों प्रकार के दोषों को शत-प्रतिशत समाप्त करना हो, तब प्रिसिजन मोड का उपयोग किया जाता है।
- इसके लिए पूरे ट्रैक का पहले से विस्तृत लेवल सर्वे करके स्लीपरों पर सटीक लिफ्टिंग वैल्यू लिख दी जाती है।
- ऑपरेटर फ्रंट केबिन में लगे जनरल लिफ्ट पोटेंशियोमीटर की मदद से इन मानों को लगातार बदलता रहता है, जिससे फ्रंट टावर के भटकाव का असर खत्म हो जाता है और ट्रैक बिल्कुल सपाट डिज़ाइन प्रोफाइल में आ जाता है।
- लेज़र सिस्टम के साथ प्रिसिजन मोड: इस आधुनिक रूप में अग्रिम सर्वे की भी आवश्यकता नहीं होती। आगे खड़ी ट्रॉली से आने वाली सीधी लेज़र बीम फ्रंट फीलर के रिसीवर से टकराती है, जो ऊंचाई को ऑटो-एडजस्ट करके लिफ्टिंग सिलेंडर को सीधे गाइड करती है।
पोटेंशियोमीटर और सुधार मान (Potentiometer Guide)
फ्रंट और वर्किंग केबिन में बैठे ऑपरेटरों को विभिन्न मोड़ों और ज्यामिति के अनुसार निम्नलिखित पोटेंशियोमीटर से सही सुधार मान फीड करने होते हैं:
- K-वैल्यू (K-Value): यह सुधार मान ट्रांजिशन कर्व और सर्कुलर कर्व दोनों में लेवलिंग के दौरान दिया जाता है। यह वक्र के रेडियस, सुपर-एलिवेशन (कैंट) और ट्रैक गेज पर निर्भर करता है। इस मान को सीधे जनरल लिफ्ट पोटेंशियोमीटर से घटाया या बढ़ाया जाता है।
- X-वैल्यू (X-Value): जब ट्रैक के वर्टिकल प्रोफाइल में अचानक कोई ग्रेडिएंट (ढाल) बदलता है (जहाँ दो ग्रेड्स का अंतर 0.4% या उससे अधिक हो), वहां वर्टिकल कर्व बनता है। इस वर्टिकल कर्व के शीर्ष (Top) पर लिफ्ट सेटिंग में X-वैल्यू जोड़ी जाती है, और निचले हिस्से (Bottom) में X-वैल्यू घटाई जाती है। इसे भी जनरल लिफ्ट पोटेंशियोमीटर के जरिए ही फीड किया जाता है।
भाग 6: पावर ट्रांसमिशन, गियर बॉक्स और हाइड्रोलिक प्रणालियों का विस्तृत नेटवर्क (Power Transmission, Gearboxes & Hydraulic Infrastructure)
09-32 CSM मशीन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक यात्रा करने (Travelling Mode) और कार्य स्थल पर भारी पटरियों को उठाने व गिट्टी को दबाने (Working Mode) के लिए अत्यधिक शक्ति की आवश्यकता होती है। इस शक्ति के कुशल संचरण और नियंत्रण के लिए मैकेनिकल गियर बॉक्स, जटिल गियर प्रणालियों और एक विशाल हाइड्रोलिक नेटवर्क का उपयोग किया जाता है। यह पूरा तंत्र इंजन की यांत्रिक ऊर्जा को न्यूमैटिक, मैकेनिकल और हाइड्रोलिक पावर में बदल देता है।
पावर फ्लो और गियर बॉक्स प्रणाली (Gearbox Infrastructure)
मशीन में इंजन से उत्पन्न होने वाली शक्ति को दो अलग-अलग मोड के अनुसार रूट किया जाता है, जिसके लिए विशेष गियर बॉक्स डिज़ाइन किए गए हैं:
1. ZF हाइड्रोडायनामिक गियर बॉक्स (ZF Hydrodynamic Power Shift Gearbox)
पुरानी मशीनों के मैकेनिकल गियर बॉक्स, ड्राइव क्लच और रिवर्सिंग गियर बॉक्स के जटिल सेटअप में होने वाले अत्यधिक फेलियर को समाप्त करने के लिए CSM में जर्मनी के प्रसिद्ध ZF हाइड्रोडायनामिक 4-स्पीड पावर शिफ्ट गियर बॉक्स का उपयोग किया गया है।
- ट्रेवलिंग मोड (Travelling Mode): इस मोड में इंजन की शक्ति सीधे ZF गियर बॉक्स में जाती है। वहां से यह मैकेनिकल क्लच और कार्डन शाफ्ट के माध्यम से डिस्ट्रीब्यूशन गियर बॉक्स (Distribution Gear Box) को भेजी जाती है। डिस्ट्रीब्यूशन गियर बॉक्स इस एक इनपुट पावर को दो विपरीत दिशाओं के आउटपुट में विभाजित करता है और सीधे मेन फ्रेम के ड्राइविंग बोगी (Driving Axles) को सौंप देता है।
- वर्किंग मोड (Working Mode): कार्य के दौरान मशीन की पूरी गति को हाइड्रोलिक पावर द्वारा नियंत्रित किया जाता है। इस मोड में इंजन की यांत्रिक शक्ति ZF गियर बॉक्स के पिछले और अगले हिस्सों पर माउंटेड मुख्य हाइड्रोलिक पंपों को चलाने में इस्तेमाल होती है।
2. फंक गियर बॉक्स (Funk Pump Distributor Gear Box)
यह सीधे इंजन से एक मुख्य कार्डन शाफ्ट के माध्यम से जुड़ा होता है। इसका प्राथमिक कार्य काम के दौरान इंजन की रोटेशनल स्पीड (RPM) को कम करना और उसे समान दिशा में घूमने वाले तीन गियरों के सेट के माध्यम से हाइड्रोलिक पंपों को वितरित करना है। इस गियर बॉक्स की वजह से समान क्षमता और डिज़ाइन के पंपों का उपयोग संभव हो पाता है, जिससे रेलवे को स्पेयर पार्ट्स का अतिरिक्त स्टॉक रखने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
3. रिडक्शन गियर बॉक्स (Reduction Gear Box)
काम के दौरान जब मुख्य फ्रेम को बहुत ही धीमी और निरंतर गति से आगे बढ़ना होता है, तब हाइड्रोलिक मोटर्स एक्टिव होती हैं। ये मोटर्स अपनी उच्च आरपीएम शक्ति को रिडक्शन गियर बॉक्स को भेजती हैं, जो आरपीएम को कम करके टॉर्क (ताकत) को अत्यधिक बढ़ा देता है। यह बढ़ा हुआ टॉर्क कार्डन शाफ्ट के माध्यम से डिस्ट्रीब्यूशन गियर बॉक्स को ट्रांसफर किया जाता है ताकि बोगी को निरंतर वर्किंग ड्राइव मिल सके।
हाइड्रोलिक पंपों का विस्तृत विश्लेषण (Hydraulic Pumps & Pressures)
09-32 CSM मशीन का पूरा वर्किंग गियर पूरी तरह हाइड्रोलिक दबाव पर निर्भर है। मशीन के अपग्रेडेशन (ओल्ड बनाम न्यू) के आधार पर हाइड्रोलिक पंपों के सर्किट और उनके वर्किंग व सेफ्टी प्रेशर का विवरण नीचे दिया गया है:
ओल्ड CSM के हाइड्रोलिक पंप (Old CSM Pump Network)
पुरानी मशीनों में कुल 5 हाइड्रोलिक पंप इस्तेमाल किए जाते थे, जो मुख्य रूप से ZF गियर बॉक्स और पंप ड्राइव गियर बॉक्स पर लगे होते थे:
- पंप 1 (Double Pump – 38 × 22 GPM): यह ZF गियर बॉक्स के पिछले हिस्से पर स्थित होता है। इसका 38 GPM का हिस्सा मुख्य हाइड्रोलिक सिस्टम (Main System Supply) को पावर देता है। इसका वर्किंग प्रेशर 120-140 bar और सेफ्टी प्रेशर 175 bar पर सेट रहता है।
- पंप 2 (Double Pump – 20 × 14 GPM): यह ZF गियर बॉक्स के बाएं हिस्से (LHS) पर आगे की तरफ लगा होता है। 20 GPM का आउटपुट (150 bar प्रेशर) दोनों हाइड्रोलिक ऑयल कूलर्स की मोटर्स को चलाता है। 14 GPM का आउटपुट (150 bar प्रेशर) ZF ऑयल कूलर और इंजन रेडिएटर मोटर को संचालित करता है।
- पंप 3 (Variable Pump – 90 LPM): यह ZF गियर बॉक्स के दाहिने हिस्से (RHS) पर आगे की तरफ माउंटेड होता है। यह मशीन के निरंतर वर्किंग ड्राइव (Continuous Work Drive) को संभालता है। इसका चार्जिंग प्रेशर 30 bar और ड्राइविंग वर्किंग प्रेशर 210 bar होता है।
- पंप 4 (Double Pump – 38 × 17 GPM): यह पंप ड्राइव गियर बॉक्स के बाईं ओर लगा होता है। 38 GPM का हिस्सा बाईं ओर की टैम्पिंग यूनिट के कंपन (LHS Vibration) को 150 bar पर संभालता है। 17 GPM का हिस्सा बड़े स्क्वीज़िंग सिलेंडर के काउंटर प्रेशर (35 bar / सेफ्टी 90 bar) और मुख्य स्क्वीज़िंग प्रेशर (90-135 bar / सेफ्टी 150 bar) को नियंत्रित करता है।
- पंप 5 (Double Pump – 38 × 17 GPM): यह पंप ड्राइव गियर बॉक्स के दाईं ओर स्थित होता है। यह दाहिनी ओर की टैम्पिंग यूनिट के कंपन (RHS Vibration – 38 GPM, 150 bar) और छोटे स्क्वीज़िंग सिलेंडर के प्रेशर कंट्रोल्स को फीड करता है।
न्यू CSM के हाइड्रोलिक पंप (New CSM Pump Network)
आधुनिक न्यू CSM मशीनों में सिस्टम को सरल और अधिक कुशल बनाते हुए मुख्य पंपों की संख्या को घटाकर 4 नंबर्स कर दिया गया है, लेकिन उनकी कार्यक्षमता बढ़ा दी गई है:
- पंप 1 (Triple Pump – 38 × 14 × 6 GPM): ZF गियर बॉक्स के फ्रंट LHS पर लगा होता है। 38 GPM का हिस्सा मुख्य सिस्टम को आंशिक सप्लाई (140 bar) देता है। 14 GPM का हिस्सा (210 bar) ZF ऑयल कूलर और दोनों हाइड्रोलिक कूलर मोटरों को चलाता है। 6 GPM का हिस्सा (210 bar) केबिन के एयर कंडीशनर (AC) की हाइड्रोलिक ड्राइव मोटर को पावर देता है।
- पंप 2 (Variable Pump – 90 LPM): यह गियर बॉक्स के फ्रंट RHS पर होता है, जो पुरानी मशीन की तरह ही 210 bar पर मशीन के मुख्य फ्रेम के निरंतर वर्क ड्राइव को नियंत्रित करता है।
- पंप 3 (Triple Pump – 38 × 22 × 17 GPM): पंप ड्राइव गियर बॉक्स के बाईं ओर स्थित होता है। 38 GPM का हिस्सा बाएं टैम्पिंग यूनिट के कंपन को अधिक ताकत यानी 180 bar पर चलाता है। 22 GPM का हिस्सा (150 bar) बड़े स्क्वीज़िंग सिलेंडर के पिस्टन एंड और पिस्टन रॉड एंड के प्रेशर को संभालता है। 17 GPM का हिस्सा (210 bar) अल्टरनेटर की हाइड्रोलिक ड्राइव मोटर को पावर प्रदान करता है।
- पंप 4 (Triple Pump – 38 × 22 × 17 GPM): पंप ड्राइव गियर बॉक्स के दाईं ओर लगा होता है। 38 GPM का हिस्सा दाईं टैम्पिंग यूनिट के कंपन (180 bar) को चलाता है। 22 GPM का हिस्सा (140 bar) मुख्य सिस्टम को अतिरिक्त आंशिक पावर देता है। 17 GPM का हिस्सा छोटे स्क्वीज़िंग के काउंटर प्रेशर (35 bar / सेफ्टी 90 bar) को संभालता है।
हाइड्रोलिक मोटरों का नेटवर्क (Hydraulic Motors)
पंपों द्वारा उत्पन्न किए गए भारी प्रेशर को वास्तविक मैकेनिकल मूवमेंट (घूर्णन गति) में बदलने के लिए मोटर्स का उपयोग किया जाता है। न्यू CSM में मोटरों की संख्या बढ़ाकर 9 नंबर्स की गई है (ओल्ड CSM में 8 मोटर्स थीं):
- वाइब्रेशन मोटर्स (Left & Right – 2 नंबर्स): ये मोटर्स क्रमशः 38 GPM के फ्लो पर काम करती हैं। ओल्ड CSM में इनका वर्किंग प्रेशर 150 bar और न्यू CSM में 180 bar होता है। इनका मुख्य कार्य टैम्पिंग टूल्स को गिट्टी भेदने के लिए तीव्र कंपन (Vibration) प्रदान करना है।
- वर्क ड्राइव मोटर (Bidirectional – 1 नंबर): यह मुख्य फ्रेम यूनिट को निरंतर गति से आगे बढ़ाने के लिए रिडक्शन गियर बॉक्स से जुड़ी होती है, जो 210 bar प्रेशर पर काम करती है।
- सैटेलाइट ड्राइव मोटर (Bidirectional – 1 नंबर): यह विशेष मोटर सैटेलाइट फ्रेम (Sub-Frame) को मुख्य फ्रेम के नीचे स्वतंत्र रूप से स्लीपर-दर-स्लीपर चलाने के लिए 160 bar के संयुक्त प्रेशर पर काम करती है।
- हाइड्रोलिक ऑयल कूलर मोटर्स (2 नंबर्स): हाइड्रोलिक ऑयल के तापमान को नियंत्रित रखने के लिए कूलिंग फैन्स को घुमाती हैं (ओल्ड में 150 bar, न्यू में 210 bar)।
- ZF कूलर मोटर (1 नंबर): ZF गियर बॉक्स के ऑयल को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल होती है।
- एयर कंडीशनर ड्राइव मोटर (1 नंबर – केवल न्यू CSM में): ऑपरेटर केबिन के एसी कंप्रेसर को हाइड्रॉलिकली चलाने के लिए 6 GPM फ्लो और 210 bar प्रेशर पर काम करती है।
- अल्टरनेटर ड्राइव मोटर (1 नंबर – केवल न्यू CSM में): बैटरी चार्जिंग और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के लिए आवश्यक विद्युत उत्पन्न करने वाले अल्टरनेटर को हाइड्रोलिक पावर से 210 bar पर घुमाती है।
प्रेशर स्टेबिलिटी: हाइड्रोलिक एक्युमुलेटर (System Accumulators)
जब टैम्पिंग टूल्स अचानक गिट्टी को दबाते हैं (Squeezing Action), तो हाइड्रोलिक लाइनों में अचानक से बहुत भारी प्रेशर ड्रॉप या प्रेशर शॉक (Hydraulic Shock) पैदा होता है। इस शॉक को सोखने और सिस्टम में दबाव की स्थिरता बनाए रखने के लिए नाइट्रोजन गैस से भरे एक्युमुलेटर (Accumulators) का उपयोग किया जाता है:
- सिस्टम एक्युमुलेटर (32 लीटर क्षमता): यह मुख्य हाइड्रोलिक सर्किट के दबाव को स्थिर रखता है। इसका नाइट्रोजन प्री-चार्ज प्रेशर 85 bar होता है। ओल्ड CSM में यह केवल 1 नंबर होता था, जबकि न्यू CSM में दबाव की बेहतर स्थिरता के लिए 2 सिस्टम एक्युमुलेटर दिए गए हैं।
- बिग स्क्वीज़िंग एक्युमुलेटर (20 लीटर क्षमता): यह कंक्रीट स्लीपरों की भारी टैम्पिंग के दौरान बड़े स्क्वीज़िंग आर्म्स के सिलेंडरों को लगातार और समान प्रेशर देने का काम करता है। इसका नाइट्रोजन प्रेशर ओल्ड CSM में 120 bar और न्यू CSM में 85 bar सेट किया जाता है।
- स्मॉल स्क्वीज़िंग काउंटर प्रेशर एक्युमुलेटर (1.4 लीटर क्षमता – 2 नंबर्स): ये छोटे आकार के एक्युमुलेटर होते हैं जो आर्म्स के वापस खुलने और काउंटर प्रेशर को संतुलित करने के लिए 20 bar के नाइट्रोजन प्रेशर पर काम करते हैं।
भाग 7: इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ट्रांसड्यूसर नेटवर्क और न्यूमैटिक प्रणालियाँ (Electrical, Electronics, Transducers & Pneumatic Networks)
09-32 CSM मशीन का नियंत्रण और संचालन पूरी तरह से एक अत्यंत उन्नत विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक जाल पर टिका हुआ है। यह मशीन मैकेनिकल और हाइड्रोलिक ताकतों को विद्युत संकेतों (Electrical Signals) के माध्यम से नियंत्रित करती है। पुरानी मशीनों के विपरीत, इसमें प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोल (PLC), कंप्यूटर मापन प्रणाली (CMS) और स्वचालित गाइडिंग कंप्यूटर (ALC) जैसी अत्याधुनिक प्रणालियाँ एकीकृत हैं, जो इसे पूरी तरह से ऑटोमैटिक वर्किंग साइकिल पर काम करने की क्षमता प्रदान करती हैं।
इलेक्ट्रिकल पावर सप्लाई और पावर सोर्स (Electrical Power Source)
मशीन की सभी इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों, सेंसर्स, कंप्यूटरों और सोलेनोइड वाल्वों को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक मजबूत विद्युत आपूर्ति प्रणाली की आवश्यकता होती है:
- बैटरी सिस्टम (Battery): इंजन को स्टार्ट करने और शुरुआती पावर बैकअप के लिए 12V / 200AH क्षमता की 2 बैटरियाँ इस्तेमाल की जाती हैं, जिन्हें आपस में सीरीज़ (Series) में जोड़कर 24V का मुख्य सर्किट तैयार किया जाता है।
- अल्टरनेटर नेटवर्क (Alternator): न्यू CSM में विद्युत उत्पादन को बहुत अधिक बढ़ाया गया है। इसमें बॉश (Bosch) मेक के कुल तीन अल्टरनेटर काम करते हैं:
- 28V / 55A क्षमता के 2 अल्टरनेटर (जो मुख्य बैटरी चार्जिंग और सामान्य सर्किट संभालते हैं)।
- 28V / 120A क्षमता का 1 अतिरिक्त अल्टरनेटर (जो भारी कंप्यूटर सिस्टम, CMS और ALC को स्थिर वोल्टेज की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करता है)।
- डीसी-टू-डीसी कनवर्टर (DC to DC Converter): मशीन में संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक कार्ड्स और सेंसर्स को एक समान और बिना किसी उतार-चढ़ाव (Surge-free) वाली वोल्टेज देने के लिए विशेष कनवर्टर्स का उपयोग किया जाता है। पूरे सिस्टम में अलग-अलग क्षमता के DC-DC कनवर्टर बोर्ड्स लगे होते हैं, जैसे EK813SV-00 (5 नंबर्स), EK812SV-00 (1 नंबर), और EK851SV-00 (1 नंबर)।
ट्रांसड्यूसर और सेंसिंग नेटवर्क (The Transducer Network)
ट्रैक की वास्तविक स्थिति, गहराई, झुकाव और दूरी को भौतिक रूप से मापने और उसे डिज़िटल डेटा में बदलकर कंप्यूटर तक पहुँचाने के लिए मशीन में कई प्रकार के ट्रांसड्यूसर (Transducers) और सेंसर्स का एक व्यापक नेटवर्क लगा होता है:
- हाइट ट्रांसड्यूसर (Height Transducer – 2 नंबर्स): ये मिडल मेज़रिंग टावर पर दोनों पटरियों के ऊपर लगे होते हैं। ये लोंगिट्यूडिनल लेवल और लिफ्टिंग की वास्तविक ऊंचाई को ट्रैक करते हैं।
- वर्साइन ट्रांसड्यूसर (Versine Transducer – 2 नंबर्स): ये अलाइनमेंट या लाइनिंग सिस्टम से जुड़े होते हैं। ये स्टील कॉर्ड तार के विस्थापन (Displacement) को मापकर पटरी के सीधेपन या घुमाव (Versine) का सटीक पता लगाते हैं।
- टैम्पिंग डेप्थ ट्रांसड्यूसर (Tamping Depth Transducer – 2 नंबर्स): ये यह सुनिश्चित करते हैं कि टैम्पिंग टूल्स स्लीपर के नीचे गिट्टी के भीतर बिल्कुल सही और निर्धारित गहराई तक ही उतरें, ताकि स्लीपर के निचले हिस्से को कोई नुकसान न हो।
- डिस्टेंस एनकोडर (Distance Encoder – 2 नंबर्स): ये मशीन द्वारा तय की गई वास्तविक दूरी और काम की गति को सेंटीमीटर की सटीकता के साथ मापते हैं, जिससे डेटा रिकॉर्डर में सटीक चेनहेज (Chainage) दर्ज होती है।
- इलेक्ट्रॉनिक पेंडुलम (Electronic Pendulum – 3 नंबर्स): ये फ्रंट, मिडल और रियर टावरों पर लगे होते हैं, जो ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण) के सिद्धांत पर काम करते हुए दोनों पटरियों के आपसी क्रॉस लेवल (Cross Level) और कैंट/सुपर-एलिवेशन को पूरी सटीकता से मापते हैं।
प्रिंटेड सर्किट बोर्ड्स और कंट्रोल कार्ड्स (The Control PCBs Matrix)
09-32 CSM का कंट्रोल पैनल और इलेक्ट्रॉनिक केबिन विभिन्न प्रकार के प्रिंटेड सर्किट बोर्ड्स (PCBs) से लैस होता है। प्रत्येक पीसीबी का अपना एक विशिष्ट और अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य होता है। मशीन के सुचारू संचालन के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्ड्स उत्तरदायी हैं:
- प्रोग्रामर पीसीबी (Programmer PCB – EK501P-00): यह मशीन का मुख्य प्रोसेसर कार्ड है जो पूरी ऑटोमैटिक वर्किंग साइकिल (Automatic Tamping Cycle) को नियंत्रित करता है।
- ट्रैक लिफ्टिंग कंट्रोल कार्ड (Track Lifting Control – EK347LV-00 / 2 नंबर्स): यह हाइट ट्रांसड्यूसर से सिग्नल लेकर लिफ्टिंग सर्वो वाल्व को कमांड भेजता है।
- लाइनिंग कंट्रोल पीसीबी (Lining Control – EK349LV-00 / 1 नंबर): यह ट्रैक के अलाइनमेंट और सर्वो वाल्व आधारित स्लीविंग/लाइनिंग ऑपरेशन को पूरी तरह नियंत्रित करता है।
- टैम्पिंग यूनिट अप/डाउन कंट्रोल (Tamping Unit UP/DOWN – EK16V-00 / 2 नंबर्स): यह टूल्स के नीचे जाने और ऊपर आने की समय सीमा और हाइड्रोलिक प्रेशर वाल्व को गाइड करता है।
- पेंडुलम कंट्रोल पीसीबी (Pendulum Control – EK346LV-00 / 1 नंबर): तीनों इलेक्ट्रॉनिक पेंडुलम के सिग्नलों को प्रोसेस करके क्रॉस लेवल को सुव्यवस्थित रखता है।
- सैटेलाइट ड्राइव कंट्रोल (Satellite Drive – EK24V-00 / 1 नंबर): मुख्य फ्रेम के लगातार आगे बढ़ने के दौरान सैटेलाइट यूनिट के रुकने और चलने की साइकिल (Cyclic Movement) का प्रबंधन करता है।
- मल्टीप्लेक्सर बोर्ड (Multiplexer – EK28V-00 / 1 नंबर): यह विभिन्न सेंसर्स से आने वाले एनालॉग सिग्नलों को डिज़िटल डेटा में कनवर्ट करके मुख्य कंप्यूटर तक भेजता है।
- इनपुट/आउटपुट बोर्ड्स (Input/Output of Programmer – EK553P-00 / 9 नंबर्स): ये ऑपरेटर द्वारा पैनल पर दबाए गए बटनों की कमांड को प्रोसेसर तक और प्रोसेसर के आउटपुट को सोलेनोइड्स तक पहुँचाते हैं।
कैटेनरी और नेटवर्क प्रणालियाँ: CMS, CAN और ALC
न्यू CSM मशीनों में डिज़िटल कनेक्टिविटी और स्वचालन (Automation) को निम्नलिखित तीन स्तंभों के जरिए एक नए स्तर पर ले जाया गया है:
- CMS (Computer Measurement System): यह एक बेहद उन्नत कंप्यूटर टर्मिनल है जो ऑपरेटर के सामने स्क्रीन पर वास्तविक समय (Real-time) में ट्रैक के सभी पैरामीटर्स को ग्राफिक्स के रूप में प्रदर्शित करता है। इसमें तेज़ प्रोसेसिंग क्षमता वाले एमसी बोर्ड्स लगे होते हैं। इसका टर्मिनल 320×240 पिक्सल के अत्यधिक चमकीले ईएल-ग्राफिक डिस्प्ले (EL-Graphic Display) के साथ आता है।
- CAN (Controller Area Network): यह एक ऑटोमोटिव-ग्रेड इंडस्ट्रियल नेटवर्क प्रोटोकॉल है, जो मशीन में लगे विभिन्न माइक्रोकंट्रोलर्स, पीसीबी बोर्ड्स, सोलेनोइड वाल्व्स और ऑपरेटर टर्मिनल के बीच अत्यधिक तेज़ और सुरक्षित संचार (Interconnection) स्थापित करता है। इसमें 40MHz इंटरनल फ़्रीक्वेंसी वाले आधुनिक प्रोसेसर का उपयोग किया जाता है।
- ALC (Automatic Guiding Computer): यह मशीन में लगा एक शक्तिशाली औद्योगिक कंप्यूटर (Industrial Computer) है, जो मॉनिटर और कीबोर्ड के साथ काम करता है। इसमें ट्रैक ज्यामिति (Track Geometry) का असीमित डेटा स्टोर किया जा सकता है। यह काम के दौरान लगातार ट्रैक रेडियस और आवश्यक सुधार मानों (Correction Values) की गणना करता है और सीधे मेज़रिंग सिस्टम को पास करता है, जिससे मानवीय भूल की संभावना पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
न्यू CSM के आधुनिक डिज़िटल और सुरक्षा फीचर्स (Modern Digital Infrastructure)
- विशाल डेटा स्टोरेज (500 GB Memory): मशीन में लगे ALC, CMS और रिकॉर्डिंग सिस्टम में 500 GB से कम की मेमोरी नहीं होनी चाहिए। यह क्षमता कम से कम 100 किलोमीटर के पूरे पैकिंग कार्य और नई ट्रैक ज्यामिति का पूरा डेटा सुरक्षित रखने में सक्षम है, जिसे USB के जरिए आसानी से ट्रांसफर किया जा सकता है।
- लाइव कैमरा मॉनिटरिंग (IP Based Cameras): मशीन के सभी महत्वपूर्ण वर्किंग यूनिट्स (टैम्पिंग बैंक, लिफ्टिंग गियर) और वर्किंग साइट की लाइव निगरानी के लिए हाई-डेफिनिशन IP कैमरे लगाना अनिवार्य है। इन कैमरों का लाइव वीडियो देश के किसी भी हिस्से से सुरक्षित पासवर्ड और इंटरनेट ब्राउज़र के जरिए देखा जा सकता है।
- रिमोट कनेक्टिविटी और TMS इंटरफेस: मशीन में इनबिल्ट 3G/4G इंटरनेट सिस्टम होना आवश्यक है, जिससे रिकॉर्ड किया गया पूरा ट्रैक डेटा सीधे भारतीय रेलवे के आधिकारिक Track Management System (TMS) सॉफ्टवेयर से सिंक (Interface) हो जाता है।
- इमरजेंसी ब्रेकिंग डिस्टेंस (EBD): सुरक्षा के लिहाज से, सपाट ट्रैक पर अपनी अधिकतम गति से दौड़ते समय यदि इसमें आपातकालीन ब्रेक लगाया जाए, तो मशीन 600 मीटर के भीतर पूरी तरह रुक जानी चाहिए।
- हाई-इंटेनसिटी हॉर्न और हूटर्स: मशीन के दोनों सिरों पर लगे ड्यूल-टोन इलेक्ट्रिक/न्यूमैटिक हॉर्न की आवाज की तीव्रता 120-125 dB (5 मीटर पर) होती है, जो ट्रैक पर काम कर रहे गैंगमैनों को 400 मीटर दूर से ही सतर्क कर देती है। इसके अलावा 300 मीटर की दूरी से रिमोट द्वारा संचालित होने वाले हूटर्स भी ट्रैक सुरक्षा को पुख्ता करते हैं।
न्यूमैटिक (हवा के दबाव) प्रणाली का विश्लेषण (The Pneumatic Infrastructure)
मशीन में जहाँ भारी लिफ्टिंग और स्क्वीज़िंग का काम हाइड्रोलिक प्रेशर से होता है, वहीं मेज़रिंग ट्रॉलियों को पटरी पर दबाकर रखना, संदर्भ तारों को कसना और मुख्य ब्रेकिंग सिस्टम पूरी तरह से हवा के दबाव यानी न्यूमैटिक सिस्टम पर काम करता है:
- ट्विन सिलेंडर कंप्रेसर (Twin Cylinder Compressor): मशीन में 2 कंप्रेसर सिलेंडर लगे होते हैं जिनकी कुल हवा उत्पादन क्षमता 600 लीटर प्रति मिनट होती है।
- अनलोडर वाल्व (Unloader Valve): पूरे न्यूमैटिक सिस्टम के वर्किंग प्रेशर को स्थिर बनाए रखने के लिए अनलोडर वाल्व को 7 bar (बैलेंस्ड प्रेशर) पर सेट किया जाता है।
- एयर टैंक्स (Air Tanks): संपीड़ित हवा (Compressed Air) को स्टोर करने के लिए 100 लीटर क्षमता के 2 मुख्य एयर टैंक दिए गए हैं। ड्राइविंग से पहले इन दोनों टैंकों में पूरा न्यूमैटिक प्रेशर होना अनिवार्य है।
- न्यूमैटिक ब्रेक सिलेंडर्स (Brake Cylinders):
- मुख्य मशीन (Main Frame) के लिए: 12 इंच व्यास (Diameter) वाले 2 शक्तिशाली ब्रेक सिलेंडर दिए गए हैं।
- सैटेलाइट यूनिट (Satellite) के लिए: 8 इंच व्यास वाले 2 ब्रेक सिलेंडर लगे होते हैं।
- यात्रा के दौरान ये ब्रेक न्यूमैटिक हवा के दबाव से काम करते हैं, जबकि कार्य मोड (Working Mode) के दौरान ब्रेक सिलेंडरों को हाइड्रोलिक कंट्रोल में शिफ्ट कर दिया जाता है।
- प्रेशर सिलेंडर्स (Pressure Cylinders): मेज़रिंग ट्रॉलियों को वर्टिकल और लेटरल प्री-लोड देने, क्लैंप्स को सेट करने और कॉर्ड वायर को थामने के लिए विभिन्न आकारों के कुल 56 न्यूमैटिक प्रेशर सिलेंडर्स पूरी मशीन में फैले होते हैं।
भाग 8: मशीन संचालन प्रक्रिया, आपातकालीन सावधानियाँ और फील्ड समस्या निवारण (Machine Operations, Safety & Troubleshooting)
09-32 CSM जैसी जटिल और अत्यधिक मूल्यवान ट्रैक मशीन का सुरक्षित और कुशल संचालन पूरी तरह से निर्धारित नियमों (Standard Operating Procedures), सुरक्षा सावधानियों (Do’s & Don’ts) और आपातकालीन परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लेने की क्षमता पर निर्भर करता है। यह अंतिम भाग मशीन ऑपरेटरों और फील्ड इंजीनियरों के लिए फील्ड में काम करने की सबसे व्यावहारिक मार्गदर्शिका है।
मशीन शुरू करने और संचालित करने की प्रक्रिया (Operational Procedure)
काम पर जाने से पहले और काम के दौरान ऑपरेटर को चरणों के अनुसार निम्नलिखित सुरक्षा जांच और परिचालन प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य है:
1. इंजन शुरू करने से पहले की जाँच (Before Starting the Engine)
- लुब्रिकेशन और शीतलन: इंजन ऑइल का स्तर (Lub Oil Level) और रेडिएटर में पानी/कूलेंट का स्तर पूरी तरह जांचें।
- मैकेनिकल पार्ट्स: अल्टरनेटर और पंपों को घुमाने वाली बेल्ट का तनाव (Belt Tension) सही होना चाहिए।
- ईंधन: मुख्य और अतिरिक्त ईंधन टैंकों में पर्याप्त डीजल (Fuel Level) की उपलब्धता सुनिश्चित करें।
2. इंजन शुरू करने के तुरंत बाद की जाँच (Just After Starting)
- ऑइल प्रेशर: इंजन ऑयल प्रेशर गेज को देखें कि वह अपनी सामान्य सीमा में है या नहीं।
- विद्युत चार्जिंग: एमीटर और वोल्टमीटर पर बैटरी चार्जिंग की स्थिति की पुष्टि करें।
- हवा का दबाव: कंप्रेसर द्वारा न्यूमैटिक हवा बनाने की गति (Air Generation Rate) की जांच करें।
3. ड्राइविंग शुरू करने से पहले (Before Driving)
- न्यूमैटिक प्रेशर: दोनों मुख्य एयर टैंकों (Air Tanks) में हवा का दबाव न्यूनतम 7 bar होना सुनिश्चित करें।
- ब्रेक सिस्टम: पार्किंग ब्रेक और हैंड ब्रेक को पूरी तरह से रिलीज (मुक्त) करें। यदि मशीन के पीछे कोई कैंपिंग कोच (Camping Coach) जोड़ा गया है, तो इनडायरेक्ट ब्रेक लाइन में 5 bar का हवा का दबाव होना अनिवार्य है।
- लॉकिंग: सैटेलाइट फ्रेम, टैम्पिंग बैंक, लिफ्टिंग-लाइनिंग यूनिट और फ्रंट/रियर ट्रॉलियों के सभी मैकेनिकल सेफ्टी लॉक्स पूरी तरह से लॉक स्थिति में होने चाहिए।
4. काम शुरू करने से पहले (Before Starting Work)
- असामान्य आवाजें: मशीन को आइडल चलाकर किसी भी प्रकार की असामान्य या यांत्रिक आवाज (Abnormal Sound) को ध्यान से सुनें।
- प्रेशर सीक्वेंस: टैम्पिंग यूनिट में वाइब्रेशन (कंपन) शुरू करने से पहले सिस्टम के सभी आवश्यक हाइड्रोलिक और न्यूमैटिक प्रेशर चालू करें।
- लीकेज टेस्ट: न्यूमैटिक और हाइड्रोलिक सर्किट में किसी भी प्रकार के ऑइल या एयर लीकेज की बारीकी से जांच करें।
- ZF ऑयल स्तर: गियर बॉक्स का तापमान 80°C पहुँचने पर इसके ऑइल स्तर की अंतिम पुष्टि करें।
भाग 9: रेलवे मानकों के अनुसार रखरखाव अनुसूचियों का विस्तृत वर्गीकरण (Classification of Maintenance Schedules)
09-32 CSM जैसी अत्यधिक उन्नत और निरंतर कार्य करने वाली हेवी-ड्यूटी ट्रैक मशीन को बिना किसी बड़े फेलियर के सुचारू रूप से संचालित करने के लिए एक सख्त और व्यवस्थित समयबद्ध रखरखाव प्रणाली (Time-bound Maintenance System) का होना अनिवार्य है। रेलवे इंजीनियरिंग मानकों द्वारा इस मशीन के विभिन्न अंगों की जांच के लिए समय और इंजन घंटों (Engine Hours) के आधार पर अलग-अलग प्रकार की रखरखाव अनुसूचियाँ निर्धारित की गई हैं।
इन अनुसूचियों का मूल उद्देश्य केवल खराबी को ठीक करना नहीं, बल्कि “प्रिवेंटिव मेंटेनेंस” (खराबी आने से पहले रोकना) के सिद्धांत पर काम करना है।
दैनिक रखरखाव (To be done Daily)
यह कार्य हर दिन काम शुरू करने से पहले और ब्लॉक खत्म होने के तुरंत बाद पूरा किया जाता है। इसका मुख्य फोकस इंजन की सेहत और वर्किंग यूनिट्स की तात्कालिक कार्यक्षमता पर होता है:
1. मुख्य इंजन और पावर पैक की जांच (Engine Core)
- शीतलन प्रणाली: रेडिएटर में पानी और कूलेंट के स्तर को जांचें और कम होने पर उसे ऊपर तक भरें। इसके साथ ही रेडिएटर की होज़ पाइप और वॉटर पंप की सील से होने वाले किसी भी पानी के रिसाव को बारीकी से देखें।
- लुब्रिकेशन: इंजन ऑयल के स्तर को डिपस्टिक की मदद से मापे। इसके अलावा एयर कंप्रेसर के ऑयल लेवल की जांच करें और उसमें होने वाले किसी भी प्रकार के रिसाव को तुरंत दुरुस्त करें।
- मैकेनिकल फिटिंग्स: इंजन की अल्टरनेटर और फैन ड्राइव बेल्ट के तनाव को हाथ से दबाकर चेक करें और ढीली होने पर उसे सही करें।
- ईंधन प्रणाली: मुख्य फ्यूल टैंक में डीजल का स्तर जांचें। फ्यूल पंप, इंजेक्टर्स, डीजल सप्लाई पाइप और रिटर्न पाइपलाइनों से किसी भी प्रकार के ईंधन रिसाव की पुष्टि करें।
- वर्किंग प्रेशर और मॉनिटरिंग: दो घंटे लगातार काम करने के बाद, जब इंजन पूरी तरह लोड पर हो, तब उसके वास्तविक ऑइल प्रेशर को नोट करें। दिनभर के काम के दौरान दर्ज किए गए अधिकतम तापमान को लॉगबुक में दर्ज करें। एयर फिल्टर के इंडिकेटर को देखें कि वह चोक तो नहीं है।
2. टैम्पिंग यूनिट्स की दैनिक सुरक्षा (Tamping Units Security)
- असर और शाफ्ट लुब्रिकेशन: टैम्पिंग आर्म के मुख्य बेयरिंग (55 mm मुख्य पिन) के लुब्रिकेशन रिज़र्वायर को निर्धारित निशान तक तेल से भरें। इसी प्रकार वाइब्रेशन शाफ्ट के बेयरिंग्स के लुवायर को भी ऊपर तक रीफिल करें।
- गाइड कॉलम: टूल्स को गाइड करने वाले मुख्य कॉलम के विक लुब्रिकेटर की जांच करें और उसमें तेल की टॉपिंग करें।
- रनिंग लुब्रिकेशन: काम के दौरान हर 2 से 3 घंटे के अंतराल पर कनेक्टिंग रॉड बेयरिंग (35 mm पिन) और वाइब्रेशन शाफ्ट बेयरिंग की मैनुअल ग्रीसिंग करना अत्यंत आवश्यक है।
- सफाई और भौतिक जांच: पूरी टैम्पिंग बैंक असेंबली को गिट्टी के टुकड़ों और धूल से पूरी तरह साफ रखें। सभी 32 टैम्पिंग टूल्स की जकड़न की जांच करें और यह सुनिश्चित करें कि काम के समय वे आपस में न टकराएं।
3. सामान्य और हाइड्रोलिक प्रणालियों की दैनिक देखभाल
- ध्वनि विश्लेषण: इंजन, हाइड्रोलिक पंप, गियर बॉक्स और टैम्पिंग यूनिट्स से आने वाली किसी भी प्रकार की असामान्य यांत्रिक आवाज को ध्यान से सुनें।
- हाइड्रोलिक और न्यूमैटिक: मुख्य हाइड्रोलिक ऑइल टैंक में तेल के स्तर को चेक करें और कम होने पर नया तेल डालें। दिनभर के काम के दौरान हाइड्रोलिक फ्लूइड के अधिकतम तापमान को रिकॉर्ड करें। पूरे न्यूमैटिक सिस्टम और हाइड्रोलिक होज़ेस से किसी भी प्रकार के तेल या हवा के लीकेज को रोकें।
- एयर सिस्टम: दिन का काम खत्म होने के बाद मुख्य एयर रिसीवर और वॉटर सेपरेटर के ड्रेन वाल्व को खोलकर भीतर जमा हुआ पानी पूरी तरह बाहर निकालें। न्यूमैटिक एयर ऑइलर में तेल की टॉपिंग करें।
- बैटरी और इलेक्ट्रिकल: एमीटर की सुई को देखें, यह हमेशा पॉजिटिव दिशा में होनी चाहिए, जो यह दर्शाती है कि अल्टरनेटर बैटरियों को सही ढंग से चार्ज कर रहा है।
- यांत्रिक सुरक्षा लॉक: लिफ्टिंग-लाइनिंग यूनिट और सैटेलाइट फ्रेम के मैकेनिकल लॉकिंग डिवाइसेज की मजबूती की जांच करें। सैटेलाइट के सभी गाइड रोलर्स और लाइनिंग रोलर की पिनों की उचित ग्रीसिंग करें। सैटेलाइट एक्सेल के सपोर्ट सिलेंडर के बोल्टों की जकड़न और उसके टॉर्क सपोर्ट को बारीकी से चेक करें।
- ब्रेक और प्री-चेक: लॉकिंग पोजीशन में एयर ब्रेक के वास्तविक प्रेशर की जांच करें। रेलवे ट्रैक पर वास्तविक ब्लॉक वर्किंग शुरू करने से पहले मशीन के सभी छोटे-बड़े फंक्शन्स को चलाकर उनकी पूर्ण कार्यक्षमता की पुष्टि कर लें।
50 इंजन घंटों के बाद का रखरखाव (To be done after 50 Engine Hours)
यह कार्य नियमित अंतराल पर पूरा किया जाता है, जिसके लिए लगभग 2 घंटे का समय निर्धारित होता है। इसमें उन यांत्रिक हिस्सों पर ध्यान दिया जाता है जो अत्यधिक कंपन के कारण ढीले हो सकते हैं:
- पावर यूनिट: वी-बेल्ट की भौतिक स्थिति और घिसावट को चेक करें। बैटरी के टर्मिनलों और उनके कनेक्शनों की जकड़न की जांच करें तथा जंग से बचाने के लिए उन पर पेट्रोलियम जेली का लेप लगाएं। इंजन के मुख्य इंजेक्टर पाइपों को देखें कि वे किसी अन्य धातु से रगड़ तो नहीं खा रहे हैं। कंप्रेसर के फाउंडेशन और ब्रैकेट बोल्टों को पूरी तरह टाइट करें। वॉटर सेपरेटर को अच्छी तरह साफ करें।
- टैम्पिंग बैंक: गाइड कॉलम के नीचे लगी शू प्लेट के बोल्टों की जकड़न की जांच करें। स्क्वीज़िंग सिलेंडर के कवर प्लेट बोल्ट और टैम्पिंग यूनिट को थामने वाले मुख्य होल्डिंग ब्रैकेट बोल्टों को पूरी तरह से कसें। टैम्पिंग आर्म के मुख्य 55 mm और 35 mm पिनों के नटों की जकड़न की विशेष जांच करें।
- लिफ्टिंग, लाइनिंग और बोगी: रेल क्लैंप रोलर के लॉकिंग ब्रैकेट बोल्टों को कसें और रोलर्स के फ्री मूवमेंट व वियर (घिसावट) का निरीक्षण करें। लिफ्टिंग यूनिट के गाइड कॉलम, lineing सिलेंडर के पिवोट्स, रेल क्लैंप पिवोट पिन, रोलर क्लैंप हाउसिंग और लॉकिंग डिवाइस के पिवोट्स की गहन ग्रीसिंग करें। ड्राइविंग बोगी और डीडल बोगी के मुख्य किंग पिन पिवोट को ग्रीस करें। बोगी के लिंक रॉड्स, ड्राइविंग बोगी के एक्सेल गियर बॉक्स की फ्लैंज कवर और सैटेलाइट के टॉर्क आर्म पिवोट्स की उचित ग्रीसिंग सुनिश्चित करें।
- इलेक्ट्रिकल और ब्रेक: ब्रेक सिलेंडर के फाउंडेशन बोल्टों को चेक करें और सभी ब्रेक शूज़ की क्लियरेंस को मैनुअली एडजस्ट करें। ब्रेक लिंकेज के सभी पिवोट्स में ऑइलिंग करें। अल्टरनेटर को साफ करके उसके विद्युत कनेक्शनों को जांचें। मशीन में लगे सभी सेफ्टी लिमिट स्विचों को टेस्ट करें। लाइनिंग ट्रांसड्यूसर के संदर्भ तार और उसके कैरियर के बीच के गैप की जांच करें। गहराई मापने वाले डेप्थ ट्रांसड्यूसर को साफ करें ताकि तार बिना किसी रुकावट के पूरी तरह फ्री चल सके। बैटरियों के इलेक्ट्रोलाइट स्तर और हॉर्न की कार्यक्षमता की पुष्टि करें। सभी गियर बॉक्सों के ऑइलレベル स्तर को चेक करके निशान तक भरें।
100 इंजन घंटों के बाद का रखरखाव (To be done after 100 Engine Hours)
यह कार्य नियमित अंतराल पर पूरा किया जाता है, जिसके लिए पूरे एक दिन का समय लिया जाता है। इसमें मशीन की मुख्य सुरक्षा प्रणालियों का गहन परीक्षण किया जाता है:
- इंजन सुरक्षा उपकरणों का परीक्षण: इंजन को किसी बड़े नुकसान से बचाने के लिए इसके हाई वॉटर टेम्परेचर सुरक्षा डिवाइस (अत्यधिक गर्म होने पर इंजन को बचाने वाला सिस्टम) और लो ल्यूब ऑइल प्रेशर सुरक्षा डिवाइस (तेल का दबाव अत्यधिक कम होने पर इंजन बंद करने वाला सिस्टम) की कार्यक्षमता का वास्तविक परीक्षण करें। इंजन के मुख्य थ्रॉटल कंट्रोल लिंकेज का निरीक्षण करें और इसके मुख्य माउंटिंग फाउंडेशन बोल्टों की जकड़न की पुष्टि करें। रेडिएटर फैन की मैकेनिकल ड्राइव को अच्छी तरह से ग्रीस करें।
- मैकेनिक और ट्रांसमिशन: इंजन से लेकर गियर बॉक्स तक जाने वाले सभी कार्डन शाफ्टों की गहन ग्रीसिंग करें। यूनिवर्सल जॉइंट्स में आने वाले किसी भी प्रकार के प्ले (ढीलेपन) की बारीकी से जांच करें और दोष होने पर उन्हें तुरंत बदलें। बोगी के टर्निंग पिन और सभी ब्रेक लिंकेज की उचित ग्रीसिंग करें।
- मेज़रिंग और लिफ्टिंग गियर: मशीन की सभी लाइटों को चेक करें। ब्रेक शूज़ की घिसावट की स्थिति देखें और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें बदलें। बीच की मेज़रिंग बोगी के फीलर रोलर्स के प्ले की जांच करें। जब लिफ्टिंग यूनिट पूरी तरह नीचे झुकी हुई स्थिति में हो, तब लिफ्टिंग रोलर डिस्क और रेल हेड (पटरी के शीर्ष) के बीच की सटीक क्लियरेंस की जांच करें। ट्रांसड्यूसर्स की गाइड रॉड में आने वाले किसी भी प्रकार के मोड़ का निरीक्षण करें और उनके बोल्ट कसें। सभी मेज़रिंग उपकरणों के नट-बोल्ट और ब्रेक सिलेंडर के फाउंडेशन बोल्टों की जकड़न सुनिश्चित करें। सैटेलाइट एक्सेल के सपोर्ट सिलेंडर के कामकाज की अंतिम जांच करें।
भाग 10: मध्यवर्ती, दीर्घकालिक रखरखाव अनुसूचियाँ, आवश्यक टूल एवं महत्वपूर्ण तकनीकी सीमाएँ (Long-term Maintenance, Spares & Technical Limits)
09-32 CSM मशीन की विश्वसनीयता को दीर्घकाल तक बनाए रखने के लिए, दैनिक एवं साप्ताहिक जांचों के अलावा आवधिक मध्यवर्ती रखरखाव (Periodic Intermediate Maintenance), इंटरमीडिएट ओवरहॉलिंग (IOH) और पीरियोडिक ओवरहॉलिंग (POH) की विस्तृत प्रणालियाँ लागू की जाती हैं। इसके साथ ही आपातकालीन परिस्थितियों के लिए मशीन पर अनिवार्य सुरक्षा उपकरणों और महत्वपूर्ण पुर्जों का स्टॉक होना आवश्यक है।
आवधिक रखरखाव अनुसूचियाँ (Periodic Maintenance Schedules)
200, 400, 600 और 800 इंजन कार्य-घंटों के पश्चात (समयावधि: दो दिवस)
यह अनुसूची हर 200 इंजन घंटों के गुणकों पर दोहराई जाती है, जिसमें मुख्य रूप से फिल्टरों को बदलने और प्रणालियों के कैलिब्रेशन पर जोर दिया जाता है:
- इंजन एवं सहायक इकाइयाँ: इंजन ऑयल और ल्यूब ऑइल फिल्टर को बदलें। फ्यूल प्री-फिल्टर और सेकेंडरी फिल्टर तत्वों (Filter Elements) को बदलें। इंजन सेंट्रीफ्यूज और क्रैंककेस एयर ब्रीदर को साफ करें। वाल्व असेंबली के टैपेट क्लियरेंस (Tappet Clearance) की जांच कर उसे एडजस्ट करें। कूलिंग कॉइल और आउटर एयर क्लीनर एलिमेंट को साफ करें। कंप्रेसर ब्रीदर की सफाई करें तथा इसके फिल्टर को प्रत्येक 500 घंटों पर बदलें। बैटरियों के इलेक्ट्रोलाइट के विशिष्ट गुरुत्व (Specific Gravity) की जांच करें।
- गियर बॉक्स और ऑयल ट्रांसमिशन: हाइड्रोलिक ड्राइव रिडक्शन गियर बॉक्स, सैटेलाइट एक्सेल गियर बॉक्स, इंटरमीडिएट ड्राइव शाफ्ट, सभी एक्सेल गियर बॉक्स और फंक गियर बॉक्स (Funk Gear Box) के पुराने तेल को निकालकर नया गियर ऑइल डालें। ZF गियर बॉक्स का ऑयल प्रत्येक 500 घंटों पर बदलें। इसके साथ ही डिस्ट्रीब्यूशन गियर बॉक्स का ऑइल भी बदलें।
- फिल्टर और हाइड्रोलिक पुर्जे: हाइड्रोलिक सिस्टम के रिटर्न लाइन फिल्टर एलिमेंट, प्रोपोर्शनल वाल्व फिल्टर एलिमेंट, सर्वो वाल्व फिल्टर एलिमेंट, एक्सियल पिस्टन पंप फिल्टर और सक्शन फिल्टरों को अनिवार्य रूप से बदलें। सभी प्रेशर कंट्रोल्स को उनकी रेटेड सेटिंग्स के अनुसार जांचें।
- कैलिब्रेशन और सुरक्षा: मशीन के सबसे संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक कार्यों जैसे क्रॉस लेवल (Cross Level), लाइनिंग (Lining) और टैम्पिंग यूनिट की गहराई (Tamping Depth) का सटीक कैलिब्रेशन (Calibration) करें। सभी कार्डन शाफ्टों का निरीक्षण करें कि कहीं उनमें क्रैक तो नहीं है। पेंडुलम ब्रिज के पिवोट्स और हैंड ब्रेक गियर को ग्रीस करें। हाइट ट्रांसड्यूसर की कैरियर रॉड, शॉक एब्जॉर्बर और मेज़रिंग/लाइनिंग ट्रॉलियों के ट्रांसड्यूसर फिटिंग्स की जांच करें।
“1000, 3000 और 5000 इंजन घंटों के बाद (अवधि: सात दिन)”
इस दीर्घकालिक अनुसूची में प्रणालियों की आंतरिक सफाई और लैब टेस्टिंग शामिल है:
- हाइड्रोलिक ऑयल की शुद्धि: पूरे हाइड्रोलिक टैंक के तेल को 10-माइक्रोन के पोर्टेबल फिल्टर (Porta Filter) से गुजारकर साफ करें। तेल का एक सैंपल भौतिक और रासायनिक परीक्षण (Physical & Chemical Test) के लिए प्रयोगशाला भेजें। यदि रिपोर्ट असंतोषजनक हो, तो पूरे रिज़र्वायर को साफ कर नया तेल भरें।
- इंजन और इलेक्ट्रिकल ओवरहॉल: डीजल फ्यूल टैंक को लिंट-फ्री (बिना रोएं वाले) कपड़े से पूरी तरह साफ करें। इंजन के सभी वॉटर होज़ेस (Water Hoses) को बदलें। रेडिएटर फैन के आरपीएम (RPM) की जांच करें। एयर कंप्रेसर के तेल को बदलें और आवश्यक हो तो कंप्रेसर का ओवरहॉल करें। सेल्फ-स्टार्टर और दोनों अल्टरनेटरों (I & II) को खोलकर वर्कशॉप में ओवरहॉल करें। इंजन टाइमिंग और इंजेक्टर्स/फ्यूल इंजेक्शन पंप का पूर्ण ओवरहॉल करें। आवश्यकतानुसार बैटरियों को बदलें।
- मैकेनिकल फिटिंग्स: सभी एक्सेल के बेयरिंग्स और ट्रॉली व्हील के बेयरिंग्स को खोलकर चेक करें और नई ग्रीसिंग करें। मैगी स्प्रिंग्स (Meggy Springs) और एयर अनलोडर की जांच कर मरम्मत करें। सभी ट्रांसड्यूसर के तारों के इंसुलेशन को चेक करें। यदि आवश्यक हो, तो पूरी टैम्पिंग यूनिट और लिफ्टिंग यूनिट को बदलकर ओवरहॉल की गई नई यूनिट स्थापित करें। सभी सेंसिंग उपकरणों को दोबारा कैलिब्रेट करें और ब्रेक शूज़ बदलें।
“2000 और 4000 इंजन घंटों के बाद – मध्यवर्ती ओवरहॉल (IOH – अवधि: 45 दिन)”
यह कार्य बेस वर्कशॉप या डिपो में किया जाता है, जहाँ मशीन के ढांचे को मजबूती दी जाती है:
- पावर पैक: इंजन का टॉप ओवरहॉल (Top Overhaul) करें। रेडिएटर फैन ड्राइव के बेयरिंग और शाफ्ट को दुरुस्त करें। इंजन के पुराने माउंटिंग पैड्स (Mounting Pads) को हटाकर नए पैड्स लगाएं। वॉटर पंप का पूर्ण ओवरहॉल करें और इंजन रेडिएटर को एसिड/केमिकल वाश से साफ करें।
- हाइड्रोलिक एवं न्यूमैटिक सील: सभी हाइड्रोलिक पंपों और हाइड्रोलिक मोटरों के परफॉर्मेंस की वास्तविक जांच करें। सभी डायरेक्ट करंट (D.C.) वाल्वों के लीकेज को ठीक करें। सबसे महत्वपूर्ण बात, मशीन के सभी हाइड्रोलिक और न्यूमैटिक सिलेंडरों की पुरानी सील (Seals) और ग्लैंड बुश/पिस्टन को अनिवार्य रूप से बदलें। ब्रेक सिलेंडरों की सील और ब्रेक लाइनों की न्यूमैटिक पाइपों को भी बदलें।
- होज़ और मैकेनिकल स्ट्रक्चर: बाहरी रगड़ (External Abrasion) से क्षतिग्रस्त हुए सभी हाइड्रोलिक होज़ पाइपों को बदलें और जहां क्लैंप गायब हैं, वहां नए क्लैंप लगाएं। वॉटर सेपरेटर और एयर ऑइलर का पूर्ण ओवरहॉल करें। मशीन के मुख्य लोहे के चेसिस/फ्रेम में जहाँ भी कंपन के कारण बारीक क्रैक विकसित हुए हों, वहां वेल्डिंग करके फ्रेम को मजबूत (Strengthen) करें। पहियों के टायर डिफेक्ट्स की जांच करें और ज़रूरत पड़ने पर पहियों की री-प्रोफाइलिंग (Reprofiling) या उन्हें बदलने का कार्य करें। शॉक एब्जॉर्बर बदलें और क्षतिग्रस्त पेंट वाले हिस्सों पर पैच पेंटिंग करें। सभी इलेक्ट्रिकल पैनल बॉक्सों को साफ कर खराब हो चुके स्विच और पोटेंशियोमीटर बदलें।
6000 इंजन घंटों के बाद – पीरियोडिक ओवरहॉल (POH)
यह मशीन के जीवनकाल का सबसे बड़ा रखरखाव कार्य है, जिसमें मशीन को पूरी तरह से खोलकर ‘फैक्ट्री रीसेट’ की स्थिति में लाया जाता है:
- इंजन: इंजन की कंडीशन के आधार पर उसका पूर्ण ओवरहॉल या उसे नए इंजन से रिप्लेस (बदलना) किया जाता है। इंजेक्टर्स, फ्यूल पंप, कंप्रेसर, सेल्फ-स्टार्टर, अल्टरनेटर, रेडिएटर फैन ड्राइव असेंबली का शत-प्रतिशत ओवरहॉल होता है। नए फिल्टर, नई होज़ पाइप और नए माउंटिंग पैड्स लगाए जाते हैं। इंजन डैम्पर की जांच की जाती है।
- हाइड्रोलिक तंत्र का नवीनीकरण: मशीन के सभी हाइड्रोलिक पंप और हाइड्रोलिक मोटर्स को नए पुर्जों से बदल दिया जाता है। सभी हाइड्रोलिक सिलेंडरों, होज़ पाइपों और प्रेशर फिल्टरों को नया लगाया जाता है। हाइड्रोलिक टैंक के भीतर की पुरानी कोटिंग साफ करके विशेष अप्रूव्ड पेंट से दोबारा पेंट किया जाता है। सभी डायरेक्ट एक्टिंग और पायलट ऑपरेटेड डी.सी. वाल्वों तथा प्रेशर कंट्रोल वाल्वों को बदल दिया जाता है। प्रोपोर्शनल और सर्वो वाल्वों को विशेष प्रयोगशाला में कैलिब्रेट कराया जाता है। हाइड्रोलिक एक्युमुलेटरों की नाइट्रोजन गैस की रीचार्जिंग की जाती है।
- न्यूमैटिक एवं मैकेनिकल: कंप्रेसर की कूलिंग कॉइल, एयर अनलोडर, वॉटर सेपरेटर, एयर ऑइलर, सभी न्यूमैटिक होज़, न्यूमैटिक वाल्व और न्यूमैटिक सिलेंडरों को नया लगाया जाता है। एयर टैंकों का प्रेशर टेस्ट (Pressure Test) किया जाता है। टैम्पिंग और लिफ्टिंग यूनिटों को पूरी तरह ओवरहॉल या नया लगाया जाता है। सभी ट्रॉलियों, पहियों, फीलर रोलर्स और एक्सेल बेयरिंग्स को दुरुस्त किया जाता है। बोगी के कॉइल स्प्रिंग्स (Coil Springs) और कार्डन शाफ्ट के यूनिवर्सल क्रॉस-बेयरिंग्स को बदला जाता है। पूरी मशीन को सैंडब्लास्ट करके दोबारा नया मानक रेलवे पेंट किया जाता है।
- इलेक्ट्रिकल री-वायरिंग: मुख्य इलेक्ट्रॉनिक केबल्स का इंसुलेशन टेस्ट (Megger Test) किया जाता है और कमजोर वायरिंग को पूरी तरह बदला जाता है। सभी दोषपूर्ण पीसीबी (PCBs), लिमिट स्विच, इंडिकेटर मीटर, पैनल बॉक्स, स्विच, सोलेनोइड एलईडी (LED) और डिजिटल पोटेंशियोमीटर नए लगाए जाते हैं। पेंडुलम और ट्रांसड्यूसर का पूर्ण ओवरहॉल कर पूरी मशीन को लिफ्टिंग और अलाइनमेंट के लिए अंतिम रूप से कैलिब्रेट किया जाता है।
अनिवार्य ऑन-बोर्ड सुरक्षा उपकरण सूची (List of Safety Equipments)
आपातकालीन सुरक्षा स्थितियों से निपटने के लिए मशीन के भीतर निम्नलिखित उपकरणों का हर समय मौजूद रहना कानूनन अनिवार्य है:
- पटाखे (Detonators): 1 बॉक्स (आपातकाल में ट्रेन रोकने के लिए रेलवे ट्रैक पर लगाए जाने वाले विस्फोटक संकेत)
- हैंड सिग्नल झंडे (H.S. Flags): लाल झंडे (2 नंबर्स), हरा झंडा (1 नंबर)
- त्रि-रंग लैंप (H.S. Tri-colour Lamps): 2 नंबर्स (रात में संकेत देने के लिए)
- लोहे की चेन और ताला (Chain & Padlock): 1 सेट (मशीन को यार्ड में सुरक्षित बांधने के लिए)
- मैकेनिकल जैक विथ ट्रेवरसर: 25 टन क्षमता का 1 नंबर (पटरी से उतरने या भारी लिफ्टिंग के लिए)
- क्रॉ बार (Crow Bars – साबल): 4 नंबर्स / बीटर्स (Beaters – कुदाली): 4 नंबर्स
- लकड़ी के गुटके (Wooden Blocks): विभिन्न आकारों के कुल 8 नंबर्स
- डायल टाइप रेल थर्मामीटर: 1 नंबर (पटरी का वास्तविक तापमान मापने के लिए)
- बैनर फ्लैग (Banner Flag): 2 नंबर्स (कार्य स्थल की सुरक्षा के लिए ट्रैक पर बांधने हेतु)
- पोर्टेबल कंट्रोल फोन: 1 नंबर (सीधे रेलवे कंट्रोलर से आपातकालीन संपर्क के लिए)
- प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स (First Aid Box): 1 नंबर / पहिया स्किड्स (Skids): 4 नंबर्स (पार्किंग सुरक्षा के लिए)
- वाकी-टॉकी सेट (Walkie-Talkie): 1 नंबर (स्टेशन मास्टर और ड्राइवर के बीच संपर्क हेतु)
मशीन स्टोर में रखे जाने वाले क्रिटिकल स्पेयर पार्ट्स (Critical Spares & Tools)
काम के दौरान किसी पाइप या सील के फटने पर तुरंत साइट पर मरम्मत करने के लिए मशीन के टूल-बॉक्स/स्टोर में निम्नलिखित अतिरिक्त पार्ट्स हमेशा होने चाहिए:
- हाइड्रोलिक सील सेट्स: छोटे स्क्वीज़िंग सिलेंडर की सील (2 सेट्स), बड़े स्क्वीज़िंग सिलेंडर की सील (2 सेट्स), टैम्पिंग अप/डाउन सिलेंडर की सील (2 सेट्स) तथा पिस्टन लॉकिंग स्क्रू (प्रत्येक के 2 नंबर्स)।
- यांत्रिक पुर्जे: 35 mm कनेक्टिंग रॉड पिन (2 नंबर्स), क्लैपर सिलेंडर पिन (1 सेट), क्लैपर ब्रैकेट (2 नंबर्स), रिप्लेसमेंट के लिए कट्टेड और मानक टैम्पिंग टूल्स का 1 पूरा सेट, टूल बोल्ट और कैप (8-8 नंबर्स), लोकेटिंग स्क्रू (8 नंबर्स) और लिफ्टिंग क्लैंप रोलर (2 नंबर्स)।
- ट्रांसड्यूसर और फिल्टर: टैम्पिंग डेप्थ और वर्साइन ट्रांसड्यूसर की विशेष स्टील कॉर्ड वायर (7-7 मीटर), मुख्य 2 mm मेज़रिंग कॉर्ड वायर (40 मीटर), ट्रांसड्यूसर कैरियर्स (2-2 नंबर्स)। प्रोपोर्शनल फिल्टर (1 नंबर), सर्वो वाल्व फिल्टर (2 नंबर्स), ZF इन-लाइन फिल्टर (1 नंबर), वेरिएबल पंप फिल्टर (2 नंबर्स), रिटर्न लाइन फिल्टर (2 नंबर्स)। इसके साथ ही इंजन के ल्यूब ऑइल, फ्यूल और एयर फिल्टरों का 1-1 पूरा सेट।
- हाइड्रोलिक और न्यूमैटिक होज़ पाइप: विभिन्न साइज़ (जैसे 2781-4, 2781-6, 2781-8, 2781-12, 2781-20 आदि) के स्पेयर फिटिंग्स और क्रिम्पड कपलिंग्स के साथ प्रत्येक के 5-5 मीटर के टुकड़े। न्यूमैटिक होज़ (12.5mm का 15 मीटर और 6.3mm का 10 मीटर)।
- इलेक्ट्रिकल एवं विशेष टूल्स: इलेक्ट्रिकल रिले (ELT-663 और 7002/S4 के 2-2 नंबर्स), 4A के फ्यूज (4 नंबर्स), मुख्य EK 813 कनवर्टर पीसीबी (1 नंबर), हेडलाइट/वर्किंग लाइट बल्ब (2 नंबर्स), थिबल्स (20 नंबर्स), डिस्टिल्ड वॉटर (4 लीटर)। मानक टूल सेट के साथ पिस्टन लॉकिंग स्क्रू खोलने का विशेष सॉकेट स्पैनर, डिज़िटल मल्टीमीटर (Digital Multimeter), गेज-कम-लेवल (Gauge-cum-level), 50 टन का मैकेनिकल जैक, 5 टन का फुट-लिफ्टिंग जैक और 2 टन क्षमता का टरफर (Turfer)।
आरडीएसओ द्वारा निर्धारित महत्वपूर्ण तकनीकी सीमाएँ (Critical Technical Limits)
ब्लॉक के दौरान बेहतरीन पैकिंग गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित कठोर तकनीकी सीमाओं का पालन करना अनिवार्य है, जिनमें किसी भी प्रकार का मानवीय समझौता प्रतिबंधित है:
- रेडिएटर वॉटर केमिकल: रेडिएटर के पानी में जंग और स्केलिंग रोकने के लिए Nal cool 2000 केमिकल को 500 ml प्रति 15 लीटर पानी के अनुपात में मिलाना अनिवार्य है।
- इंजन ल्यूब ऑइल ग्रेड: मुख्य इंजन में हमेशा API CF-4 15W40 ग्रेड के ल्यूब ऑइल का ही उपयोग किया जाएगा।
- ऑयल प्रेशर की सीमा: दो घंटे लगातार काम करने के बाद, रेटेड आरपीएम पर इंजन का न्यूनतम ऑयल प्रेशर लोड पर 2.5 kg/sq.cm और आइडल (Idle) स्पीड पर न्यूनतम 1.5 kg/sq.cm होना अनिवार्य है। इससे कम प्रेशर इंजन फेलियर का संकेत है।
- गियर बॉक्स ऑयल ग्रेड: मुख्य ZF गियर बॉक्स में भी API CF-4 15W40 ऑयल का उपयोग होता है, जबकि ZF को छोड़कर मशीन के अन्य सभी गियर बॉक्सों (Axle, Distribution, Reduction) में SAE-90 ग्रेड का गियर ऑइल भरा जाता है।
- टूल घिसावट सीमा: क्षेत्र (Area) के आधार पर किसी भी टैम्पिंग टूल ब्लेड का घिसाव अधिकतम 20% तक ही अनुमत है। 20% से अधिक घिसे हुए टूल को तुरंत बदला जाना चाहिए। बेहतर पैकिंग गुणवत्ता के लिए टुकड़ों में टूल बदलने के बजाय टूल्स का पूरा सेट एक साथ बदलना सबसे उत्तम माना जाता है।
- न्यूमैटिक एवं मैकेनिकल क्लियरेंस:
- लॉक पोजीशन में एयर ब्रेक का दबाव न्यूनतम 4 bar होना चाहिए।
- ब्रेक शूज़ का पहिये से क्लियरेंस हमेशा 3 से 5 mm के बीच एडजस्ट होना चाहिए।
- यदि ब्रेक शू की मोटाई घिसकर किसी भी बिंदु पर 13 mm या उससे कम हो जाती है, तो उसे तुरंत बदलें।
- वी-बेल्ट के केंद्र पर तनाव (Tension) चेक करने पर उसका झुकाव 15 mm से अधिक नहीं होना चाहिए।
- लिफ्टिंग रोलर डिस्क की दूरी: जब लिफ्टिंग यूनिट नीचे झुकी हुई स्थिति में हो, तो रेल हेड के नीचे रोलर डिस्क की क्लियरेंस पिछले हिस्से (Rear) के लिए बिल्कुल 5 mm और अगले हिस्से (Front) के लिए 12 mm होनी चाहिए।
- ट्रांसड्यूसर और कूलिंग फैन मानक: लाइनिंग ट्रांसड्यूसर के कैरियर और संदर्भ तार के बीच का वर्टिकल गैप हमेशा स्टील वायर के व्यास (Diameter) से ठीक 0.1 mm अधिक होना चाहिए। समुचित कूलिंग के लिए इंजन के रेडिएटर फैन की घूर्णन गति 1600 RPM से कम नहीं होनी चाहिए। यदि रेडिएटर कोर 20% से अधिक ब्लॉक या चोक हो चुका है, तो उसे तुरंत बदलें।
भाग 11: लुब्रिकेंट्स क्षमता और विशिष्ट ऑयल/ग्रीस चार्ट (Lubricants Specification & Capacity Chart)
09-32 CSM ट्रैक मशीन में सैकड़ों गतिशील और घूर्णन करने वाले पुर्जे होते हैं, जो अत्यधिक उच्च तापमान, कंपन और दबाव में काम करते हैं। इन पुर्जों को घिसने और सीज़ होने से बचाने के लिए सही ग्रेड के लुब्रिकेंट का सटीक मात्रा में होना अनिवार्य है। नीचे मशीन के सभी प्रमुख हिस्सों में उपयोग होने वाले तेल, ग्रीस और उनकी सटीक लीटर क्षमता का पूरा विवरण दिया गया है:
१. इंजन एवं गियर बॉक्स ऑयल चार्ट (Engine & Gearboxes)
- मुख्य डीजल इंजन (Engine Oil): इंजन के आंतरिक भागों के उचित स्नेहन के लिए Cummins Valvoline 15 W-40 ऑयल का उपयोग किया जाता है। इसकी कुल क्षमता 43 लीटर होती है।
- ZF हाइड्रोडायनामिक गियर बॉक्स (Power Shift Gear Box): इस मुख्य गियर बॉक्स की सुचारू शिफ्टिंग के लिए Servo Premium CF4 15 W40 ऑयल का उपयोग किया जाता है। इसमें कुल 66 लीटर तेल आता है। (नोट: कुछ पुराने मॉडलों में ओईएम मैनुअल के अनुसार इसमें 45 लीटर की क्षमता के साथ 15W40 का उपयोग भी किया जाता है)।
- एक्सल गियर बॉक्स (Axle Gearboxes – Axle 1 & 2): दोनों ड्राइविंग एक्सल गियर बॉक्स के लिए Gear Super 80 W90 (Servo) तेल का उपयोग किया जाता है। प्रत्येक एक्सल गियर बॉक्स की क्षमता 6.5 लीटर होती है।
- पंप डिस्ट्रीब्यूटर गियर बॉक्स / फंक गियर बॉक्स: हाइड्रोलिक पंपों को चलाने वाले इस गियर बॉक्स में Servo Premium CF4 15 W40 ऑयल डाला जाता है, जिसकी कुल क्षमता 3.5 लीटर होती है।
- कार्डन शाफ्ट पावर डिवाइडर (Cardan Shaft Power Divider): इसके लिए Gear Super 80 W90 (Servo) ऑयल निर्धारित है, जिसकी क्षमता 3 लीटर है।
- हाइड्रोलिक वर्किंग ड्राइव रिडक्शन गियर बॉक्स: वर्क ड्राइव के आरपीएम को कम करने वाले इस गियर बॉक्स में Gear Super 80 W90 (Servo) ऑयल का उपयोग होता है, जिसकी क्षमता 2 लीटर होती है।
- इंटरमीडिएट ड्राइव शाफ्ट (Intermediate Drive Shaft): इसके लिए Gear Super 80 W90 (Servo) ऑयल का उपयोग किया जाता है, जिसकी कुल क्षमता 0.5 लीटर होती है।
- सैटेलाइट ड्राइव गियर बॉक्स (Satellite Drive Gearbox): सैटेलाइट फ्रेम को गति देने वाले इस छोटे गियर बॉक्स में Gear Super 80 W90 (Servo) तेल डलता है, जिसकी क्षमता 0.75 लीटर होती है।
मुख्य हाइड्रोलिक और न्यूमैटिक प्रणालियाँ (Hydraulics & Pneumatics)
- मुख्य हाइड्रोलिक टैंक (Hydraulic Oil Reservoir): पूरी मशीन की रीढ़ माने जाने वाले हाइड्रोलिक सिस्टम के लिए शेल कंपनी के विशेष Tellus Oil S2M68 (Shell) या HLP 68 ग्रेड के हाइड्रोलिक ऑइल का उपयोग किया जाता है। इस विशाल टैंक की कुल क्षमता 1300 लीटर होती है।
- न्यूमैटिक लुब्रिकेटर्स (Pneumatic Lubricators / Air Oiler): हवा के दबाव से चलने वाले वाल्व और सिलेंडरों को भीतर से चिकना रखने के लिए न्यूमैटिक ऑइलर में Tellus Oil S2M68 (Shell) का उपयोग किया जाता है। इसकी क्षमता 0.25 लीटर होती है।
वर्किंग असेंबली और बेयरिंग लुब्रिकेशन (Working Assemblies)
- टैम्पिंग आर्म बेयरिंग्स (Tamping Arm Bearings): भारी कंपन झेलने वाले दोनों टैम्पिंग आर्म्स के बेयरिंग्स के लुब्रिकेशन के लिए Tellus Oil 100 (Shell) का उपयोग किया जाता है। इसकी कुल क्षमता लगभग 3 लीटर होती है।
- वाइब्रेशन शाफ्ट मुख्य कपलिंग्स (Vibration Shaft Main Couplings): वाइब्रेशन को ट्रांसफर करने वाली दोनों मुख्य कपलिंग्स के लिए Tellus Oil 100 (Shell) ऑयल निर्धारित है, जिसकी क्षमता लगभग 2.5 लीटर होती है।
- इंजन कूलिंग एजेंट (Engine Cooling Agent / Anti-freeze): इंजन को अत्यधिक ठंडा या गर्म होने से बचाने के लिए रेडिएटर में 50/50 अनुपात में Glycoshell और साफ पानी का मिश्रण डाला जाता है, जो -25°C तक प्रभावी रहता है। इसकी कुल क्षमता 80 लीटर होती है।
सेंट्रलाइज्ड और मल्टीपर्पज ग्रीस मानकों (Grease Specifications)
मशीन की स्वचालित ग्रीसिंग प्रणाली और अन्य मैन्युअल ग्रीसिंग पॉइंट्स के लिए साधारण ग्रीस का उपयोग पूरी तरह वर्जित है। इसके लिए केवल निम्नलिखित विशेष ग्रेड का उपयोग किया जाता है:
- स्वचालित सेंट्रलाइज्ड लुब्रिकेशन (Centralized Lubrication): सैटेलाइट और टैम्पिंग बैंक के गाइड रोलर्स को लगातार ग्रीस देने वाले इस ऑटो-सिस्टम में केवल Alvania Grease RL2 (Shell) का उपयोग किया जाता है। ग्रीस कंटेनर की कुल भंडारण क्षमता 5 किलोग्राम होती है, जिसे हमेशा क्विक रिलीज कपलिंग के माध्यम से ही भरा जाना चाहिए।
- सामान्य बहुउद्देशीय ग्रीसिंग (Multipurpose Grease): मशीन के अन्य सभी पिवोट जॉइंट्स, बोगी किंग पिन और मैकेनिकल लिंकेज के लिए भी Alvania Grease RL2 (Shell) का ही उपयोग अनिवार्य है।
महत्वपूर्ण सावधानियाँ: क्या करें और क्या न करें (Do’s & Don’t’s)
मशीन को बड़े फेलियर और दुर्घटनाओं से बचाने के लिए फील्ड में काम करते समय निम्नलिखित सख्त दिशा-निर्देशों का पालन करना आवश्यक है:
क्या करें (Do’s):
- हमेशा रिसर्च डिज़ाइन्स एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन (RDSO) और ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर (OEM) द्वारा निर्धारित रखरखाव शेड्यूल (Maintenance Schedule) का कड़ाई से पालन करें।
- ऑटो-लुब्रिकेशन सिस्टम की लगातार निगरानी करें और उसमें केवल अनुशंसित Shell Alvania RL2 या उसके समकक्ष ग्रेड का विशेष ग्रीस ही भरें।
- रात में काम करते समय (Night Working) कार्य स्थल पर पर्याप्त और उच्च क्षमता वाली रोशनी (Site Lighting) की व्यवस्था सुनिश्चित करें।
- काम समाप्त होने के बाद, ट्रैक के मापे गए सभी अंतिम पैरामीटर्स (Cross Level, Alignment, Unevenness) को तुरंत रिकॉर्डर में दर्ज और प्रिंट करें।
क्या न करें (Don’ts):
- टो करने के नियम (Towing): ZF गियर बॉक्स के फाइनल ड्राइव (Final Drive) को अलग (Disengage) किए बिना मशीन को कभी भी किसी दूसरे इंजन या मशीन से टो (खींचना) न करें।
- ओवरहीटिंग स्थिति: यदि इंजन अत्यधिक गर्म (Overheating) होने का संकेत दे रहा है, तो इंजन को तुरंत कभी बंद न करें। ऐसा करने से इंजन सीज़ हो सकता है। सबसे पहले मशीन का लोड (Load) पूरी तरह हटा दें और इंजन को कुछ देर आइडल चलने दें ताकि तापमान धीरे-धीरे कम हो सके।
- सुरक्षा बाईपास: किसी विशेष सेक्शन या सेंसर के फेल होने पर मशीन की समग्र सुरक्षा प्रणाली (Overall Safety) को कभी भी बाईपास न करें। उदाहरण के लिए, यदि फ्रंट ट्रॉली का लॉकिंग सेंसर फेल होता है, तो केवल उस सेंसर को बाईपास करें, पूरी मशीन की सुरक्षा चेन को नहीं।
- इग्निशन की: मशीन को पूरी तरह रोकने और न्यूट्रल करने से पहले कभी भी ड्राइविंग चाबी (Driving Key) को इग्निशन से बाहर न निकालें।
- सुरक्षित पार्किंग: मशीन को ब्लॉक साइट पर या यार्ड में छोड़ते समय पार्किंग ब्रेक लगाना, हैंड ब्रेक कसना और पहियों के नीचे लकड़ी/लोहे के स्किड्स (Skids) लगाना कभी न भूलें।
आपातकालीन जंप-स्टार्ट तकनीक (Emergency Battery Jump-Start Method)
यदि फील्ड में काम के दौरान या ब्लॉक से पहले मशीन की मुख्य बैटरियां पूरी तरह डिस्चार्ज (Incapacitated Battery) हो जाती हैं, तो किसी दूसरी मशीन या डोनर वाहन की बैटरी की मदद से आपातकालीन जंप-स्टार्ट करने का सही और सुरक्षित वैज्ञानिक तरीका निम्नलिखित है:
- वोल्टेज मिलान: केवल उसी डोनर वाहन की बैटरी से कनेक्शन जोड़ें जिसकी रेटेड वोल्टेज मशीन की बैटरी (24V) के बिल्कुल समान हो।
- इंजन बंद: कनेक्शन शुरू करने से पहले दोनों वाहनों (मशीन और डोनर गाड़ी) के इंजन पूरी तरह बंद होने चाहिए।
- कनेक्शन का क्रम (Connecting Sequence):
- सबसे पहले डोनर बैटरी के पॉजिटिव (+) टर्मिनल को मशीन की बैटरी के पॉजिटिव (+) टर्मिनल से जोड़ें।
- इसके बाद, डोनर बैटरी के नेगेटिव (-) टर्मिनल से केबल जोड़ें।
- इस नेगेटिव केबल के दूसरे सिरे को मशीन की बैटरी के टर्मिनल पर लगाने के बजाय, मशीन के इंजन ब्लॉक या चेसिस पर किसी साफ और चमकदार धातु वाले हिस्से (Metallically Bright Point) पर अर्थिंग के रूप में जोड़ें, जो बैटरी से पर्याप्त दूरी पर हो।
- स्टार्टिंग: अब असमर्थ मशीन के इंजन को अधिकतम 15 सेकंड के लिए क्रैंक (स्टार्ट) करें। इस दौरान डोनर वाहन का इंजन चालू नहीं होना चाहिए।
- डिस्कनेक्शन का क्रम (Disconnecting Sequence): इंजन शुरू होने के बाद, केबलों को जोड़ने के ठीक विपरीत क्रम (Reverse Order) में एक-एक करके सुरक्षित रूप से हटा दें (पहले नेगेटिव अर्थिंग, फिर पॉजिटिव)।
साइट पर खराबी ठीक करने की तकनीकें (Field Troubleshooting Techniques)
जब ब्लॉक सेक्शन के भीतर काम के दौरान मशीन अचानक फेल हो जाती है, तो रेल ट्रैफिक को बाधित होने से बचाने के लिए ऑपरेटर को दो मुख्य रणनीतियों पर काम करना होता है: सेक्शन क्लियर करना (To clear the section) और साइट पर खराबी को दुरुस्त करना (To rectify failures)।
१. ब्लॉक सेक्शन खाली करने के नियम (Clearing the Block Section)
- त्वरित निर्णय: खराबी आते ही बिना समय गंवाए तुरंत प्रतिक्रिया दें, इससे पहले कि हाइड्रोलिक प्रेशर या न्यूमैटिक प्रेशर पूरी तरह खत्म हो जाए। उदाहरण के लिए, यदि ब्रेक सिस्टम के चार्जिंग सर्किट में कोई लीकेज है, तो तुरंत मुख्य लाइन को सुरक्षित करें।
- अनिवार्य बनाम वैकल्पिक प्रणाली: फेलियर के समय शांत दिमाग से यह पहचानें कि कौन सी प्रणाली काम करने के लिए अनिवार्य (Essential) है और किसे छोड़ा (Desirable) जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि इंजन सर्किट का प्रेशर स्विच फेल है, तो उसे कुछ समय के लिए दरकिनार कर सेक्शन खाली करने पर ध्यान दें।
- वैकल्पिक ऊर्जा का उपयोग: जो चीजें काम कर रही हैं, उनकी मदद से फेल हुए हिस्सों को संभालें। उदाहरण के लिए: यदि मशीन का मुख्य सिस्टम हाइड्रोलिक पंप (System Pump) पूरी तरह फेल हो जाता है, तो तुरंत वाइब्रेशन पंप (Vibration Pump) के हाइड्रोलिक प्रेशर का उपयोग करके मशीन की सभी वर्किंग यूनिट्स और सैटेलाइट फ्रेम को ऊपर उठाकर सुरक्षित लॉक करें और मशीन को चलाकर तुरंत ब्लॉक सेक्शन से बाहर ले आएं। हमेशा याद रखें: “बाईपास करना कभी भी खराबी का स्थायी समाधान नहीं होता।”
२. साइट पर खराबी ढूंढने के लिए आवश्यक उपकरण (Troubleshooting Tools)
साइट पर किसी इलेक्ट्रिकल या इलेक्ट्रॉनिक खराबी को खोजने के लिए टीम के पास निम्नलिखित दस्तावेज होने अनिवार्य हैं:
- लॉजिक चार्ट (Logic Chart)
- केबल लिस्ट (Cable List)
- जनरल इंजीनियरिंग ड्राइंग्स (General Drawings)
- ऑपरेटर मैन्युअल (Operators Manual)
- आरडीएसओ द्वारा अनुशंसित क्रिटिकल स्पेयर पार्ट्स की सूची
३. ड्राइंग और ऑपरेटर मैनुअल का मिलान कैसे करें?
मशीन के कंट्रोल पैनल पर प्रत्येक पुर्जे का एक विशेष कोडिंग नंबर होता है जिसके जरिए खराबी को सेकंडों में पकड़ा जा सकता है।
- उदाहरण कोड:
19f140- यहाँ शुरुआती संख्या
19पैनल बॉक्स के नंबर (Panel Number) को दर्शाती है। - बीच का अक्षर
fपुर्जे के प्रकार को दर्शाता है, जैसेfका मतलब पोटेंशियोमीटर (Potentiometer) होता है। - अंतिम संख्या
140उस विशिष्ट कंपोनेंट का नंबर (Component Number) है।
- यहाँ शुरुआती संख्या
- खोजने का तरीका: कोड मिलते ही ऑपरेटर मैनुअल के 19वें पैनल के पन्ने पर जाएं, वहां पुर्जे नंबर 140 को ढूंढें और उसके कार्य (Function) को देखकर खराबी वाले सर्किट (जैसे वर्क ड्राइव स्पीड कंट्रोल सर्किट) को तुरंत मल्टीमीटर की मदद से चेक करके ठीक करें।
निष्कर्ष (Conclusion)
09-32 CSM (Continuous Action Tamping Machine) भारतीय रेलवे के स्थायी मार्ग (Permanent Way) के रखरखाव का एक आधुनिक इंजीनियरिंग चमत्कार है। जहाँ पुरानी इंटरमिटेंट मशीनें बार-बार रुकने और चलने के कारण ट्रैक और ऑपरेटर दोनों पर दबाव डालती थीं, वहीं CSM का मेन-फ्रेम और सैटेलाइट-फ्रेम वाला ‘दो-भाग डिज़ाइन’ कार्य क्षमता को सीधे 50% बढ़ा देता है। इसके यांत्रिक ट्रांसमिशन, जटिल हाइड्रोलिक सर्किट, संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसड्यूसर और न्यूमैटिक ब्रेकिंग प्रणालियों का यह विस्तृत विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि सही परिचालन प्रक्रियाओं और आरडीएसओ (RDSO) के कड़े रखरखाव मानकों का पालन करके ही हम न्यूनतम फेलियर दर के साथ शत-प्रतिशत सुरक्षित और कुशल आउटपुट प्राप्त कर सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: 09-32 CSM मशीन का मूल कार्य सिद्धांत क्या है?
उत्तर: यह मशीन ‘कंटीन्यूअस एक्शन’ (Continuous Action) के सिद्धांत पर काम करती है। काम के दौरान इसका मुख्य फ्रेम लगातार (Continuously) आगे बढ़ता रहता है, जबकि इसके नीचे लगा सैटेलाइट फ्रेम स्लीपर-दर-स्लीपर रुककर लिफ्टिंग, लाइनिंग और टैम्पिंग का काम साइक्लिक मोड में करता है।
प्रश्न 2: पुरानी CSM और नई CSM मशीनों में सबसे मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: नई CSM मशीन में P600 प्रोग्रामर सिस्टम, कंप्यूटर मापन प्रणाली (CMS), स्वचालित गाइडिंग कंप्यूटर (ALC) और एसपीएस डायग्नोसिस जैसी आधुनिक डिज़िटल प्रणालियाँ उपलब्ध हैं, जो पुरानी CSM (P500 सिस्टम) में उपलब्ध नहीं थीं। इसके अलावा नई मशीन में हाइड्रोलिक मोटर्स की संख्या 8 से बढ़ाकर 9 की गई है।
प्रश्न 3: कट्टेड टैम्पिंग टूल्स (Cut Tamping Tools) का उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर: डबल स्लीपर टैम्पिंग असेंबली में दोनों स्लीपरों के बीच की जगह बहुत कम होती है, जिससे अंदरूनी छोटे आर्म्स के टूल्स के आपस में टकराने का खतरा रहता है। इस टकराव से बचने के लिए टूल बोर की सेंटर लाइन को शिफ्ट किया जाता है और स्क्वीज़िंग एक्शन को एक सीधी रेखा में रखने के लिए कट्टेड टूल्स (70mm×110mm) का उपयोग होता है।
प्रश्न 4: कंक्रीट (PSC) स्लीपर के लिए आदर्श टैम्पिंग प्रेशर और स्क्वीज़िंग टाइम क्या है?
उत्तर: कंक्रीट स्लीपर के लिए आदर्श टैम्पिंग प्रेशर 110 से 120 kg/sq.cm होना चाहिए। वहीं गिट्टी के सर्वोत्तम संघनन (Compaction) के लिए आदर्श स्क्वीज़िंग समय 0.8 सेकंड से 1.2 सेकंड के बीच निर्धारित है।
प्रश्न 5: मशीन के हाइड्रोलिक टैंक की क्षमता कितनी है और इसमें कौन सा ऑयल उपयोग होता है?
उत्तर: इसके मुख्य हाइड्रोलिक टैंक की कुल क्षमता 1300 लीटर है और इसमें शेल कंपनी के विशेष Tellus Oil S2M68 या HLP 68 ग्रेड के हाइड्रोलिक ऑइल का उपयोग किया जाता है।
प्रश्न 6: आपातकालीन स्थिति में यदि मुख्य सिस्टम हाइड्रोलिक पंप फेल हो जाए तो सेक्शन कैसे क्लियर करते हैं?
उत्तर: ऐसी स्थिति में तुरंत वाइब्रेशन पंप (Vibration Pump) के हाइड्रोलिक प्रेशर का उपयोग करके मशीन की सभी वर्किंग यूनिट्स और सैटेलाइट फ्रेम को ऊपर उठाकर सुरक्षित लॉक किया जाता है और मशीन को चलाकर तुरंत ब्लॉक सेक्शन खाली किया जाता है।
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