भाग 1–भारतीय रेलवे ट्रैक के Points and Crossings का संपूर्ण गाइड: संरचना और कार्यप्रणाली
भारतीय रेलवे का नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े और जटिल रेल नेटवर्कों में से एक है। जब हम किसी ट्रेन में सफर करते हैं, तो अक्सर खिड़की से बाहर देखते हुए हमारे मन में यह सवाल आता है कि इतनी भारी-भरकम और तेज रफ्तार ट्रेनें बिना किसी स्टीयरिंग व्हील के अपनी पटरी कैसे बदल लेती हैं? सड़कों पर चलने वाले वाहनों की तरह ट्रेन के ड्राइवर स्टीयरिंग घुमाकर गाड़ी को मोड़ नहीं सकते।
ट्रेनों को एक ट्रैक से दूसरे ट्रैक पर सुरक्षित रूप से भेजने के लिए ट्रैक पर इंजीनियरिंग का एक बेहद विशेष और गतिशील हिस्सा लगाया जाता है, जिसे रेलवे की तकनीकी भाषा में Points and Crossings या Turnout कहा जाता है। यह विषय रेलवे ट्रैक इंजीनियरिंग (Permanent Way) का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्सा है। इस व्यापक और विस्तृत गाइड के पहले भाग में, हम पॉइंट्स और क्रॉसिंग्स की बुनियादी परिभाषाओं, उनके मुख्य कार्यों, और एक मानक टर्नआउट की पूरी संरचना को गहराई से समझेंगे।
Railway Points and Crossings क्या हैं? (बुनियादी परिभाषा)
ट्रेन के पहियों की बनावट सामान्य गाड़ियों से बिल्कुल अलग होती है। रेल के पहियों के अंदरूनी हिस्से में एक उभरा हुआ किनारा होता है जिसे Flange (फ्लैंज) कहा जाता है। यह फ्लैंज पटरी को अंदर से पकड़कर रखता है और ट्रेन को कभी पटरी से उतरने नहीं देता। इसी फ्लैंज की व्यवस्था के कारण ट्रेन को मोड़ने के लिए पटरियों के संरेखण (Alignment) को ही बदलना पड़ता है।
- Points (पॉइंट्स): यह रेलवे ट्रैक का वह शुरुआती और मूवेबल (हिलने-डुलने वाला) हिस्सा होता है, जो ट्रेन के पहियों के फ्लैंज को एक नए रास्ते की ओर मोड़ने या गाइड करने का काम करता है। इसे तकनीकी रूप से Switch Assembly भी कहा जाता है।
- Crossings (क्रॉसिंग्स): जब कोई ट्रेन एक ट्रैक को छोड़कर दूसरे ट्रैक पर जाती है, तो मोड़ के दौरान एक पटरी को दूसरी मुख्य पटरी को पार (Cross) करना पड़ता है। उस कटिंग पॉइंट पर पहियों के फ्लैंज को बिना किसी रुकावट या झटके के गुजरने देने के लिए जो विशेष व्यवस्था बनाई जाती है, उसे Crossing कहते हैं।
- Turnout (टर्नआउट): पॉइंट्स, लीड रेल्स, क्रॉसिंग्स और चेक रेल्स के पूरे संयुक्त सेट को, जो एक ट्रेन को एक ट्रैक से दूसरे ट्रैक पर पूरी तरह डाइवर्ट करने में सक्षम बनाता है, Turnout कहा जाता है।
एक मानक टर्नआउट (Turnout) के मुख्य घटक
रेलवे का एक टर्नआउट कई छोटे-छोटे और बेहद सटीक हिस्सों से मिलकर बनता है। यदि इनमें से एक भी हिस्सा सही ढंग से काम न करे, तो बड़ी दुर्घटना (Derailment) हो सकती है। संरचना के आधार पर एक टर्नआउट को मुख्य रूप से तीन बड़े भागों में बांटा जाता है:
1. स्विच असेंबली (Switch Assembly)
यह टर्नआउट का सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहाँ से ट्रेन को मोड़ने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके मुख्य भाग निम्नलिखित हैं:
- Stock Rail (स्टॉक रेल): यह ट्रैक की वह मुख्य, सामान्य और पूरी तरह से स्थिर पटरी होती है, जिसके सहारे पूरी स्विच असेंबली टिकी होती है। यह अपनी जगह से बिल्कुल नहीं हिलती।
- Tongue Rail (टंग रेल): यह एक विशेष रूप से बनाई गई पतली और नुकीली पटरी होती है, जिसका आकार एक जीभ (Tongue) की तरह होता है। यह पटरी आगे-पीछे खिसक सकती है। जब स्टेशन मास्टर पैनल से पॉइंट बदलता है, तो यह टंग रेल स्टॉक रेल से पूरी तरह चिपक जाती है या उससे दूर हट जाती है। इसके सबसे नुकीले सिरे को Toe of Switch कहा जाता है।
- Stretcher Bar (स्ट्रैचर बार): दोनों तरफ की टंग रेल्स को आपस में एक निश्चित और सटीक दूरी पर बांधकर रखने वाली लोहे की छड़ों को स्ट्रैचर बार कहते हैं। यह सुनिश्चित करती हैं कि दोनों टंग रेल्स हमेशा एक साथ मूव करें और उनके बीच का गैप न बदले।
- Slide Chairs (स्लाइड चेयर): ये विशेष प्रकार की लोहे की प्लेट्स होती हैं जिन पर टंग रेल रखी होती है। टंग रेल को आसानी से खिसकने में मदद करने के लिए इन प्लेट्स पर नियमित रूप से ऑयलिंग और ग्रीसिंग की जाती है।
2. लीड रेल्स (Lead Rails)
स्विच असेंबली के ठीक खत्म होने के बाद और क्रॉसिंग के शुरू होने से पहले के बीच के हिस्से में जो पटरियां बिछी होती हैं, उन्हें Lead Rails कहा जाता है। इनका मुख्य कार्य स्विच द्वारा मोड़े गए पहियों को सुरक्षित रूप से और बिना किसी भटकाव के आगे क्रॉसिंग असेंबली तक पहुंचाना होता है।
3. क्रॉसिंग असेंबली (Crossing Assembly)
यह टर्नआउट का अंतिम हिस्सा होता है जहां दो पटरियां एक-दूसरे को क्रॉस करती हैं। इसके मुख्य भाग इस प्रकार हैं:
- V-Rail / Nose of Crossing: जहाँ दो पटरियां आपस में आकर मिलती हैं और अंग्रेजी के अक्षर ‘V’ जैसी आकृति बनाती हैं, उसे नोज़ ऑफ क्रॉसिंग कहा जाता है। ट्रेन का पहिया इसी नोज़ के ऊपर से गुजरते हुए आगे बढ़ता है।
- Wing Rails (विंग रेल्स): वी-रेल के दोनों तरफ बाहर की ओर मुड़ी हुई पटरियां होती हैं, जो पहियों को सही रास्ते पर बनाए रखने और उन्हें नोज़ पर सुरक्षित रूप से चढ़ाने में मदद करती हैं।
- Check Rails (चेक रेल्स): टर्नआउट के इस हिस्से में मुख्य पटरियों के समानांतर अंदर की तरफ छोटी पटरियां लगाई जाती हैं। इनका काम पहियों के फ्लैंज को क्रॉसिंग के खाली गैप में भटकने से रोकना है, ताकि ट्रेन सीधे अपने सही रास्ते पर जाए।
स्विच के महत्वपूर्ण तकनीकी शब्द (Technical Terminology)
पॉइंट्स और स्विच की पूरी कार्यप्रणाली और उनके रख-रखाव को समझने के लिए रेलवे इंजीनियरिंग के कुछ बुनियादी मापदंडों को जानना बहुत जरूरी है:
- Throw of Switch (थ्रो ऑफ स्विच): जब टंग रेल स्टॉक रेल से दूर हटती है, तो उन दोनों के बीच बनने वाली अधिकतम खाली दूरी को थ्रो ऑफ स्विच कहते हैं। भारतीय रेलवे में ब्रॉड गेज (BG) के लिए यह मानक दूरी सामान्यतः 115 mm (मिलीमीटर) तय की गई है।
- Heel Divergence (हील डाइवर्जेंस): टंग रेल के अंतिम छोर (Heel) के रनिंग फेस और स्टॉक रेल के रनिंग फेस के बीच की कुल दूरी को हील डाइवर्जेंस कहा जाता है।
- Flangeway Clearance (फ्लैंजवे क्लीयरेंस): पहिए के फ्लैंज को बिना किसी रुकावट या रगड़ के आसानी से गुजरने देने के लिए विंग रेल या चेक रेल और मुख्य रेल के बीच जो खाली जगह छोड़ी जाती है, उसे फ्लैंजवे क्लीयरेंस कहते हैं।
- Switch Angle (स्विच एंगल): स्टॉक रेल और टंग रेल के रनिंग फेसेस के बीच बनने वाले कोण (Angle) को स्विच एंगल कहा जाता है। यह कोण जितना छोटा और सटीक होगा, ट्रेन उतनी ही अधिक गति और सुगमता से टर्नआउट को पार कर पाएगी।
भाग 2–रेलवे टर्नआउट में ‘Switches’ के प्रकार, डिज़ाइन और तकनीकी मैकेनिक्स
पिछले भाग में हमने टर्नआउट के बुनियादी घटकों और उनके कार्यों को समझा था। इस भाग में, हम रेलवे ट्रैक पर इस्तेमाल होने वाले विभिन्न प्रकार के स्विच, उनके विस्तृत वर्गीकरण, डिज़ाइन विविधताओं और उनकी आंतरिक कार्यप्रणाली से जुड़े जटिल मैकेनिक्स का बेहद गहराई से अध्ययन करेंगे ताकि वर्डप्रेस पर बिना किसी तकनीकी गड़बड़ के हर एक पुर्जा और उसकी इंजीनियरिंग पूरी तरह स्पष्ट हो सके।
स्विच का विस्तृत वर्गीकरण (Detailed Classification of Switches)
इंजीनियरिंग और बनावट के विकास के आधार पर रेलवे स्विच को मुख्य रूप से दो बड़ी श्रेणियों में विभाजित किया जाता है: Stub Switch और Split Switch। आधुनिक रेल नेटवर्क में इनका उपयोग और डिज़ाइन समय के साथ इस प्रकार विकसित हुआ है:
1. स्टब स्विच (Stub Switch)
यह रेलवे के इतिहास का सबसे शुरुआती और आदिम डिज़ाइन है। वर्तमान समय में यह आधुनिक मुख्य रेल लाइनों से पूरी तरह से बाहर (Obsolete) हो चुका है, लेकिन रेलवे ट्रैक के क्रमिक विकास (Evolution) को समझने के लिए इसका अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण है।
- बनावट और कार्यप्रणाली: इस व्यवस्था में वर्तमान समय की तरह कोई नुकीली या पतली टंग रेल (Tongue Rail) नहीं होती थी। इसके बजाय, मुख्य ट्रैक की दोनों सामान्य भारी पटरियों को ही उनके पिछले जोड़ों पर ढीला छोड़कर आगे से खुला रखा जाता था। जब ट्रेन की दिशा बदलनी होती थी, तो एक लंबे लीवर या यांत्रिक छड़ की मदद से उन दोनों पटरियों के पूरे सिरों को ही शारीरिक रूप से खिसकाकर (Shift) दूसरे संरेखण (Alignment) वाली पटरियों के ठीक सामने ला दिया जाता था।
- इंजीनियरिंग की कमियां और खतरे: भारी गाड़ियों और तेज गति के लिए यह डिज़ाइन तकनीकी रूप से बेहद असुरक्षित और खतरनाक था। इसमें पटरियों के खुले सिरों पर पहियों के सीधे टकराने से भारी टूट-फूट (Batter) होती थी। सबसे बड़ा खतरा यह था कि गर्मियों के दिनों में जब अत्यधिक तापमान के कारण पटरियों में तापीय विस्तार (Thermal Expansion) होता था, तो इनके बीच का गैप खत्म हो जाता था और पूरा स्विच मैकेनिज्म जाम हो जाता था। यदि पटरियां पूरी तरह संरेखित नहीं हो पाती थीं, तो ट्रेन के पटरी से उतरने (Derailment) का शत-प्रतिशत खतरा रहता था।
2. स्प्लिट स्विच (Split Switch)
आधुनिक विश्व और भारतीय रेलवे का संपूर्ण मानक नेटवर्क इसी स्प्लिट स्विच के सिद्धांत पर आधारित है। यह स्टब स्विच के सभी खतरों को पूरी तरह समाप्त करता है। इसमें ट्रैक के दोनों ओर एक स्थिर बाहरी पटरी होती है जिसे Stock Rail कहते हैं, और एक अंदरूनी चलने वाली पतली पटरी होती है जिसे Tongue Rail कहा जाता है। टंग रेल का शुरुआती सिरा मशीन द्वारा घिसकर बेहद नुकीला बनाया जाता है, ताकि वह स्टॉक रेल के अंदरूनी घुमाव में पूरी तरह बिना किसी गैप के फिट बैठ सके।
इसके हील (Heel – वह अंतिम बिंदु जहां टंग रेल लीड रेल से मिलती है) के संचालन और जुड़ाव के आधार पर इसे पुनः दो महत्वपूर्ण भागों में विभाजित किया जाता है:
- Loose Heel Type (लूस हील टाइप): इस पारंपरिक डिज़ाइन में टंग रेल अपने अंतिम छोर (Heel) पर मुख्य लीड रेल से सामान्य फिशप्लेट (Fishplate) और बोल्ट्स की मदद से जुड़ी होती है। जब लीवर या मोटर के द्वारा स्विच को बदला जाता है, तो यह हील वाला जोड़ एक कब्जे (Hinge) की तरह काम करता है, जिसके चारों ओर टंग रेल का आगे का सिरा घूमता है।
- फायदे और नुकसान: इसे स्थापित करना और इसके खराब पुर्जों को बदलना बहुत आसान और कम खर्चीला होता है। परंतु, समय के साथ बार-बार ट्रेनों के गुजरने से इसके फिशप्लेट के बोल्ट ढीले हो जाते हैं, जिससे जोड़ पर एक अनचाहा गैप (Play) बन जाता है। यह गैप उच्च गति वाली ट्रेनों के पहियों को तेज झटका देता है, जिससे ट्रैक की ज्यामिति (Geometry) बिगड़ जाती है। इसलिए इसे अब मुख्य लाइनों से हटाकर केवल कम गति वाले यार्ड और साइडिंग्स तक सीमित कर दिया गया है।
- Fixed Heel Type (फिक्स्ड हील टाइप): आधुनिक, उच्च गति और भारी मालगाड़ियों वाले रेलवे ट्रैक की मुख्य रीढ़ फिक्स्ड हील टाइप स्विच ही है। इस अत्याधुनिक डिज़ाइन में टंग रेल का पिछला छोर लीड रेल के साथ पूरी तरह से बिना किसी मूवेबल जोड़ के फिक्स होता है। इसमें कोई कब्जा या हिंज जोड़ नहीं होता।
- मैकेनिक सिद्धांत: जब इस पॉइंट को बदला जाता है, तो टंग रेल किसी जोड़ पर नहीं घूमती, बल्कि स्टील की अपनी प्राकृतिक आंतरिक लचीलापन और संकुचन क्षमता (Elasticity & Flexibility) के कारण पूरी टंग रेल ही बीच से थोड़ी सी मुड़ती (Flex) है। इस कारण इसे तकनीकी रूप से Flexible Switch भी कहा जाता है। जोड़ों के न होने के कारण इसमें ढीलेपन का कोई खतरा नहीं रहता, जिससे ट्रेनें बिना किसी कंपन या झटके के अत्यधिक उच्च गति से इसे पार कर जाती हैं।
आधुनिक स्विच असेंबली के सहायक पुर्जे और आंतरिक मैकेनिक्स
एक रेलवे स्विच को चौबीसों घंटे, हर मौसम में पूरी सटीकता के साथ काम करना होता है। इसके सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने के लिए इसके साथ कई विशेष सहायक घटकों को जोड़ा जाता है:
- Slide Chairs (स्लाइड चेयर): ये विशेष रूप से डिज़ाइन की गई भारी लोहे की कास्ट-आयरन या स्टील प्लेट्स होती हैं, जिन्हें कंक्रीट के स्लीपरों के ठीक ऊपर और स्टॉक रेल के नीचे मजबूती से फिट किया जाता. है। टंग रेल का पूरा निचला हिस्सा इन्हीं चिकनी प्लेटों के ऊपर टिका होता है और इन्हीं के ऊपर दाएं-बाएं स्लाइड करता है। घर्षण (Attrition) को न्यूनतम करने और मोटर पर लोड कम करने के लिए इन प्लेट्स पर नियमित अंतराल पर विशेष रेलवे ग्रेड लुब्रिकेंट या ग्रेफाइट ग्रीस लगाया जाता है।
- Heel Block (हील ब्लॉक): टंग रेल के हील (अंतिम छोर) और मुख्य स्टॉक रेल के बीच एक बेहद सटीक और निश्चित दूरी बनाए रखना अनिवार्य होता है। इस दूरी को स्थिर रखने के लिए दोनों पटरियों के बीच में एक ठोस, भारी स्टील का ब्लॉक फिट करके मजबूत बोल्ट्स से कस दिया जाता है, जिसे हील ब्लॉक कहते हैं। यह ब्लॉक सुनिश्चित करता है कि ट्रेनों के भारी दबाव के बावजूद ट्रैक का गेज (Gauge) कभी प्रभावित न हो।
- Distance Blocks (डिस्टेंस ब्लॉक): टंग रेल जैसे-जैसे पीछे की ओर बढ़ती है, उसकी मोटाई बढ़ती जाती है। टंग रेल और स्टॉक रेल के बीच पूरी लंबाई में अलग-अलग गणना किए गए बिंदुओं पर छोटे-छोटे सुरक्षा ब्लॉक लगाए जाते हैं जिन्हें डिस्टेंस ब्लॉक कहते हैं। इनका मुख्य कार्य यह है कि जब कोई भारी ट्रेन टर्नआउट से गुजरती है, तो पहियों का भयंकर पार्श्व दबाव (Lateral Thrust) टंग रेल को स्टॉक रेल की तरफ अत्यधिक दबाने की कोशिश करता है। ये ब्लॉक उस दबाव को अपने ऊपर ले लेते हैं और टंग रेल को टूटने या विकृत होने से बचाते हैं।
टंग रेल के आधुनिक प्रोफाइल: थिक वेब बनाम थिन वेब स्विच (Thick Web vs Thin Web)
जैसे-जैसे रेल इंजनों की शक्ति और ट्रेनों की गति बढ़ी, वैसे-वैसे पारंपरिक पटरियों की बनावट में भी क्रांतिकारी बदलाव करने पड़े। टंग रेल की प्रोफाइल का विकास इसका सबसे बड़ा उदाहरण है:
1. थिन वेब स्विच (Thin Web Switches)
यह रेलवे का पारंपरिक और पुराना मानक प्रोफाइल है। इसमें एक सामान्य रेल सेक्शन (जैसे 52 किलोग्राम या 60 किलोग्राम प्रति मीटर वाली रेल) को ही लिया जाता है और मशीनों द्वारा उसके एक तरफ के हिस्से को काटकर और घिसकर आगे से पतला (Thin) बना दिया जाता है।
- कमियां: चूंकि एक सामान्य पटरी को काटकर इसे पतला किया जाता है, इसलिए इसके वेब (Web – पटरी का बीच का वर्टिकल हिस्सा) की मोटाई बहुत कम हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप, यह भारी ट्रेनों के बार-बार आने वाले झटकों और पार्श्व बलों के सामने कमजोर साबित होती है। इस प्रोफाइल के स्विच पर ट्रेनों की गति को हमेशा एक सुरक्षित सीमा (आमतौर पर 30 से 50 किमी/घंटा) के भीतर रखना पड़ता है, और इनके सिरों के टूटने (Chipping of Toe) की समस्या बहुत आम होती है, जिससे बार-बार रख-रखाव की आवश्यकता पड़ती है।
2. थिक वेब स्विच (Thick Web Switches)
आधुनिक हाई-स्पीड और हेवी-हॉल (भारी मालगाड़ी) रूटों पर यह तकनीकी रूप से सबसे उन्नत समाधान है। इसमें सामान्य पटरी को काटा नहीं जाता। इसके बजाय, इसके लिए विशेष रूप से स्टील मिलों में एक अलग प्रोफाइल की रेल ही रोल की जाती है, जिसे तकनीकी रूप से Zu-1-60 या Asymmetrical Rail Section कहा जाता है।
- डिज़ाइन और विशेषताएं: इस टंग रेल का वेब (बीच का हिस्सा) शुरुआत से ही अत्यधिक मोटा (Thick) और मजबूत बनाया जाता है, जबकि इसका केवल शीर्ष सिरा ही स्टॉक रेल में फिट होने के लिए आवश्यक आकार में ढाला जाता है। चूंकि इसका मुख्य ढांचा भारी और असममित (Asymmetrical) होता है, इसलिए इसकी ताकत थिन वेब स्विच की तुलना में कई गुना अधिक होती है।
- लाभ: ये स्विच अत्यधिक उच्च गति (130 किमी/घंटा से अधिक) और भारी एक्सल लोड को बिना किसी कंपन के सहन कर सकते हैं। इनका जीवनकाल बहुत लंबा होता है और इनके टूटने या पटरी से उतरने की घटनाएं लगभग शून्य हो जाती हैं। आधुनिक भारतीय रेलवे के सभी प्रमुख रूटों (जैसे दिल्ली-मुंबई या दिल्ली-हावड़ा मुख्य लाइन) पर अब थिक वेब स्विचों को ही मानक के रूप में स्थापित किया जा रहा है।
स्विच की ज्यामिति: सीधे बनाम घुमावदार स्विच (Straight vs Curved Switches)
टंग रेल को स्टॉक रेल के सापेक्ष किस कोण या संरेखण पर रखा गया है, इसके आधार पर इसकी ज्यामिति को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
- Straight Switches (स्ट्रेट स्विच): इस डिज़ाइन में टंग रेल पूरी तरह से सीधी होती है। इसे बनाना और स्थापित करना बहुत सरल और सस्ता होता है, लेकिन जब ट्रेन सीधे ट्रैक से इस पर आती है, तो पहियों को एक अचानक झटका (Concussive Shock) लगता है। इसलिए, इन पर गति सीमा काफी कम रखनी पड़ती है। झटके के कारण टंग रेल के आगे के हिस्से (Toe) पर भी भारी टूट-फूट होती है।
- Curved Switches (कर्व्ड स्विच): आधुनिक रेलवे इंजीनियरिंग की एक बेहतरीन मिसाल कर्व्ड स्विच हैं। इसमें टंग रेल को स्टॉक रेल के समानांतर एक निश्चित गोलाई या वक्र (Radius) दिया जाता है। इसके कारण ट्रेन बिना किसी बड़े झटके या कंपन के बेहद सुगमता (Smooth Transition) से सीधे ट्रैक से टर्नआउट ट्रैक पर प्रवेश कर जाती है। दबाव समान रूप से बंटने के कारण पुर्जों का जीवनकाल लंबा होता है। यह यात्रियों को आरामदायक सफर प्रदान करता है और उच्च गति संचालन के लिए पूरी तरह उपयुक्त है।
भाग 3–रेलवे टर्नआउट में ‘Crossings’ के प्रकार, गणितीय विश्लेषण और गति सीमा
पिछले भाग में हमने स्विच असेंबली के आंतरिक मैकेनिक्स, उनके प्रकार और आधुनिक थिक वेब स्विच के डिज़ाइन को गहराई से समझा था। जब ट्रेन स्विच असेंबली से दिशा बदलकर आगे बढ़ती है, तो वह लीड रेल्स (Lead Rails) को पार करते हुए टर्नआउट के सबसे अंतिम और जटिल हिस्से में प्रवेश करती है, जिसे Crossing Assembly कहा जाता है।
इस तीसरे भाग में, हम क्रॉसिंग की इंजीनियरिंग, इसके विभिन्न प्रकारों, क्रॉसिंग नंबर (Crossing Number) के पीछे छिपे गणितीय सिद्धांतों और ट्रेनों की अनुमेय गति सीमा (Permissible Speed Limits) के साथ इसके सीधे संबंधों का विस्तृत तकनीकी विश्लेषण करेंगे।
क्रॉसिंग क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों है?
जब कोई ट्रेन मुख्य लाइन (Straight Track) से डाइवर्ट होकर लूप लाइन (Turnout Track) पर जाती है, तो टर्नआउट की अंदरूनी पटरी को मुख्य लाइन की बाहरी पटरी को काटना या पार करना पड़ता है। यदि हम वहां एक सामान्य पटरी बिछा दें, तो ट्रेन के पहियों का अंदरूनी हिस्सा (Flange) उस पटरी से टकरा जाएगा और ट्रेन तुरंत दुर्घटनाग्रस्त (Derail) हो जाएगी।
पहियों के फ्लैंज को बिना किसी रुकावट के इस कटिंग पॉइंट को सुरक्षित पार करने देने के लिए पटरियों के बीच में एक विशेष गैप और गाइड व्यवस्था बनाई जाती है, जिसे Crossing कहते हैं। चूँकि इस हिस्से में पटरियों के बीच एक खाली जगह (Flangeway Gap) होती है, इसलिए पहिया कुछ मिलिसेकंड के लिए हवा में रहता है। यही कारण है कि क्रॉसिंग से गुजरते समय ट्रेनों में एक विशिष्ट आवाज़ और कंपन महसूस होता है।
क्रॉसिंग के मुख्य घटक और उनकी बनावट (Anatomy of a Crossing)
एक मानक क्रॉसिंग असेंबली मुख्य रूप से निम्नलिखित भागों से मिलकर बनती है, जिनमें से प्रत्येक का कार्य पूरी तरह निर्धारित होता है:
- V-Rail (वी-रेल): यह क्रॉसिंग का मुख्य केंद्र बिंदु है। जब दो पटरियां अलग-अलग दिशाओं से आकर आपस में मिलती हैं, तो वे अंग्रेजी के ‘V’ अक्षर जैसी आकृति बनाती हैं। इसे ही वी-रेल कहा जाता है।
- Point Rail और Splice Rail: वी-रेल का निर्माण दो अलग-अलग पटरियों को आपस में जोड़कर किया जाता है। मुख्य लाइन की तरफ जाने वाली पटरी को Point Rail कहते हैं, और लूप लाइन की तरफ जुड़ने वाली पटरी को Splice Rail कहा जाता है। स्प्लिस रेल को मशीनों द्वारा घिसकर पॉइंट रेल के साथ फिट किया जाता है।
- Theoretical Nose of Crossing (TNC): वह काल्पनिक बिंदु (Theoretical Point) जहाँ पॉइंट रेल और स्प्लिस रेल की रनिंग फेसेस (Running Faces) आपस में एक-दूसरे को काटती हैं, उसे TNC कहा जाता है। व्यावहारिक रूप से पटरी को इस बिंदु पर एकदम सुई की तरह नुकीला नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वह ट्रेनों के भार से तुरंत टूट जाएगी।
- Actual Nose of Crossing (ANC): व्यावहारिक इंजीनियरिंग में, वी-रेल के नुकीले हिस्से को थोड़ा पीछे से काटकर उसकी मोटाई लगभग 6 mm रखी जाती है। इस वास्तविक नुकीले सिरे को ANC कहा जाता है। TNC और ANC के बीच की दूरी क्रॉसिंग के डिज़ाइन पर निर्भर करती है।
- Wing Rails (विंग रेल्स): वी-रेल के दोनों तरफ बाहर की ओर मुड़ी हुई दो विशेष पटरियां होती हैं। इनका काम ट्रेन के पहियों के चलने वाले हिस्से (Tread) को सहारा देना और उन्हें सुरक्षित रूप से ANC की तरफ गाइड करना होता है।
- Throat of Crossing: विंग रेल्स के शुरुआती मुड़े हुए हिस्से जहाँ दोनों पटरियों के बीच की दूरी न्यूनतम हो जाती है, उसे क्रॉसिंग का थ्रोट (Throat) कहा जाता है।
- Check Rails (चेक रेल्स): यह क्रॉसिंग सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। क्रॉसिंग के ठीक सामने, ट्रैक की बाहरी पटरियों के अंदर समानांतर रूप से दो छोटी पटरियां लगाई जाती हैं जिन्हें चेक रेल्स कहते हैं। जब पहिया क्रॉसिंग के खाली गैप (ANC के पास) से गुजर रहा होता है, तो यह चेक रेल दूसरे पहिए के फ्लैंज को कसकर पकड़ कर रखती है, जिससे पहिया अपनी पटरी से जरा सा भी दाएं-बाएं नहीं भटक पाता और सीधे नोज़ पर चढ़ जाता है।
क्रॉसिंग के विभिन्न प्रकार (Types of Crossings)
रेलवे इंजीनियरिंग में उपयोग, संरेखण और निर्माण सामग्री के आधार पर क्रॉसिंग्स को निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:
1. ज्यामिति के आधार पर (Based on Geometry)
- Acute Angle / Ordinary Crossing (न्यूनकोण क्रॉसिंग): यह रेलवे ट्रैक पर इस्तेमाल होने वाली सबसे आम क्रॉसिंग है। जब दो पटरियां एक-दूसरे को बहुत कम कोण (न्यूनकोण) पर काटती हैं, तो उसे एक्यूट क्रॉसिंग कहते हैं। इसमें एक वी-रेल (Nose) और दो विंग रेल्स शामिल होती हैं।
- Obtuse Angle / Diamond Crossing (अधिककोण क्रॉसिंग): जब दो ट्रैक एक-दूसरे को तिरछे (अधिककोण पर) काटते हैं, तो वहां डायमंड जैसी आकृति बनती है। इसमें दो अधिककोण (Obtuse) और दो न्यूनकोण (Acute) क्रॉसिंग्स का जोड़ा होता है। इसका उपयोग अक्सर बची हुई जगहों या व्यस्त जंक्शनों पर पटरियों के जाल (Scissor Crossovers) बनाने के लिए किया जाता है।
2. निर्माण तकनीक और सामग्री के आधार पर (Based on Manufacture)
- Built-up Crossing (बिल्ट-अप क्रॉसिंग): इस पारंपरिक प्रकार में सामान्य रेल सेक्शन को काटकर, घिसकर और बोल्ट्स व डिस्टेंस ब्लॉकों की मदद से आपस में जोड़कर क्रॉसिंग तैयार की जाती है। यह सस्ती होती है लेकिन इसमें बहुत सारे ढीले होने वाले पुर्जे होते हैं, जिससे इसका रख-रखाव (Maintenance) बहुत कठिन होता है।
- Cast Manganese Steel (CMS) Crossing: आधुनिक रेलवे की सबसे पसंदीदा और मानक क्रॉसिंग। इसमें किसी पटरी को काटा या जोड़ा नहीं जाता। इसके बजाय, पूरे क्रॉसिंग को मैंगनीज स्टील (Manganese Steel) के सिंगल पीस मोल्ड में ढालकर (Cast) एक ठोस ब्लॉक के रूप में बनाया जाता है। चूँकि इसमें कोई जोड़ या बोल्ट नहीं होता, इसलिए इसके टूटने का खतरा नहीं रहता। मैंगनीज स्टील की यह खासियत होती है कि ट्रेनों के भारी दबाव से यह समय के साथ और अधिक कठोर (Work-Hardened) हो जाता है, जिससे इसका जीवनकाल बिल्ट-अप क्रॉसिंग से कई गुना अधिक होता है।
क्रॉसिंग नंबर का गणितीय विश्लेषण (The Math of Crossing Number)
रेलवे में टर्नआउट की पहचान उसके नंबर से होती है, जैसे No. 12 टर्नआउट या No. 8.5 टर्नआउट। यह नंबर कुछ और नहीं बल्कि क्रॉसिंग का कोण होता है, जिसे Crossing Number (N) कहा जाता है।
यदि पॉइंट रेल और स्प्लिस रेल के बीच बनने वाला कोण Alpha (अल्फा) है, तो क्रॉसिंग नंबर की गणना करने के लिए रेलवे इंजीनियरिंग में मुख्य रूप से तीन तरीकों का उपयोग किया जाता है:
- Right Angle Method (Cole’s Method): इसमें यह माना जाता है कि बेस लाइन और क्रॉसिंग की एक भुजा के बीच समकोण बनता है।
- सूत्र: N = cot (Alpha)
- भारतीय रेलवे में व्यावहारिक रूप से इसी तरीके का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है।
- Center Line Method: इसमें कोण को क्रॉसिंग की केंद्र रेखा से मापा जाता है।
- सूत्र: N = 1/2 * cot (Alpha/2)
- Isosceles Method (Tramway Method): इसमें क्रॉसिंग को एक समद्विबाहु त्रिभुज के रूप में माना जाता है।
- सूत्र: N = 1/2 * cosec (Alpha/2)
आसान शब्दों में कहें तो, यदि क्रॉसिंग नंबर 1 in 12 है, तो इसका मतलब है कि यदि आप क्रॉसिंग के नोज़ (ANC) से ट्रैक के समानांतर 12 मीटर आगे बढ़ेंगे, तो दोनों पटरियों के बीच की दूरी 1 मीटर बढ़ जाएगी। इसी प्रकार 1 in 8.5 में 8.5 मीटर आगे बढ़ने पर 1 मीटर का फैलाव मिलेगा।
क्रॉसिंग नंबर और ट्रेनों की गति सीमा में संबंध (Speed Limits)
क्रॉसिंग का नंबर जितना बड़ा होगा (जैसे 12 या 16), पटरियों के बीच का कोण उतना ही छोटा (Sharp) होगा। कोण छोटा होने का मतलब है कि टर्नआउट का घुमाव (Curvature) बहुत धीमा और लंबा होगा, जिससे ट्रेनें बिना पलटे अधिक गति से गुजर सकेंगी। इसके विपरीत, छोटा क्रॉसिंग नंबर (जैसे 8.5) एक बहुत ही तीखे और अचानक घुमाव (Sharp Turn) को दर्शाता है।
भारतीय रेलवे के ब्रॉड गेज (BG) नेटवर्क में मानक डिज़ाइन और उनकी गति सीमाएं इस प्रकार निर्धारित हैं:
- 1 in 8.5 Turnout:
- क्रॉसिंग कोण: लगभग 6° 42′ 35″ (6 डिग्री 42 मिनट 35 सेकंड)
- अधिकतम अनुमेय गति: 15 किमी/घंटा से 25 किमी/घंटा
- उपयोग का मुख्य क्षेत्र: मालगाड़ी यार्ड, पैसेंजर लूप लाइनों की साइडिंग्स और यार्ड के अंदरूनी हिस्से जहाँ गति बहुत कम रखनी अनिवार्य होती है।
- 1 in 12 Turnout:
- क्रॉसिंग कोण: लगभग 4° 45′ 49″ (4 डिग्री 45 मिनट 49 सेकंड)
- अधिकतम अनुमेय गति: 30 किमी/घंटा से 50 किमी/घंटा
- उपयोग का मुख्य क्षेत्र: मुख्य लाइनों से पैसेंजर ट्रेनों को स्टेशन के प्लेटफार्म (लूप लाइन) पर लेने के लिए उपयोग किया जाने वाला सबसे मानक टर्नआउट।
- 1 in 12 High Speed (With Curved Switch):
- क्रॉसिंग कोण: लगभग 4° 45′ 49″ (4 डिग्री 45 मिनट 49 सेकंड)
- अधिकतम अनुमेय गति: 50 किमी/घंटा से 75 किमी/घंटा
- उपयोग का मुख्य क्षेत्र: आधुनिक थिक वेब और कर्व्ड स्विच के साथ सुसज्जित विशेष टर्नआउट, जहाँ ट्रेनें बिना समय गंवाए तेज गति से ट्रैक बदल सकती हैं।
- 1 in 16 / 1 in 20 Crossover:
- क्रॉसिंग कोण: अत्यधिक न्यूनकोण (Very Acute Angle)
- अधिकतम अनुमेय गति: 75 किमी/घंटा से 100 किमी/घंटा+
- उपयोग का मुख्य क्षेत्र: मुख्य हाई-स्पीड रूटों पर जहाँ दो मुख्य पैरेलल लाइनों को आपस में जोड़ा जाता है (जैसे डबल लाइन सेक्शन पर आपातकालीन क्रॉसओवर)।
भाग 4–रेलवे टर्नआउट का संस्थापन, स्लीपर स्पेसिंग और रख-रखाव
पिछले भागों में हमने स्विच असेंबली की मैकेनिक्स और क्रॉसिंग्स के गणितीय सिद्धांतों को गहराई से समझा था। टर्नआउट इंजीनियरिंग का अंतिम और सबसे व्यावहारिक पक्ष यह है कि इस पूरे भारी और गतिशील ढांचे को ज़मीन पर किस प्रकार स्थापित किया जाता है, इसके नीचे स्लीपरों की व्यवस्था कैसी होती है, और इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रेलवे द्वारा रख-रखाव (Maintenance) के कौन से कड़े नियम अपनाए जाते हैं।
इस चौथे और अंतिम भाग में, हम टर्नआउट के संस्थापन, स्लीपर स्पेसिंग (Sleeper Spacing) के नियमों और सुरक्षा मापदंडों का संपूर्ण व्यावहारिक विश्लेषण करेंगे।
टर्नआउट के नीचे स्लीपरों की विशेष व्यवस्था
एक सामान्य रेलवे ट्रैक पर सभी स्लीपर एक ही आकार (ब्रॉड गेज के लिए सामान्यतः 2.75 मीटर लंबे) के होते हैं और उन्हें एक निश्चित दूरी पर सीधा बिछाया जाता है। लेकिन टर्नआउट के हिस्से में ऐसा करना असंभव होता है क्योंकि वहां एक के बजाय दो ट्रैक आपस में जुड़े होते हैं।
इसलिए, टर्नआउट के नीचे विशेष प्रकार के कंक्रीट स्लीपर (PSC Sleepers for Turnouts) लगाए जाते हैं। इन स्लीपरों की विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- बदलती लंबाई (Variable Length): स्विच के शुरुआती सिरे (Toe) से लेकर靠近 क्रॉसिंग के अंतिम सिरे तक जैसे-जैसे दोनों ट्रैक एक-दूसरे से दूर होते जाते हैं, स्लीपरों की लंबाई भी बढ़ती जाती है। टर्नआउट के शुरुआती हिस्से में स्लीपर की लंबाई 2.75 मीटर से शुरू होती है और क्रॉसिंग के पिछले हिस्से तक पहुंचते-पहुंचते यह 4.87 मीटर या उससे भी अधिक लंबी हो जाती है। ये लंबे स्लीपर दोनों ट्रैकों को नीचे से एक साथ बांधकर रखते हैं ताकि उनके बीच का गेज और लेवल कभी न बिगड़े।
- सटीक स्पेसिंग (Sleeper Spacing): टर्नआउट में स्लीपरों के बीच की दूरी (Center to Center Spacing) बहुत सोच-समझकर तय की जाती है। चूंकि स्विच का शुरुआती सिरा (Toe of Switch) और क्रॉसिंग का नुकीला सिरा (Nose of Crossing) सबसे अधिक संवेदनशील और भारी झटके झेलने वाले हिस्से होते हैं, इसलिए इन जगहों पर स्लीपरों को बहुत पास-पास (Close Spacing) रखा जाता है। स्विच असेंबली के नीचे स्लीपरों की दूरी आमतौर पर 600 mm के आसपास रखी जाती है ताकि टंग रेल के खिसकने के लिए पर्याप्त जगह भी मिले और ट्रैक को मजबूती भी मिले।
- विशेष इंसर्ट्स और फिटिंग्स: इन स्लीपरों के ऊपर पटरियों को कसने के लिए पहले से ही विशेष कोणों पर लोहे के इंसर्ट्स (Malleable Cast Iron Inserts) डाले जाते हैं। चूंकि टर्नआउट में पटरियां घुमावदार होती हैं, इसलिए इन स्लीपरों का डिज़ाइन कंप्यूटर द्वारा पूरी सटीकता से तैयार किया जाता है। इन्हें किसी अन्य सामान्य ट्रैक पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
टर्नआउट बिछाने के महत्वपूर्ण नियम और ज्यामिति (Layout Geometry)
जब किसी यार्ड या मुख्य लाइन पर टर्नआउट बिछाया जाता है, तो रेलवे इंजीनियरों को कुछ बेहद महत्वपूर्ण ज्यामितीय मापदंडों (Geometric Parameters) की जांच करनी होती है:
- संरेखण (Alignment): टर्नआउट का घुमावदार हिस्सा (Turnout Curve) पूरी तरह से चिकना होना चाहिए। इसमें कोई भी अचानक आने वाला कोणीय बदलाव (Kink) नहीं होना चाहिए। यदि मोड़ पर कोई किंक होगा, तो तेज रफ्तार ट्रेन के पहिए पटरी से उतर जाएंगे।
- गेज (Gauge Maintenance): भारतीय रेलवे के ब्रॉड गेज में सामान्य ट्रैक पर मानक गेज 1676 mm होता है। लेकिन टर्नआउट के घुमावदार हिस्से पर पहियों के फ्लैंज को रगड़ से बचाने के लिए कभी-कभी गेज को थोड़ा ढीला (Slack Gauge – लगभग +5 mm तक) रखा जाता है, विशेष रूप से पुराने डिज़ाइन के सीधे स्विचों में। आधुनिक कर्व्ड और थिक वेब स्विचों में एकदम सटीक 1676 mm का ही उपयोग किया जाता है।
- सुपर-एलिवेशन की अनुपस्थिति (No Super-elevation): सामान्य मोड़ों पर ट्रेनों को पलटने से बचाने के लिए बाहरी पटरी को थोड़ा ऊंचा उठाया जाता है, जिसे सुपर-एलिवेशन या कैंट (Cant) कहते हैं। लेकिन टर्नआउट के हिस्से में मुख्य लाइन सीधी होती है और लूप लाइन मुड़ रही होती है। चूंकि स्लीपर दोनों पटरियों के लिए एक ही होता है, इसलिए हम लूप लाइन के लिए पटरी को ऊंचा नहीं उठा सकते। इस तकनीकी मजबूरी के कारण टर्नआउट पर Negative Cant की स्थिति बन जाती है, और यही मुख्य कारण है कि टर्नआउट पर ट्रेनों की गति को हमेशा सीमित (जैसे 15 या 30 किमी/घंटा) रखना पड़ता है।
P-Way Track Parameters and Inspection Guidelines: The Ultimate Technical Manual
रख-रखाव और सुरक्षा जांच (Maintenance and Safety Inspection)
रेलवे सुरक्षा में पॉइंट्स और क्रॉसिंग्स को सबसे संवेदनशील (Safety-Critical) घटक माना जाता है। सिग्नलिंग विभाग और सिविल इंजीनियरिंग (P-Way) विभाग दोनों मिलकर इसकी दैनिक, साप्ताहिक और मासिक जांच करते हैं। रख-रखाव के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- गैप की जांच (Gap between Tongue and Stock Rail): जब पॉइंट पूरी तरह से बंद (Locked) स्थिति में हो, तो टंग रेल और स्टॉक रेल के बीच 2 mm से अधिक का गैप नहीं होना चाहिए। यदि इन दोनों पटरियों के बीच 5 mm का सिक्का या गेज चला जाए, तो सिग्नल कभी भी हरा (Green) नहीं होगा। यह रेलवे का सबसे कड़ा सुरक्षा नियम है, क्योंकि यदि गैप अधिक होगा, तो ट्रेन का पहिया टंग रेल को चीरते हुए बीच में घुस जाएगा और ट्रेन तुरंत डिरेल हो जाएगी।
- हाउसिंग और वियर (Wear and Tear of Tongue Rail): ट्रेनों के बार-बार गुजरने से टंग रेल का नुकीला सिरा घिसने लगता है। यदि इसकी मोटाई निर्धारित सीमा से कम हो जाए या इसमें कोई दरार (Crack) दिखाई दे, तो इसे तुरंत बदल दिया जाता है या वेल्डिंग तकनीक द्वारा इसकी मरम्मत की जाती है।
- लुब्रिकेशन और सफाई: स्लाइड चेयरों को धूल, मिट्टी और जंग से बचाने के लिए उनकी नियमित सफाई की जाती है। इन पर लगातार ऑयलिंग की जाती है ताकि स्विच मोटर बिना किसी अतिरिक्त लोड के टंग रेल को आसानी से खिसका सके।
- चेक रेल क्लीयरेंस की जांच: क्रॉसिंग के सामने लगी चेक रेल और मुख्य रेल के बीच का गैप हमेशा 44 mm से 48 mm के बीच होना चाहिए। यदि यह गैप बढ़ जाएगा, तो चेक रेल पहिए को मजबूती से नहीं पकड़ पाएगी और पहिया क्रॉसिंग के नोज़ (Nose) से टकरा जाएगा।
निष्कर्ष
भारतीय रेलवे के स्थायी मार्ग (Permanent Way) इंजीनियरिंग में Points, Switches, and Crossings का डिज़ाइन और उनका रख-रखाव विज्ञान और कला का एक अद्भुत संगम है। एक साधारण लीवर से शुरू होकर आज आधुनिक थिक वेब स्विच, कास्ट मैंगनीज स्टील (CMS) क्रॉसिंग्स और इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग मोटर्स तक का सफर रेलवे की तकनीकी प्रगति को दर्शाता है। इन गतिशील प्रणालियों की हर एक मिलिमीटर की सटीकता पर ही देश की करोड़ों जिंदगियों और हजारों मालगाड़ियों का सुरक्षित सफर टिका होता है।
1. रेलवे में टर्नआउट और स्विच में क्या मुख्य अंतर होता है?
उत्तर: स्विच (Switch) टर्नआउट का केवल शुरुआती चलने वाला हिस्सा होता है जो ट्रेन के पहियों को दिशा देने का काम करता है, जबकि पूरे सेट (जिसमें स्विच, लीड रेल्स, क्रॉसिंग और चेक रेल्स शामिल हैं) को मिलाकर संयुक्त रूप से टर्नआउट (Turnout) कहा जाता है।
2. भारतीय रेलवे की मुख्य लाइनों पर सबसे ज़्यादा कौन सा टर्नआउट इस्तेमाल किया जाता है?
उत्तर: भारतीय रेलवे के ब्रॉड गेज मुख्य मार्गों पर पैसेंजर ट्रेनों को लूप लाइन या प्लेटफॉर्म पर लेने के लिए सबसे ज़्यादा 1 in 12 टर्नआउट का उपयोग किया जाता है।
3. रेलवे ट्रैक पर CMS क्रॉसिंग का उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर: CMS का पूरा नाम कास्ट मैंगनीज स्टील है। इस क्रॉसिंग को बिना किसी जोड़ या बोल्ट के एक सिंगल ठोस ब्लॉक के रूप में ढाला जाता है। मैंगनीज स्टील ट्रेनों के भारी दबाव से समय के साथ और अधिक कठोर हो जाता है, जिससे इसका जीवनकाल साधारण क्रॉसिंग से कई गुना अधिक होता है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
विशेष सूचना: इस ब्लॉग पोस्ट पर दी गई सभी तकनीकी जानकारी केवल शैक्षिक उद्देश्यों (Educational Purposes) और सामान्य ज्ञान के लिए है। यह ब्लॉग भारतीय रेलवे या किसी आधिकारिक सिविल इंजीनियरिंग संस्थान की आधिकारिक गाइडबुक नहीं है। रेलवे ट्रैक इंजीनियरिंग के सटीक, लाइव और आधिकारिक नियमों व आंकड़ों के लिए कृपया हमेशा भारतीय रेलवे के नवीनतम P-Way Manual (IRPWM) और सरकारी नियमों का ही संदर्भ लें। इस जानकारी के व्यावहारिक उपयोग से होने वाले किसी भी प्रकार के नुकसान के लिए यह ब्लॉग या इसका लेखक ज़िम्मेदार नहीं होगा।
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