Rail Joints Types and Track Welding: रेल की पटरियों को आपस में कैसे जोड़ा जाता है, जानिए पूरा सच!

1. भारतीय रेलवे ट्रैक टेक्नोलॉजी: रेल जोड़ों के प्रकार, गंभीर दोष और वेल्डिंग का संपूर्ण तकनीकी गाइड

रेलवे इंजीनियरिंग में पर्मानेंट वे (Permanent Way) या पी-वे (P.Way) उस बुनियादी ढांचे को कहा जाता है जिस पर ट्रेनें सुरक्षित रूप से दौड़ती हैं। एक आदर्श ट्रैक वह होता है जो कम से कम रखरखाव लागत में अधिकतम गति पर आरामदायक और सुरक्षित यात्रा प्रदान करे। हालांकि, पारंपरिक रेलवे ट्रैक में सबसे बड़ी बाधा Rail Joints Types and Track Welding होते हैं।

इस बेहद विस्तृत और तकनीकी गाइड के पहले भाग में, हम रेल जोड़ों के प्रकार, उनमें आने वाले गंभीर दोष (Defects), उनके दुष्प्रभाव और आधुनिक रेलवे द्वारा उन्हें वेल्डिंग के जरिए समाप्त करने की पूरी इंजीनियरिंग प्रक्रिया को गहराई से समझेंगे।


1. रेल जोड़ों के प्रकार (Types of Rail Joints)

भारतीय रेलवे के ट्रैक पर विभिन्न आवश्यकताओं, सिग्नलों की व्यवस्था और सुरक्षात्मक कारणों के आधार पर मुख्य रूप से 5 प्रकार के रेल जोड़ों का उपयोग किया जाता है:

क. साधारण फिश-प्लेटेड जोड़ (Ordinary Fish-Plated Joints)

यह रेलवे का सबसे पारंपरिक और बुनियादी जोड़ है। जब दो समान रेल सेक्शन (जैसे 60 किलोग्राम की दो पटरियाँ या 52 किलोग्राम की दो पटरियाँ) को लंबाई में एक सीध में जोड़ना होता है, तो साधारण फिश प्लेट का उपयोग किया जाता है।

  • बनावट: इसमें एक आई-सेक्शन (I-Section) जैसी फिश प्लेट होती है, जिसे रेल के दोनों तरफ रखकर चार या छह फिश-बोल्ट्स की मदद से कस दिया जाता है।
  • उद्देश्य: यह जोड़ पटरियों को आपस में क्षैतिज (Horizontal) और ऊर्ध्वाधर (Vertical) समतल में बांधकर रखता है, लेकिन तापमान बदलने पर पटरियों को फैलने या सिकुड़ने के लिए थोड़ा सा गैप (Standard Gap = 6mm) भी देता है।

ख. जोंगल फिश-प्लेटेड जोड़ (Joggle Fish-Plated Joints)

यह सुरक्षा की दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण जोड़ है। इसका उपयोग सामान्य ट्रैक पर नहीं, बल्कि आपातकालीन स्थितियों में किया जाता है।

  • विशेषता: इस फिश प्लेट का मध्य भाग बाहर की तरफ मुड़ा हुआ (Joggled) होता है।
  • उपयोग: जब किसी वेल्डेड जोड़ (Welded Joint) में कोई आंतरिक दरार (Crack) आती है या वह टूट जाता है, तो वेल्डिंग के उभरे हुए हिस्से (Weld Collar) के ऊपर साधारण फिश प्लेट नहीं बैठ सकती। ऐसी स्थिति में जोंगल फिश प्लेट उस उभार को अपने भीतर समा लेती है और टूटे हुए हिस्से को क्लैंप या बोल्ट की मदद से जकड़कर रखती है ताकि दुर्घटना न हो।

ग. इंसुलेटेड जोड़ (Insulated Joints)

आधुनिक रेलवे में सिग्नलों को स्वचालित (Automatic) बनाने और ट्रेनों की लाइव लोकेशन का पता लगाने के लिए ट्रैक सर्किटिंग (Track Circuiting) का उपयोग किया जाता है। इसमें पटरियों के भीतर कम वोल्टेज का विद्युत प्रवाह (Current) दौड़ाया जाता है।

  • कार्य प्रणाली: विद्युत प्रवाह को एक निश्चित सीमा या सेक्शन से आगे जाने से रोकने के लिए दो पटरियों के बीच इंसुलेटेड जोड़ लगाया जाता है।
  • सामग्री: इस जोड़ में फिश प्लेट और रेल के बीच, तथा बोल्ट्स के चारों ओर विशेष इंसुलेटिंग बुश और लाइनर्स लगाए जाते हैं, जो बिजली के प्रवाह को पूरी तरह रोक देते हैं।

घ. ग्लूड जोड़ (Glued Joints)

इंसुलेटेड जोड़ों का सबसे आधुनिक, मजबूत और फैक्टरी-निर्मित रूप ग्लूड जॉइंट (Glued Joint) कहलाता है।

  • निर्माण: इन्हें सीधे फील्ड में हाथ से नहीं बनाया जाता, बल्कि कारखाने में हाई-टेन्साइल बोल्ट्स और विशेष इपॉक्सी रेजिन (Epoxy Resin / Glue) की मदद से रेल के सिरों को फिश प्लेट के साथ स्थायी रूप से चिपका दिया जाता है।
  • लाभ: पारंपरिक इंसुलेटेड जोड़ों की तुलना में यह जोड़ ढीला नहीं पड़ता और भारी ट्रेनों का हाई एक्सल लोड (Axle Load) आसानी से झेल लेता है। यह मुख्य रूप से सिग्नल्ड और स्वचालित ब्लॉकिंग क्षेत्रों में लगाया जाता है।

ङ. स्विच एक्सपेंशन जोड़ (Switch Expansion Joint – SEJ)

जब कई पटरियों को आपस में वेल्ड करके एक लंबी निरंतर रेल (LWR – Long Welded Rail) बना दी जाती है, तो उसके दोनों सिरों पर थर्मल विस्तार (Thermal Expansion) को संभालने के लिए SEJ लगाया जाता है।

  • बनावट: इसमें एक ‘टंग रेल’ (Tongue Rail) और एक ‘स्टॉक रेल’ (Stock Rail) होती है, जो एक-दूसरे के ऊपर स्लाइड (सकती) कर सकती हैं।
  • कार्य: गर्मियों में जब तापमान 60°C से ऊपर पहुँचता है, तो स्टील की पटरी फैलती है। SEJ का डिजाइन ऐसा होता है कि यह बिना किसी वास्तविक गैप के पटरी को आगे-पीछे होने की जगह देता है, जिससे पहियों को कोई झटका भी नहीं लगता और ट्रैक सुरक्षित रहता है।

2. रेल जोड़ों में आने वाले 5 गंभीर दोष (Defects of Joints)

ट्रैक पर जब चौबीसों घंटे भारी मालगाड़ियाँ और तेज रफ्तार एक्सप्रेस ट्रेनें चलती हैं, तो नियमित और सही रखरखाव न मिलने पर इन जोड़ों में निम्नलिखित 5 प्रकार की घातक विकृतियाँ या दोष (Defects) आ जाते हैं:

1. हॉग्ड जोड़ (Hogged Joint)

  • परिभाषा: जब किसी जोड़ पर निरंतर पड़ने वाले भारी इम्पैक्ट लोड के कारण रेल के दोनों अंतिम सिरे नीचे की तरफ (Downward) स्थायी रूप से मुड़ या झुक जाते हैं, तो उसे हॉग्ड जॉइंट कहा जाता है।
  • प्रभाव: इसके कारण पटरी की सतह आसमान हो जाती है और उसमें वर्टिकल किंक (Vertical Kinks) बन जाते हैं। जब ट्रेन यहाँ से गुजरती है, तो यात्रियों को बहुत तेज ऊपर-नीचे के झटके महसूस होते हैं।

2. बैटर्ड जोड़ (Battered Joint)

  • परिभाषा: जब दो पटरियों के बीच का गैप जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है, तो ट्रेनों के भारी पहिये जोड़ों पर जोर से टकराते हैं (Hitting of Wheel)। इस निरंतर चोट के कारण रेल सिरों की ऊपरी धातु चपटी (Flattering) हो जाती है।
  • प्रभाव: रेल के कोने बिखरने लगते हैं और पटरी का वह हिस्सा अपनी चौड़ाई और आकार खो देता है, जिससे पहियों का घर्षण बढ़ जाता है।

3. हाई जोड़ (High Joint)

  • परिभाषा: ट्रैक के रखरखाव (Maintenance) के दौरान गैंग/कीमैन द्वारा जब जोड़ के नीचे मौजूद गिट्टी (Ballast) की पैकिंग जरूरत से ज्यादा (Over-packing) कर दी जाती है, तो वह जोड़ सामान्य ट्रैक लेवल से थोड़ा ऊपर उठ जाता है।
  • प्रभाव: ऊंचे जोड़ के कारण जब भी पहिया इसके ऊपर से गुजरता है, तो पूरी ट्रेन को एक ऊर्ध्वाधर उछाल (Vertical Lift) मिलता है, जो सुरक्षित सफर के लिहाज से बहुत खराब माना जाता है।

4. लो जोड़ (Low Joint)

  • परिभाषा: यह ‘हाई जॉइंट’ के ठीक विपरीत होता है। जब जोड़ के नीचे गिट्टी की पैकिंग अपर्याप्त या ढीली होती है, तो ट्रेनों के वजन से जोड़ नीचे की तरफ धंस जाता है।
  • प्रभाव: यदि लो जॉइंट को तुरंत ठीक न किया जाए, तो यह बहुत कम समय में स्थायी रूप से ‘हॉग्ड जोड़’ और ‘बैटर्ड जोड़’ में बदल जाता है, जिसके बाद पटरी को काटना ही एकमात्र उपाय बचता है।

5. ब्लोइंग जोड़ (Blowing Joints)

  • परिभाषा: जब सूखी और तेज हवाएं चलती हैं या ट्रेन ट्रैक से गुजरती है, तो जोड़ के नीचे से भारी मात्रा में धूल उड़ती है और जोड़ के आसपास के स्लीपर्स और गिट्टी पर हमेशा सफेद धूल (White Dusts) की एक परत जमा दिखाई देती है। इसे ब्लोइंग जॉइंट कहते हैं।
  • कारण: इसके पैदा होने के 3 मुख्य कारण पाठ्यक्रम में बताए गए हैं:
    1. खराब रखरखाव: ट्रैक जॉइंट का मेंटेनेंस स्तर बेहद घटिया होना।
    2. गंदी गिट्टी (Dirty Ballast): स्लीपर के नीचे की गिट्टी में मिट्टी और धूल मिल जाना, जिससे उसकी स्प्रिंग जैसी इलास्टिसिटी खत्म हो जाती है।
    3. खराब मिट्टी (Bad Quality of Soil): ट्रैक के नीचे की फॉर्मेशन या सबग्रेड की मिट्टी का कमजोर होना, जिससे पानी जमा होने पर वह कीचड़ का रूप ले लेती है और सूखने पर धूल बनकर उड़ती है।

3. रेल जोड़ों के दुष्प्रभाव (Evil Effects of Rail Joints)

रेलवे इंजीनियरिंग में जोड़ों को “Track’s Enemy No. 1” (ट्रैक का सबसे बड़ा दुश्मन) क्यों कहा जाता है? इसके पीछे निम्नलिखित ठोस तकनीकी कारण हैं:

  • भारी शॉक और कंपन: जोड़ों पर पहिया टकराने से उत्पन्न होने वाला इम्पैक्ट लोड सामान्य लोड से कई गुना अधिक होता है। यह कंपन पूरे ट्रैक ढांचे (स्लीपर, गिट्टी, फास्टनिंग्स) को ढीला कर देता है।
  • रखरखाव लागत में भारी बढ़ोतरी: एक अनुमान के अनुसार, पूरे रेलवे ट्रैक के कुल रखरखाव बजट का लगभग 25% से 30% हिस्सा सिर्फ इन जोड़ों को ठीक रखने में खर्च हो जाता है।
  • ईंधन की बर्बादी: जोड़ों पर होने वाले घर्षण और अवरोध (Resistance) के कारण इंजन को ट्रेन खींचने के लिए अधिक ताकत लगानी पड़ती है, जिससे डीजल और बिजली की खपत काफी बढ़ जाती है।
  • सुरक्षा और तोड़फोड़ का खतरा: फिश प्लेट और बोल्ट्स को आसानी से औजारों से खोला जा सकता है। असामाजिक तत्वों द्वारा इन्हें खोलकर ट्रेन पलटाने या तोड़फोड़ (Sabotage) करने का खतरा हमेशा बना रहता है।

4. रेल वेल्डिंग की आवश्यकता और सिद्धांत

इन सभी समस्याओं का स्थायी समाधान है—रेल वेल्डिंग (Rail Welding)। पटरियों के सिरों को आपस में स्थायी रूप से वेल्ड करके जोड़ों को ही समाप्त कर दिया जाता है।

वेल्डेड ट्रैक का सिद्धांत (Theory of Welded Rails)

जब कई रेल सेक्शन को आपस में वेल्ड करके एक लंबी निरंतर रेल (LWR) बनाई जाती है, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि तापमान बदलने पर स्टील का फैलाव कैसे रुकेगा?

  • थर्मल फोर्सेज (Thermal Forces): यदि स्टील की पटरी को फैलने न दिया जाए, तो उसके भीतर अत्यधिक आंतरिक दबाव (Thermal Stress) पैदा होता है। गर्मियों में यह पटरी को बाहर की तरफ फेंक सकता है, जिसे बकलिंग (Buckling) कहते हैं।
  • होल्डिंग पावर: आधुनिक इंजीनियरिंग में पटरियों को भारी कंक्रीट स्लीपर्स (PRC Sleepers) और अत्यधिक मजबूत इलास्टिक रेल क्लिप (जैसे ERC Mark-III) की मदद से गिट्टी के भारी कुशन के भीतर इतनी मजबूती से जकड़ दिया जाता है कि तापमान बदलने पर भी पटरी अपनी जगह से 1 मिलीमीटर भी हिल नहीं पाती। इस प्रकार, थर्मल फोर्स पटरी के भीतर ही लॉक (अचल) हो जाती है।

5. एल्युमिनो थर्मिट वेल्डिंग (Alumino-Thermit / AT Welding) की पूरी इंजीनियरिंग

भारतीय रेलवे में ऑन-साइट (सीधे रेलवे ट्रैक पर) पटरियों को जोड़ने के लिए AT वेल्डिंग सबसे लोकप्रिय और व्यावहारिक विधि है। इसे ‘थर्मिट वेल्डिंग’ भी कहा जाता है।

क. रासायनिक सिद्धांत (Chemical Principle)

AT वेल्डिंग पूरी तरह से एक रासायनिक प्रतिक्रिया (Chemical Reaction) पर आधारित है। इसमें आयरन ऑक्साइड (\(Fe_{2}O_{3}\)) और एल्युमिनियम (\(Al\)) के महीन पाउडर के मिश्रण (जिसे ‘थर्मिट मिक्सचर’ या ‘पोरशन’ कहते हैं) को एक विशेष क्रूसिबल (Crucible) में जलाया जाता है।

  • रासायनिक समीकरण (Chemical Equation):
    Fe₂O₃ + 2Al → Al₂O₃ + 2Fe + Heat

  • अत्यधिक तापमान: इस प्रतिक्रिया के शुरू होते ही कुछ ही सेकंड में लगभग 2500°C से 3000°C तक का प्रचंड तापमान पैदा होता है। एल्युमिनियम, ऑक्सीजन को सोखकर एल्युमिनियम ऑक्साइड (Al2O3) का हल्का स्लैग (कचरा) बना लेता है, जो तैरकर ऊपर आ जाता है। नीचे शुद्ध, पिघला हुआ सुपरहीटेड लिक्विड स्टील (Liquid Steel) बचता है।

ख. आधुनिक SKV वेल्डिंग (Short Pre-heating Welding)

पारंपरिक AT वेल्डिंग में पटरियों को गर्म करने में बहुत समय लगता था, जिससे ट्रैफिक ब्लॉक लंबा हो जाता था। इस समस्या को दूर करने के लिए भारतीय रेलवे में SKV वेल्डिंग (Short Pre-heating) को अनिवार्य कर दिया गया है।

  • विशेषता: इसमें विशेष प्री-हीटिंग बर्नर और कंप्रेस्ड एयर-पेट्रोल/एलपीजी मिक्सचर का उपयोग किया जाता है।
  • समय की बचत: इस विधि से रेल के सिरों को प्री-हीट (लाल-गर्म) करने का समय घटकर मात्र 10 से 12 मिनट रह जाता है। इसके कारण पूरे वेल्डिंग ऑपरेशन को 30 से 45 मिनट के छोटे ट्रैफिक ब्लॉक में आसानी से पूरा कर लिया जाता है।

ग. फील्ड में AT वेल्डिंग की स्टेप-बाय-स्टेप प्रक्रिया (Field Process)

ट्रैक पर AT वेल्डिंग करते समय पीडब्लूआई (PWI/SSE) की देखरेख में निम्नलिखित सख्त चरणों का पालन किया जाता है:

  1. रेल एंड्स की तैयारी (Rail Ends Preparation): जिन दो पटरियों को जोड़ना है, उनके सिरों को अच्छी तरह से वायर ब्रश और थिनर से साफ किया जाता है ताकि जंग, तेल या ग्रीस पूरी तरह हट जाए। दोनों रेल के बीच 25 mm का मानक गैप (Standard Gap) रखा जाता है।
  2. अलाइनमेंट (Alignment): पटरियों को वर्टिकल और हॉरिजॉन्टल प्लेन में पूरी तरह से सीधे अलाइन किया जाता है। इसके लिए विशेष स्ट्रेट एज (Straight Edge) और 1 mm का ‘प्रोफाइल डिफ्लेक्शन’ (ऊपर की तरफ उभार या कैम्बर) दिया जाता है, ताकि ठंडा होने पर रेल पूरी तरह सीधी हो जाए।
  3. मोल्ड फिक्सिंग (Mold Fixing): रेल के गैप के चारों ओर पहले से बने हुए रिफ्रैक्टरी मोल्ड्स (Prefabricated Moulds / CO2 Moulds) को क्लैंप की मदद से कस दिया जाता है। मोल्ड और रेल के बीच के गैप को विशेष सैंड-पेस्ट (Luting Sand) से सील कर दिया जाता है ताकि पिघला हुआ स्टील बाहर न बहे।
  4. प्री-हीटिंग (Pre-heating): बर्नर की मदद से दोनों रेल के सिरों को मोल्ड के भीतर ही लगभग 950°C से 1000°C (चेरी रेड कलर) तक गर्म किया जाता है।
  5. क्रूसिबल चार्जिंग और रिएक्शन (Crucible Charging & Reaction): मोल्ड के ठीक ऊपर क्रूसिबल को सेट किया जाता है। इसमें वेल्डिंग पोरशन डालकर ‘इग्निशन पाउडर’ की मदद से आग लगाई जाती है। लगभग 15 से 20 सेकंड में रासायनिक प्रतिक्रिया पूरी हो जाती है।
  6. टैपिंग और पोरिंग (Tapping & Pouring): प्रतिक्रिया पूरी होते ही क्रूसिबल के निचले हिस्से में लगा ऑटोमैटिक थिम्बल (Thimble) खुल जाता है और पिघला हुआ सुपरहीटेड स्टील सीधे मोल्ड के भीतर चला जाता है। स्टील मोल्ड में भरकर दोनों रेल सिरों को आपस में पिघलाकर एक कर देता है।
  7. मोल्ड स्ट्रिपिंग और ट्रिमिंग (Mould Stripping & Trimming): धातु के थोड़ा जमने के बाद (लगभग 4 से 6 मिनट में) मोल्ड को हटा दिया जाता है। इसके तुरंत बाद हाइड्रोलिक रेल वेल्ड ट्रिमर (Hydraulic Rail Weld Trimmer – HRWT) मशीन की मदद से पटरी के ऊपरी हिस्से और किनारों पर जमे अतिरिक्त गर्म लोहे (Weld Collar) को छीलकर साफ कर दिया जाता है।
  8. ग्राइंडिंग और फिनिशिंग (Grinding & Finishing): वेल्ड के पूरी तरह ठंडा हो जाने पर प्रोफाइल ग्राइंडिंग मशीन की मदद से जोड़ को तब तक घिसा जाता है जब तक कि वेल्ड की गई सतह और सामान्य पटरी का लेवल बिल्कुल बराबर (Smooth) न हो जाए।

6. फ्लैश बट वेल्डिंग (Flash Butt Welding) की तकनीक

जब रेलवे को बहुत अधिक संख्या में वेल्डिंग करनी होती है (जैसे नए ट्रैक बिछाने या बड़े पैमाने पर रिन्यूअल के समय), तो फ्लैश बट वेल्डिंग का उपयोग किया जाता है। इसे वेल्डिंग की सबसे सुरक्षित और उत्तम विधि माना जाता है।

क. कार्य सिद्धांत (Working Principle)

यह एक इलेक्ट्रिक रेजिस्टेंस वेल्डिंग (Electric Resistance Welding) विधि है। इसमें किसी बाहरी फिलर मेटल, वेल्डिंग रॉड या केमिकल पोरशन की आवश्यकता नहीं होती। दो पटरियों की धातु को ही आपस में सीधे फ्यूज किया जाता है।

ख. वेल्डिंग की प्रक्रिया

  1. इलेक्ट्रिक फ्लैशिंग: फ्लैश बट वेल्डिंग मशीन के शक्तिशाली जबड़े दोनों पटरियों को कसकर पकड़ लेते हैं। इसके बाद दोनों रेल सिरों को बहुत करीब लाया जाता है और उनमें भारी मात्रा में विद्युत प्रवाह (High Current, Low Voltage) पास किया जाता है।
  2. प्रतिरोध और ऊष्मा: जब दोनों सिरे हल्के से छूते हैं, तो विद्युत प्रतिरोध (Resistance) के कारण भारी मात्रा में चिंगारियां (Flashing) निकलती हैं और रेल के सिरे अत्यधिक गर्म होकर प्लास्टिक अवस्था (लाल-गर्म और मोम जैसे मुलायम) में आ जाते हैं।
  3. अपसेटिंग (Upsetting): जैसे ही धातु सही तापमान पर पहुँचती है, मशीन का हाइड्रोलिक सिस्टम एक झटके में दोनों पटरियों को अत्यधिक उच्च दबाव (Forging Pressure) के साथ आपस में दबा देता है। दबाव के कारण दोनों पटरियों के सिरे आपस में पूरी तरह इंटरलॉक होकर जुड़ जाते हैं। बाहर निकले अतिरिक्त गर्म लोहे को मशीन में लगे कटर तुरंत ट्रिम कर देते हैं।

7. वेल्डिंग थ्योरी और धातु संरचना (Metallurgical Aspects & HAZ)

रेल वेल्डिंग केवल दो लोहे के टुकड़ों को जोड़ना नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहन धातुकर्म (Metallurgy) शामिल है।

  • HAZ (Heat Affected Zone): वेल्डिंग के दौरान अत्यधिक उच्च तापमान के कारण वेल्ड के ठीक बगल वाला रेल का हिस्सा (लगभग 50 mm से 75 mm तक) बहुत गर्म हो जाता है और फिर धीरे-धीरे ठंडा होता है। इस अत्यधिक गर्मी और शीतलन के कारण उस क्षेत्र की अंदरूनी क्रिस्टलाइन संरचना (Metallurgical Structure) बदल जाती है। इस क्षेत्र को हीट अफेक्टेड ज़ोन (HAZ) कहते हैं।
  • संवेदनशीलता: HAZ वाला हिस्सा सामान्य पटरी की तुलना में थोड़ा कम कठोर या अधिक भंगुर (Brittle) हो सकता है। इसलिए, भारतीय रेलवे में पटरियों की वेल्डिंग के बाद उनकी कूलिंग (ठंडा होने की प्रक्रिया) को नियंत्रित करने के लिए विशेष एस्बेस्टस क्लॉथ या कूलिंग हुड का उपयोग किया जाता है ताकि थर्मल क्रैक्स न आएं।

2.भारतीय रेलवे ट्रैक टेक्नोलॉजी: रेल जोड़ों के प्रकार, गंभीर दोष और वेल्डिंग का संपूर्ण तकनीकी गाइड

5. एल्युमिनो थर्मिट वेल्डिंग (Alumino-Thermit / AT Welding) की पूरी इंजीनियरिंग

भारतीय रेलवे में ऑन-साइट (सीधे रेलवे ट्रैक पर) पटरियों को जोड़ने के लिए AT वेल्डिंग सबसे लोकप्रिय और व्यावहारिक विधि है। इसे ‘थर्मिट वेल्डिंग’ भी कहा जाता है।

क. रासायनिक सिद्धांत (Chemical Principle)

AT वेल्डिंग पूरी तरह से एक रासायनिक प्रतिक्रिया (Chemical Reaction) पर आधारित है। इसमें आयरन ऑक्साइड (Fe2O3)) और एल्युमिनियम (Al) के महीन पाउडर के मिश्रण (जिसे ‘थर्मिट मिक्सचर’ या ‘पोरशन’ कहते हैं) को एक विशेष क्रूसिबल (Crucible) में जलाया जाता है।

  • रासायनिक समीकरण (Chemical Equation):
    Fe₂O₃ + 2Al → Al₂O₃ + 2Fe + Heat
  • अत्यधिक तापमान: इस प्रतिक्रिया के शुरू होते ही कुछ ही सेकंड में लगभग 2500°C से 3000°C तक का प्रचंड तापमान पैदा होता है। एल्युमिनियम, ऑक्सीजन को सोखकर एल्युमिनियम ऑक्साइड (Al2O3) का हल्का स्लैग (कचरा) बना लेता है, जो तैरकर ऊपर आ जाता है। नीचे शुद्ध, पिघला हुआ सुपरहीटेड लिक्विड स्टील (Liquid Steel) बचता है।

ख. आधुनिक SKV वेल्डिंग (Short Pre-heating Welding)

पारंपरिक AT वेल्डिंग में पटरियों को गर्म करने में बहुत समय लगता था, जिससे ट्रैफिक ब्लॉक लंबा हो जाता था। इस समस्या को दूर करने के लिए भारतीय रेलवे में SKV वेल्डिंग (Short Pre-heating) को अनिवार्य कर दिया गया है।

  • विशेषता: इसमें विशेष प्री-हीटिंग बर्नर और कंप्रेस्ड एयर-पेट्रोल/एलपीजी मिक्सचर का उपयोग किया जाता है।
  • समय की बचत: इस विधि से रेल के सिरों को प्री-हीट (लाल-गर्म) करने का समय घटकर मात्र 10 से 12 मिनट रह जाता है। इसके कारण पूरे वेल्डिंग ऑपरेशन को 30 से 45 मिनट के छोटे ट्रैफिक ब्लॉक में आसानी से पूरा कर लिया जाता है।

ग. फील्ड में AT वेल्डिंग की स्टेप-बाय-स्टेप प्रक्रिया (Field Process)

ट्रैक पर AT वेल्डिंग करते समय पीडब्लूआई (PWI/SSE) की देखरेख में निम्नलिखित सख्त चरणों का पालन किया जाता है:

  1. रेल एंड्स की तैयारी (Rail Ends Preparation): जिन दो पटरियों को जोड़ना है, उनके सिरों को अच्छी तरह से वायर ब्रश और थिनर से साफ किया जाता है ताकि जंग, तेल या ग्रीस पूरी तरह हट जाए। दोनों रेल के बीच 25 mm का मानक गैप (Standard Gap) रखा जाता है।
  2. अलाइनमेंट (Alignment): पटरियों को वर्टिकल और हॉरिजॉन्टल प्लेन में पूरी तरह से सीधे अलाइन किया जाता है। इसके लिए विशेष स्ट्रेट एज (Straight Edge) और 1 mm का ‘प्रोफाइल डिफ्लेक्शन’ (ऊपर की तरफ उभार या कैम्बर) दिया जाता है, ताकि ठंडा होने पर रेल पूरी तरह सीधी हो जाए।
  3. मोल्ड फिक्सिंग (Mold Fixing): रेल के गैप के चारों ओर पहले से बने हुए रिफ्रैक्टरी मोल्ड्स (Prefabricated Moulds / CO2 Moulds) को क्लैंप की मदद से कस दिया जाता है। मोल्ड और रेल के बीच के गैप को विशेष सैंड-पेस्ट (Luting Sand) से सील कर दिया जाता है ताकि पिघला हुआ स्टील बाहर न बहे।
  4. प्री-हीटिंग (Pre-heating): बर्नर की मदद से दोनों रेल के सिरों को मोल्ड के भीतर ही लगभग 950°C से 1000°C (चेरी रेड कलर) तक गर्म किया जाता है।
  5. क्रूसिबल चार्जिंग और रिएक्शन (Crucible Charging & Reaction): मोल्ड के ठीक ऊपर क्रूसिबल को सेट किया जाता है। इसमें वेल्डिंग पोरशन डालकर ‘इग्निशन पाउडर’ की मदद से आग लगाई जाती है। लगभग 15 से 20 सेकंड में रासायनिक प्रतिक्रिया पूरी हो जाती है।
  6. टैपिंग और पोरिंग (Tapping & Pouring): प्रतिक्रिया पूरी होते ही क्रूसिबल के निचले हिस्से में लगा ऑटोमैटिक थिम्बल (Thimble) खुल जाता है और पिघला हुआ सुपरहीटेड स्टील सीधे मोल्ड के भीतर चला जाता है। स्टील मोल्ड में भरकर दोनों रेल सिरों को आपस में पिघलाकर एक कर देता है।
  7. मोल्ड स्ट्रिपिंग और ट्रिमिंग (Mould Stripping & Trimming): धातु के थोड़ा जमने के बाद (लगभग 4 से 6 मिनट में) मोल्ड को हटा दिया जाता है। इसके तुरंत बाद हाइड्रोलिक रेल वेल्ड ट्रिमर (Hydraulic Rail Weld Trimmer – HRWT) मशीन की मदद से पटरी के ऊपरी हिस्से और किनारों पर जमे अतिरिक्त गर्म लोहे (Weld Collar) को छीलकर साफ कर दिया जाता है।
  8. ग्राइंडिंग और फिनिशिंग (Grinding & Finishing): वेल्ड के पूरी तरह ठंडा हो जाने पर प्रोफाइल ग्राइंडिंग मशीन की मदद से जोड़ को तब तक घिसा जाता है जब तक कि वेल्ड की गई सतह और सामान्य पटरी का लेवल बिल्कुल बराबर (Smooth) न हो जाए।

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6. फ्लैश बट वेल्डिंग (Flash Butt Welding) की तकनीक

जब रेलवे को बहुत अधिक संख्या में वेल्डिंग करनी होती है (जैसे नए ट्रैक बिछाने या बड़े पैमाने पर रिन्यूअल के समय), तो फ्लैश बट वेल्डिंग का उपयोग किया जाता है। इसे वेल्डिंग की सबसे सुरक्षित और उत्तम विधि माना जाता है।

क. कार्य सिद्धांत (Working Principle)

यह एक इलेक्ट्रिक रेजिस्टेंस वेल्डिंग (Electric Resistance Welding) विधि है। इसमें किसी बाहरी फिलर मेटल, वेल्डिंग रॉड या केमिकल पोरशन की आवश्यकता नहीं होती। दो पटरियों की धातु को ही आपस में सीधे फ्यूज किया जाता है।

ख. वेल्डिंग की प्रक्रिया

  1. इलेक्ट्रिक फ्लैशिंग: फ्लैश बट वेल्डिंग मशीन के शक्तिशाली जबड़े दोनों पटरियों को कसकर पकड़ लेते हैं। इसके बाद दोनों रेल सिरों को बहुत करीब लाया जाता है और उनमें भारी मात्रा में विद्युत प्रवाह (High Current, Low Voltage) पास किया जाता है।
  2. प्रतिरोध और ऊष्मा: जब दोनों सिरे हल्के से छूते हैं, तो विद्युत प्रतिरोध (Resistance) के कारण भारी मात्रा में चिंगारियां (Flashing) निकलती हैं और रेल के सिरे अत्यधिक गर्म होकर प्लास्टिक अवस्था (लाल-गर्म और मोम जैसे मुलायम) में आ जाते हैं।
  3. अपसेटिंग (Upsetting): जैसे ही धातु सही तापमान पर पहुँचती है, मशीन का हाइड्रोलिक सिस्टम एक झटके में दोनों पटरियों को अत्यधिक उच्च दबाव (Forging Pressure) के साथ आपस में दबा देता है। दबाव के कारण दोनों पटरियों के सिरे आपस में पूरी तरह इंटरलॉक होकर जुड़ जाते हैं। बाहर निकले अतिरिक्त गर्म लोहे को मशीन में लगे कटर तुरंत ट्रिम कर देते हैं।

7. वेल्डिंग थ्योरी और धातु संरचना (Metallurgical Aspects & HAZ)

रेल वेल्डिंग केवल दो लोहे के टुकड़ों को जोड़ना नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहन धातुकर्म (Metallurgy) शामिल है।

  • HAZ (Heat Affected Zone): वेल्डिंग के दौरान अत्यधिक उच्च तापमान के कारण वेल्ड के ठीक बगल वाला रेल का हिस्सा (लगभग 50 mm से 75 mm तक) बहुत गर्म हो जाता है और फिर धीरे-धीरे ठंडा होता है। इस अत्यधिक गर्मी और शीतलन के कारण उस क्षेत्र की अंदरूनी क्रिस्टलाइन संरचना (Metallurgical Structure) बदल जाती है। इस क्षेत्र को हीट अफेक्टेड ज़ोन (HAZ) कहते हैं।
  • संवेदनशीलता: HAZ वाला हिस्सा सामान्य पटरी की तुलना में थोड़ा कम कठोर या अधिक भंगुर (Brittle) हो सकता है। इसलिए, भारतीय रेलवे में पटरियों की वेल्डिंग के बाद उनकी कूलिंग (ठंडा होने की प्रक्रिया) को नियंत्रित करने के लिए विशेष एस्बेस्टस क्लॉथ या कूलिंग हुड का उपयोग किया जाता है ताकि थर्मल क्रैक्स न आएं।

3.भारतीय रेलवे ट्रैक टेक्नोलॉजी: रेल जोड़ों के प्रकार, गंभीर दोष और वेल्डिंग का संपूर्ण तकनीकी गाइड

8. अल्ट्रासोनिक फ्लॉ डिटेक्शन (USFD Testing of Rails & Welds)

वेल्डिंग के बाद स्टील के भीतर कुछ ऐसे सूक्ष्म दोष (जैसे हवा के बुलबुले, अंदरूनी क्रैक या स्लैग समावेशन) रह सकते हैं, जो बाहर से आंखों द्वारा दिखाई नहीं देते। इन अदृश्य दोषों को पकड़ने के लिए भारतीय रेलवे USFD (Ultrasonic Flaw Detector) तकनीक का उपयोग करती है।

  • कार्य सिद्धांत: USFD मशीन एक विशेष प्रकार के प्रोब (Probe) की मदद से रेल के भीतर उच्च आवृत्ति वाली अल्ट्रासोनिक ध्वनि तरंगें (Ultrasonic Waves) भेजती है। यदि पटरी के अंदर कोई दरार होती है, तो यह तरंगें वहां से टकराकर वापस लौट आती हैं और मशीन की स्क्रीन पर एक डिफ्लेक्शन या ‘इको’ (Echo) के रूप में दिखाई देती हैं।
  • प्रोब के प्रकार: वेल्डिंग और रेल की जांच के लिए अलग-अलग एंगल वाले प्रोब इस्तेमाल होते हैं:
    • 0° प्रोब: इसका उपयोग रेल की वेब (Web) और फ्लैंज (Flange) की क्षैतिज सतहों की जांच के लिए होता है।
    • 70° प्रोब: इसका उपयोग मुख्य रूप से रेल हेड (Head) के भीतर आने वाले अनुप्रस्थ दोषों (Transverse Defects) और वेल्ड के कोनों की सूक्ष्म दरारों की जांच के लिए किया जाता है।

क. वेल्ड टेस्टिंग का शेड्यूल (Testing Frequency)

रेलवे नियमों के अनुसार, वेल्डेड जोड़ों की जांच निम्नलिखित निश्चित अंतरालों पर की जानी अनिवार्य है:

  • एक्सेप्टेंस टेस्ट (Acceptance Test): किसी भी नई वेल्डिंग के होने के तुरंत बाद (Main Line और Loop Line दोनों पर) सबसे पहला टेस्ट किया जाता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वेल्डिंग सही हुई है।
  • पहला पीरियोडिक टेस्ट (First Periodic Test): मुख्य लाइनों (Main Line) पर वेल्डिंग के 1 वर्ष पूरे होने पर या ट्रैक से 20 GMT (ग्रॉस मिलियन टन्स) का ट्रैफिक गुजरने के बाद (जो भी पहले हो) किया जाता है।
  • आगामी टेस्ट (Further Tests): इसके बाद रूट के वार्षिक यातायात (GMT/Annum) के आधार पर प्रत्येक 1 से 5 वर्षों के भीतर नियमित रूप से जांच की जाती है।

9. वेल्ड दोषों का वर्गीकरण और मार्किंग (Defect Classification & Marking)

जब USFD जांच के दौरान किसी वेल्ड में कोई आंतरिक खराबी या क्रैक पाया जाता है, तो उसे उसकी गंभीरता के आधार पर मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है:

1. IMR (Immediate Removal – तत्काल हटाना)

यह सबसे खतरनाक श्रेणी का दोष है। इसका मतलब है कि वेल्ड के भीतर का क्रैक बहुत बड़ा हो चुका है और वह कभी भी पूरी तरह टूटकर बड़ी रेल दुर्घटना का कारण बन सकता है।

  • पहचान मार्किंग: आईएमआर दोष मिलने पर ट्रैक स्टाफ द्वारा उस वेल्ड के दोनों तरफ रेल के चेहरों (Faces) पर लाल पेंट से 3 लाल ‘X’ (XXX) के बड़े निशान बना दिए जाते हैं।

2. OBS (Observation – निगरानी में रखना)

यह कम गंभीर श्रेणी का दोष होता है। इसका अर्थ है कि वेल्ड के भीतर शुरुआती स्तर का क्रैक या डिफेक्ट देखा गया है, जो तुरंत तो नहीं टूटेगा लेकिन उस पर कड़ी नजर रखना और उसे सुरक्षित करना आवश्यक है।

  • पहचान मार्किंग: ओबीएस दोष मिलने पर वेल्ड के दोनों तरफ लाल पेंट से केवल 1 लाल ‘X’ (X) का निशान लगाया जाता है।

10. डिफेक्ट मिलने पर रेलवे द्वारा की जाने वाली तत्काल कार्रवाई (Action Taken)

जैसे ही ट्रैक पर किसी वेल्ड को IMR या OBS घोषित किया जाता है, रेलवे का इंजीनियरिंग विभाग (गैंग, कीमैन और सेक्शन इंजीनियर) तुरंत निम्नलिखित आपातकालीन कदम उठाता है:

क. IMR (3 लाल निशान) मिलने पर सख्त एक्शन प्लान:

  1. काॅशन ऑर्डर: पीडब्लूआई (PWI) द्वारा उस सेक्शन में तुरंत 30 किमी/घंटा का कॉशन ऑर्डर (गति सीमा प्रतिबंध) लागू कर दिया जाता है ताकि ट्रेनें वहां से बहुत धीमी गति से सुरक्षित गुजरें।
  2. तत्काल फिश-प्लेटिंग: उस दोषपूर्ण वेल्ड वाले स्थान पर तुरंत मजबूत क्लैंप (Clamps) या दो बोल्ट्स की मदद से साधारण या जोंगल फिश प्लेट लगा दी जाती है ताकि पटरी के सिरे अपनी जगह से अलग न हो सकें।
  3. चौबीसों घंटे निगरानी: जब तक उस दोषपूर्ण वेल्ड को ट्रैक से काट कर हटा नहीं दिया जाता, तब तक वहां राउंड द क्लॉक (24 घंटे) के लिए एक वॉचमैन (गैंगमैन) तैनात कर दिया जाता है, जो हर ट्रेन के गुजरने के बाद पटरी की स्थिति की जांच करता है।
  4. स्थायी बदलाव: आईएमआर वेल्ड मिलने के अधिकतम 30 दिनों के भीतर उस खराब हिस्से को हैकसॉ या आरी से काटकर निकाल दिया जाता है और उसकी जगह पर 6 मीटर लंबी पहले से परीक्षित (USFD Tested) नई पटरी का टुकड़ा डालकर उसे दोबारा वेल्ड किया जाता है।

ख. OBS (1 लाल निशान) मिलने पर एक्शन प्लान:

  1. जोंगल फिश-प्लेटिंग: ओबीएस दोष मिलने के अधिकतम 3 दिनों के भीतर उस वेल्ड के ऊपर 4 बोल्ट्स के साथ जोंगल फिश प्लेट (Joggle Fish Plate) कस दी जाती है।
  2. दैनिक कीमैन वॉच: उस रूट का कीमैन (Keyman) अपने दैनिक निरीक्षण के दौरान रोज उस वेल्ड के पास रुककर उसकी व्यक्तिगत जांच करता है ताकि क्रैक के बढ़ने का पता तुरंत चल सके।

11. वेल्डिंग के दौरान रखी जाने वाली महत्वपूर्ण सावधानियां

  • मौसम का ध्यान: अत्यधिक ठंड, तेज हवा या बारिश के दौरान ऑन-साइट AT वेल्डिंग नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि इससे पिघला हुआ स्टील अचानक ठंडा होकर कमजोर हो जाता है।
  • टॉलरेंस सीमा (Tolerance Limits): वेल्डिंग पूरी होने और प्रोफाइल ग्राइंडिंग के बाद, सीधे किनारे (Straight Edge) की मदद से जांच करने पर वर्टिकल प्लेन में +1 mm से 0 mm और हॉरिजॉन्टल प्लेन में ±0.5 mm से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। सतह पूरी तरह चिकनी और समतल होनी चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion)

भारतीय रेलवे में रेल जोड़ों (Rail Joints) का इतिहास जितना पुराना है, आधुनिक समय में उनका समाधान यानी रेल वेल्डिंग उतना ही उन्नत और वैज्ञानिक है। फिश-प्लेटेड जोड़ों से होने वाले दुष्प्रभावों (जैसे हॉग्ड, बैटर्ड और ब्लोइंग जॉइंट्स) को समाप्त करके रेलवे ने न केवल यात्रा को आरामदायक बनाया है, बल्कि पटरियों की आयु को भी दोगुना कर दिया है। USFD टेस्टिंग जैसी सख्त गुणवत्ता नियंत्रण प्रणालियों के कारण आज भारतीय रेलवे के वेल्डेड ट्रैक अत्यधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बन चुके हैं।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Technical FAQ)

Q1. भारतीय रेलवे में साधारण फिश-प्लेटेड जोड़ों को क्यों हटाया जा रहा है?

  • उत्तर: साधारण जोड़ों पर ट्रेनों के पहिये टकराने से भारी इम्पैक्ट लोड पैदा होता है, जिससे पटरी के सिरे झुक जाते हैं (Hogged Joint) या चपटे (Battered Joint) हो जाते हैं। इससे मेंटेनेंस का खर्च 25% तक बढ़ता है और रेल फ्रैक्चर का खतरा रहता है।

Q2. AT वेल्डिंग और Flash Butt वेल्डिंग में से कौन सी बेहतर है?

  • उत्तर: गुणवत्ता और मजबूती के मामले में फ्लैश बट वेल्डिंग (Flash Butt Welding) को सबसे उत्तम माना जाता है क्योंकि यह इलेक्ट्रिक रेजिस्टेंस पर काम करती है और इसमें कोई बाहरी फिलर मेटल नहीं मिलाया जाता। हालांकि, ऑन-साइट और आपातकालीन मरम्मत के लिए AT वेल्डिंग सबसे व्यावहारिक है।

Q3. USFD टेस्टिंग में IMR डिफेक्ट मिलने पर तत्काल क्या कदम उठाया जाता है?

  • उत्तर: IMR (तत्काल हटाने योग्य दोष) मिलने पर वेल्ड को 3 लाल ‘X’ (XXX) से मार्क किया जाता है। तुरंत उस सेक्शन पर 30 किमी/घंटा का गति प्रतिबंध (Caution Order) लगाया जाता है और 24 घंटे के भीतर जोंगल फिश प्लेट बांधी जाती है।

Q4. ब्लोइंग जॉइंट (Blowing Joints) होने के मुख्य कारण क्या हैं?

  • उत्तर: इसके 3 मुख्य कारण हैं: ट्रैक जॉइंट का खराब रखरखाव स्तर, स्लीपर के नीचे गंदी गिट्टी (Dirty Ballast) का होना और सबग्रेड की मिट्टी की गुणवत्ता (Bad Quality of Soil) खराब होना।

तकनीकी डिस्क्लेमर (Technical Disclaimer)

डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह ब्लॉग पोस्ट केवल शैक्षिक (Educational) और ज्ञान साझा करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। ब्लॉग में दी गई सभी तकनीकी परिभाषाएँ, वेल्डिंग प्रक्रियाएँ, टॉलरेंस लिमिट और सुरक्षात्मक कदम भारतीय रेलवे के प्रारंभिक सिलेबस और P-Way मैन्युअल पर आधारित हैं। फील्ड में किसी भी प्रकार के लाइव ऑपरेशन या आपातकालीन स्थिति के समय हमेशा संबंधित सक्षम प्राधिकारी (SSE/P.Way / AEN) और भारतीय रेलवे वेल्डिंग मैनुअल के नवीनतम दिशा-निर्देशों का ही पालन करें।


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