I.C. Engine का इतिहास, ऊर्जा रूपांतरण और बुनियादी परिभाषा ( Track Machine IC Engine )
इंजन एक मैकेनिकल डिवाइस है जो ऊर्जा के एक रूप को दूसरे रूप में परिवर्तित करता है। भारतीय रेलवे की भारी ऑन-ट्रैक मशीनों (जैसे CSM, BCM, UNIMAT) को मजबूत टॉर्क और ताकत देने के लिए Internal Combustion (I.C.) डीजल इंजन का ही उपयोग किया जाता है।
1. इंजन की बुनियादी खोज और इतिहास (The Invention)
- प्रथम आविष्कारक: जर्मन मैकेनिकल इंजीनियर रुडोल्फ डीजल (Rudolf Diesel) ने इस मैकेनिज्म को खोजा था।
- अविष्कार का वर्ष: इसकी शुरुआत वर्ष 1893 में हुई थी।
- मूल सिद्धांत: बिना स्पार्क प्लग के, केवल हवा को दबाव में दबाकर ईंधन जलाने (Compression Ignition) की तकनीक विकसित की गई।

2. रासायनिक ऊर्जा से यांत्रिक ऊर्जा का रूपांतरण (Energy Conversion Science)
यह इंजन ईंधन की रासायनिक शक्ति को सीधे रोटरी मैकेनिकल ताकत में बदल देता है। यह पूरा पावर फ्लो बंद सिलेंडर के भीतर चार चरणों में होता है:
- डीजल ईंधन: रासायनिक ऊर्जा (Chemical Energy) का मुख्य स्रोत है।
- दहन (Combustion): सिलेंडर के अंदर ईंधन जलते ही ऊष्मा ऊर्जा (Heat Energy) में बदल जाता है।
- रेखीय गति (Linear Motion): गैसों के भारी दबाव से पिस्टन ऊपर-नीचे घूमता है, जिसे Reciprocating Motion कहते हैं।
- घूर्णन गति (Rotary Motion): कनेक्टिंग रॉड और क्रैंकशाफ्ट मिलकर इस सीधी गति को यांत्रिक ऊर्जा (Rotary Motion) में बदल देते हैं।

3. Internal Combustion (I.C.) बनाम External Combustion (E.C.) इंजन
रेलवे की ऑन-ट्रैक मशीनों में जगह की कमी और पावर की जरूरत के कारण सिर्फ आंतरिक दहन (I.C.) इंजन ही चुने जाते हैं। इनका सटीक तकनीकी अंतर इस प्रकार है:
- दहन का स्थान (Combustion Location): I.C. इंजन में ईंधन सिलेंडर के अंदर जलता है, जबकि E.C. इंजन में ईंधन सिलेंडर के बाहर (जैसे पुराने स्टीम इंजन के बॉयलर में) जलता है।
- थर्मल एफिशिएंसी (Thermal Efficiency): I.C. इंजन की एफिशिएंसी अत्यधिक उच्च (35% से 45%) होती है, जबकि E.C. इंजन की काफी कम (15% से 25%) होती है।
- भार-शक्ति अनुपात (Weight-Power Ratio): I.C. इंजन बहुत कम वजन में हॉर्सपावर देता है, जबकि E.C. इंजन का ढांचा बेहद भारी और विशालकाय होता है।
- स्टार्टिंग टाइम (Starting Time): I.C. इंजन क्विक और इजी स्टार्टिंग देता है, जबकि E.C. इंजन में भाप का सटीक
- प्रेशर बनने में घंटों का समय लगता है।
4. ट्रैक मशीनों के I.C. इंजन के फायदे और नुकसान
मुख्य लाभ (Advantages):
- कॉम्पैक्ट डिज़ाइन: मशीन के सीमित चेसिस के अंदर आसानी से फिट हो जाता है।
- हाई आरपीएम जेनरेशन: ई.सी. इंजनों के मुकाबले कहीं ज्यादा स्पीड और रोटेशन पैदा करने में सक्षम।
- कम मेंटेनेंस कॉस्ट: स्टीम इंजनों या बड़े बॉयलरों की तुलना में इसका रख-रखाव बेहद सस्ता है।
मुख्य नुकसान (Disadvantages):
- भारी ध्वनि प्रदूषण: सिलेंडर के धमाकों के कारण तेज आवाज और वाइब्रेशन पैदा करता है।
- प्रदूषण का स्तर: हानिकारक गैसें (CO, NOx) और काला धुआं उत्सर्जित करता है।
- सिंगल एक्टिंग कोर: ये इंजन सिंगल-एक्टिंग होते हैं, जिससे एनर्जी फ्लो बनाए रखने के लिए भारी फ्लाईव्हील चाहिए।
5. 4-स्ट्रोक डीजल चक्र का वर्किंग मैकेनिज्म (The 4-Strokes)
ट्रैक मशीनों में उपयोग होने वाले सभी Cummins, MWM और Deutz इंजन 4-स्ट्रोक मैकेनिज्म पर काम करते हैं। इसका पूरा चक्र 2 क्रैंकशाफ्ट रोटेशन (यानी 720°) में पूरा होता है:
- सक्शन स्ट्रोक (Suction Stroke): इनलेट वाल्व खुलता है, पिस्टन टीडीसी (TDC) से बीडीसी (BDC) की तरफ जाता है और वैक्यूम से सिर्फ साफ हवा अंदर खींचता है।
- कंप्रेशन स्ट्रोक (Compression Stroke): दोनों वाल्व बंद होते हैं। पिस्टन ऊपर की तरफ हवा को दबाता है, जिससे प्रेशर 28 bar और तापमान 550°C तक बढ़ जाता है।
- पावर स्ट्रोक (Power Stroke): ठीक इसी समय इंजेक्टर डीजल का सटीक स्प्रे करता है। हवा इतनी गर्म होती है कि डीजल तुरंत ब्लास्ट होता है और पिस्टन को नीचे धकेलकर यांत्रिक ऊर्जा (Power) जनरेट करता है।
- एग्जॉस्ट स्ट्रोक (Exhaust Stroke): एग्जॉस्ट वाल्व खुलता है और पिस्टन ऊपर आकर जली हुई गैसों को साइलेंसर से तरीके से बाहर धकेलता है।
7. ट्रैक मशीनों के भारी इंजनों की दो मुख्य ईंधन प्रणालियाँ (Fuel Supply Systems)
रेलवे की भारी मशीनों में डीजल की डिलीवरी के लिए दो अलग-अलग सिद्धांतों वाली प्रणालियों का उपयोग किया जाता है। इन्हें समझना रेलवे परीक्षाओं और फील्ड वर्क दोनों के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है:
(A) माइको-बॉश ईंधन प्रणाली (MICO-Bosch Individual Pump System)

यह प्रणाली MWM (Greaves) और Deutz जैसे भारी इंजनों में देखने को मिलती है।
- सिद्धांत: इसमें हर सिलेंडर के लिए अलग से फ्यूल इंजेक्शन पंप (FIP) के भीतर एक रेसिप्रोकेटिंग प्लंजर लगा होता है।
- वर्किंग: लो-प्रेशर फीड पंप डीजल को टैंक से खींचकर फिल्टर के माध्यम से FIP को देता है। FIP का प्लंजर डीजल को हाई प्रेशर (लगभग 180 bar) पर दबाता है।
- इन्जेक्शन: यह हाई-प्रेशर डीजल मोटी धातु की पाइपों से होता हुआ इंजेक्टर तक जाता है। डीजल का हाई प्रेशर खुद ही इंजेक्टर की सुई (Needle Valve) को ऊपर धकेलता है, जिससे कम्बशन चैंबर में डीजल की धुंध (Atomized Spray) स्प्रे हो जाती है।
(B) कमिन्स पी.टी. ईंधन प्रणाली (Cummins PT – Pressure-Time System)

यह प्रणाली केवल Cummins (जैसे NTA-855, KTA-1150) इंजनों में इस्तेमाल होती है। यह कमिन्स के इंजीनियरों का एक मास्टरस्ट्रोक डिज़ाइन है।
- सिद्धांत: यह इस वैज्ञानिक नियम पर काम करता है कि सिलेंडर में इंजेक्ट होने वाले डीजल की मात्रा दो चीजों पर निर्भर करती है—(1) फ्यूल का प्रैशर (Pressure) और (2) इंजेक्टर कप में डीजल भरने के लिए उपलब्ध समय (Time)।
- वर्किंग: इसमें कोई हाई-प्रेशर FIP नहीं होता। एक कॉमन लो-प्रेशर गियर पंप टैंक से डीजल खींचकर सिर्फ 200 से 300 PSI के कम दबाव पर सीधे कॉमन रेल (फ्यूल मैनीफोल्ड) में भेज देता है।
- इंजेक्टर एक्चुएशन: यहाँ इंजेक्टर के प्लंजर को दबाने का काम कोई फ्यूल प्रैशर नहीं करता, बल्कि कैमशाफ्ट पर बना तीसरा सटीक कैम लोब, पुश रॉड और रॉकर आर्म के जरिए मैकेनिकली करता है। जैसे ही रॉकर आर्म इंजेक्टर को दबाता है, कम्बशन चैंबर के ठीक पास डीजल का प्रैशर बढ़कर 180 bar से ऊपर पहुँच जाता है और स्प्रे हो जाता है। इसे यूनिट इंजेक्टर मैकेनिज्म भी कहते हैं।
इंजन की ज्यामिति (Engine Geometry) और सटीक तकनीकी गणित

इंजन सिलेंडर के अंदर की बनावट, पिस्टन की चाल और हवा को दबाने की वैज्ञानिक क्षमता को समझने के लिए हमें इंजन की ज्यामिति (Geometry) और उसकी टर्मिनोलॉजी को बारीकी से समझना होगा।
- 1. Cylinder Bore (d): इंजन सिलेंडर के अंदरूनी खोखले हिस्से के सटीक व्यास (Internal Diameter) को बोर कहते हैं। इसे हमेशा mm या इंच में नापा जाता है।
- 2. Top Dead Centre (TDC): यह सिलेंडर के अंदर पिस्टन की सबसे ऊपरी अंतिम सीमा (Extreme Top Point) है। पिस्टन इसके ऊपर किसी भी हालत में और आगे नहीं चढ़ सकता।
- 3. Bottom Dead Centre (BDC): यह सिलेंडर के अंदर पिस्टन की सबसे निचली अंतिम सीमा (Extreme Bottom Point) है। पिस्टन इसके नीचे और आगे नहीं गिर सकता।
- 4. स्ट्रोक (Stroke): पिस्टन द्वारा एक ही दिशा में तय की गई पूरी गति—यानी TDC से BDC तक जाना, या BDC से TDC तक आना—एक स्ट्रोक कहलाता है।
- 5. स्ट्रोक लेंथ (Stroke Length – L): TDC से लेकर BDC के बीच की कुल ऊर्ध्वाधर दूरी (Vertical Distance) को स्ट्रोक लेंथ कहा जाता है।
क्रैंकशाफ्ट थ्रो (Crankshaft Throw) का सटीक विज्ञान
इंजन में पिस्टन ऊपर-नीचे (Linear Motion) चलता है, लेकिन क्रैंकशाफ्ट गोल (Rotary Motion) घूमती है। इस तालमेल के पीछे क्रैंकशाफ्ट थ्रो का गणित काम करता है।
- थ्रो (Throw) क्या है?: क्रैंकशाफ्ट के मेन जर्नल (Main Journal) के केंद्र से लेकर क्रैंकपिन (Crank Pin) के केंद्र के बीच की सेंटर-टू-सेंटर दूरी को क्रैंकशाफ्ट थ्रो कहते हैं।
- महत्वपूर्ण गणितीय नियम: क्रैंकशाफ्ट का थ्रो हमेशा पिस्टन के स्ट्रोक की लंबाई का ठीक आधा होता है।
क्रैंकशाफ्ट थ्रो = स्ट्रोक की लंबाई / 2 - इसी वजह से, जब पिस्टन दो स्ट्रोक (एक बार नीचे और एक बार ऊपर) पूरे करता है, तो क्रैंकशाफ्ट का एक पूरा चक्कर 360 Degrees मुकम्मल होता है।

स्वैप्ट वॉल्यूम और क्लीयरेंस वॉल्यूम का सूत्र
क्लीयरेंस वॉल्यूम (Clearance Volume – Vc)
जब पिस्टन अपनी सबसे ऊपरी सीमा यानी TDC पर खड़ा होता है, उस समय पिस्टन के सिर (Piston Head) के ऊपर सिलेंडर हेड के बीच जो खाली जगह बचती है, उसके आयतन को क्लीयरेंस वॉल्यूम कहते हैं। यही वह मुख्य जगह है जहाँ डीजल का मजबूत कम्बशन (धमाका) होता है।
स्वैप्ट वॉल्यूम / डिस्प्लेसमेंट वॉल्यूम (Swept Volume – Vs)
पिस्टन द्वारा TDC से BDC के बीच चलते समय सिलेंडर के अंदर जितना आयतन (Volume) बुहारा या कवर किया जाता है, उसे स्वैप्ट वॉल्यूम या इंजन डिस्प्लेसमेंट कहते हैं।
- गणितीय सूत्र:
स्वैप्ट वॉल्यूम (Swept Volume – Vs) का सटीक सूत्र: - Vs = (pi / 4) * d^2 * L
- या सरल शब्दों में:
- Vs = 0.7854 * (d * d) * L
कंप्रेशन रेशियो (Compression Ratio – C.R.) का जादुई गणित
यह डीजल इंजन का सबसे क्रिटिकल पैरामीटर है। यह सिलेंडर के कुल आयतन (जब पिस्टन बिल्कुल नीचे BDC पर हो) और क्लीयरेंस आयतन (जब पिस्टन बिल्कुल ऊपर TDC पर हो) का एक सटीक अनुपात है।
- गणितीय सूत्र:
r = (Vc + Vs) / Vc - डीजल इंजन बनाम पेट्रोल इंजन रेंज:
- डीजल इंजन (Compression Ignition): इनका कंप्रेशन रेशियो बहुत हाई होता है, आमतौर पर 16:1 से लेकर 22:1 तक। इसी भारी दबाव के कारण हवा इतनी गर्म हो जाती है कि बिना स्पार्क प्लग के डीजल खुद जल उठता है।
- पेट्रोल इंजन (Spark Ignition): इनका कंप्रेशन रेशियो कम होता है, आमतौर पर 6:1 से लेकर 10:1 तक।
इंजन वर्किंग मैकेनिज्म, 720 डिग्री का चक्र और वाल्व टाइमिंग का मजबूत विज्ञान
360 डिग्री (360 Degrees): जब क्रैंकशाफ्ट एक पूरा गोल चक्कर घूमती है।
720 डिग्री (720 Degrees): जब क्रैंकशाफ्ट पूरे दो चक्कर घूमती है।
4-स्ट्रोक डीजल इंजन अपना एक पूरा काम (एक वर्किंग साइकिल) 720 Degrees क्रैंक रोटेशन में पूरा करता है। इसका मतलब है कि पिस्टन सिलेंडर में 4 बार ऊपर-नीचे दौड़ेगा, क्रैंकशाफ्ट 2 चक्कर घूमेगी, लेकिन कैमशाफ्ट केवल 1 चक्कर (360 Degrees) ही घूमेगी।
1. चारों स्ट्रोक का आसान देसी मैकेनिज्म (Step-by-Step Engine Operation)
इंजन के चारों स्ट्रोक के दौरान पिस्टन, वाल्व और फ्लाईव्हील का मजबूत तालमेल इस प्रकार चलता है:
1. सक्शन स्ट्रोक (Suction Stroke) – हवा का खिंचाव
- क्रैंकशाफ्ट का रोटेशन: 0 से 180 Degrees (आधा चक्कर)।
- पिस्टन की चाल: पिस्टन सबसे ऊपर टीडीसी (TDC) से नीचे बीडीसी (BDC) की तरफ भागता है।
- वाल्व की स्थिति: इनलेट वाल्व खुल जाता है और एग्जॉस्ट वाल्व तरीके से बंद रहता है।
- असली काम: पिस्टन जब तेजी से नीचे गिरता है, तो सिलेंडर के भीतर एक तगड़ा वैक्यूम (निर्वात/खालीपन) बनता है। इसी वैक्यूम के खिंचाव के कारण बाहर की शुद्ध हवा इनलेट वाल्व के रास्ते सिलेंडर में तरीके से खींच ली जाती है।
- फ्लाईव्हील का रोल: इस स्ट्रोक को पूरा करने के लिए फ्लाईव्हील अपनी पुरानी बची हुई एनर्जी इंजन को देता है।
2. कंप्रेशन स्ट्रोक (Compression Stroke) – हवा का भारी दबाव
- क्रैंकशाफ्ट का रोटेशन: 180 से 360 Degrees (पहला चक्कर पूरा)।
- पिस्टन की चाल: पिस्टन अब नीचे बीडीसी से वापस ऊपर टीडीसी की तरफ चढ़ता है।
- वाल्व की स्थिति: इनलेट और एग्जॉस्ट दोनों वाल्व तरीके से बंद हो जाते हैं।
- असली काम: अब सिलेंडर पूरी तरह बंद है। ऊपर उठता हुआ पिस्टन अंदर फंसी हवा को बहुत बुरी तरह दबाता है (कंप्रेस करता है)। जब हवा दबती है, तो मैकेनिकल नियमों के कारण हवा का प्रेशर 28 bar और तापमान 550 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। हवा इतनी गर्म हो जाती है कि छूते ही आग लग जाए।
- फ्लाईव्हील का रोल: इस स्ट्रोक में भी फ्लाईव्हील अपनी ताकत से पिस्टन को ऊपर की तरफ धकेलता है।
3. पावर स्ट्रोक (Power / Expansion Stroke) – असली धमाका और ताकत
- क्रैंकशाफ्ट का रोटेशन: 360 से 540 Degrees (डेढ़ चक्कर)।
- पिस्टन की चाल: धमाके के दबाव से पिस्टन ऊपर टीडीसी से पूरी ताकत से नीचे बीडीसी की तरफ गिरता है।
- वाल्व की स्थिति: दोनों वाल्व अभी भी तरीके से बंद हैं।
- असली काम: जैसे ही पिस्टन टीडीसी के पास पहुँचता है, इंजेक्टर गर्म हवा के ऊपर डीजल का स्प्रे करता है। डीजल का स्वतः जलने का तापमान (Self-ignition temperature) केवल 440 डिग्री सेल्सियस होता है, इसलिए वह 550 डिग्री सेल्सियस की गर्म हवा में गिरते ही धमाके के साथ खुद-ब-खुद जल उठता है। ईंधन जलने से बहुत हाई प्रैशर वाली गैसें बनती हैं, जो पिस्टन के सिर पर मजबूत धक्का मारती हैं। पिस्टन नीचे भागता है और कनेक्टिंग रॉड के जरिए क्रैंकशाफ्ट को मजबूत टॉर्क (ताकत) देता है।
- फ्लाईव्हील का मास्टर रोल: यही वो इकलौता स्ट्रोक है जहाँ इंजन को असली ताकत मिलती है। फ्लाईव्हील इस धमाके की पूरी मैकेनिकल एनर्जी को अपने अंदर तरीके से समेट (Store) लेता है, ताकि बाकी के तीन खाली स्ट्रोक बिना रुके चल सकें।
4. एग्जॉस्ट स्ट्रोक (Exhaust Stroke) – धुआं बाहर फेंकना
- क्रैंकशाफ्ट का रोटेशन: 540 से 720 Degrees (पूरे दो चक्कर मुकम्मल)।
- पिस्टन की चाल: पिस्टन नीचे बीडीसी से वापस ऊपर टीडीसी की तरफ भागता है।
- वाल्व की स्थिति: एग्जॉस्ट वाल्व खुल जाता है और इनलेट वाल्व बंद रहता है।
- असली काम: पावर स्ट्रोक के बाद सिलेंडर में बची हुई जली गैसों और धुएं को ऊपर उठता हुआ पिस्टन धक्का मारकर एग्जॉस्ट वाल्व और साइलेंसर के रास्ते बाहर निकाल देता है। इसके बाद अगला सक्शन स्ट्रोक फिर से चालू हो जाता है।

2. किताबी ज्ञान बनाम हकीकत: वाल्व टाइमिंग का असली मैकेनिज्म
किताबों में लिखा होता है कि वाल्व ठीक टीडीसी या बीडीसी पर खुलते हैं, लेकिन अगर असलियत में ऐसा किया गया तो इंजन हाई स्पीड पर कबाड़ हो जाएगा। हवा और धुएं को आने-जाने में कुछ मिलीसेकंड का समय लगता है, इसलिए टाइमिंग में बदलाव किए जाते हैं
- इनलेट वाल्व का एडवांस खुलना (Inlet Valve Advance – IVO): हवा को सिलेंडर में आने के लिए पूरा समय मिले, इसलिए इनलेट वाल्व सक्शन स्ट्रोक शुरू होने से पहले ही, यानी पिस्टन के टीडीसी पर पहुँचने से 5 से 10 Degrees पहले ही खोल दिया जाता है। (याद रखें: MWM इंजन इसका अपवाद है, उसमें यह टीडीसी के 1 Degree बाद खुलता है).
- इनलेट वाल्व का देर से बंद होना (Inlet Valve Lag – IVC): पिस्टन जब सक्शन खत्म करके बीडीसी पर पहुँच जाता है, तब भी हवा अपने मोमेंटम (गति) के कारण अंदर आ रही होती है। इसलिए इनलेट वाल्व को कंप्रेशन स्ट्रोक शुरू होने के बाद भी 35 से 50 Degrees बाद तक खुला रखा जाता है ताकि सिलेंडर पूरा हवा से ठूस जाए।
- डीजल स्प्रे टाइमिंग (Fuel Injection – FIS): डीजल को जलने में थोड़ा समय (Ignition Delay) लगता है। इसलिए ठीक टीडीसी पर स्प्रे करने के बजाय, कंप्रेशन स्ट्रोक के अंत में टीडीसी आने से 14 से 18 Degrees पहले (कमिन्स इंजनों में 26 से 29 Degrees पहले) ही डीजल छिड़क दिया जाता है। जैसे ही पिस्टन टीडीसी पर पहुँचता है, इंजेक्शन तुरंत बंद (FIC) हो जाता है।
- एग्जॉस्ट वाल्व का पहले खुलना (Exhaust Valve Advance – EVO): पिस्टन को धुआं बाहर ढकेलने में अपनी ताकत बर्बाद न करनी पड़े, इसलिए पावर स्ट्रोक खत्म होने से पहले ही, यानी पिस्टन के बीडीसी पहुँचने से 35 से 50 Degrees पहले ही एग्जॉस्ट वाल्व खोल दिया जाता है। इससे 70% धुआं अपने प्रैशर से खुद बाहर भाग जाता है।
- वाल्व ओवरलैप (Valve Overlap) क्या है?: एग्जॉस्ट स्ट्रोक के आखिरी पलों और सक्शन के शुरुआती पलों में एक ऐसा महत्वपूर्ण समय आता है जब इनलेट और एग्जॉस्ट दोनों वाल्व एक साथ सिलेंडर में खुले होते हैं। इसी को वाल्व ओवरलैप कहते हैं, जो सिलेंडर की सफाई (Scavenging) के लिए बहुत जरूरी है।
3. फायरिंग ऑर्डर (Firing Order) का सटीक गणित
इंजन के सभी सिलेंडरों में एक साथ धमाका नहीं किया जाता, वरना क्रैंकशाफ्ट एक झटके में टूट जाएगी। क्रैंकशाफ्ट पर बियरिंग्स का लोड बराबर बंटे, इसके लिए एक तय क्रम में सिलेंडरों में पावर स्ट्रोक दिया जाता है।
पावर अंतराल का फिक्स सूत्र:
720 Degrees को सिलेंडरों की कुल संख्या से भाग देने पर पता चलता है कि हर कितने डिग्री के चक्कर पर नया धमाका होगा:
Power Interval Gap = 720 / Cylinders Number
(यहाँ Power Interval Gap = दो पावर स्ट्रोक के बीच का क्रैंक रोटेशन एंगल (Degrees) है, और Cylinders Number = इंजन के सिलेंडरों की कुल संख्या है)
- 4-सिलेंडर इंजन: (720 / 4 = 180 Degrees) हर आधे चक्कर पर एक नया पावर स्ट्रोक मिलता है। (फायरिंग ऑर्डर: 1 – 3 – 4 – 2).
- 6-सिलेंडर इंजन (CSM/UNIMAT Cummins Engines): (720 / 6 = 120 Degrees) इसमें हर 120 डिग्री पर ब्लास्ट होता है, जिससे दो सिलेंडरों के बीच सटीक 60 Degrees का पावर ओवरलैप मिलता है, जिससे इंजन बहुत स्मूथ चलता है। (आधिकारिक फायरिंग ऑर्डर: 1 – 5 – 3 – 6 – 2 – 4).
- 12-सिलेंडर भारी इंजन (BCM MWM/Deutz इंजनों का V-12 सेटअप): (720 / 12 = 60 Degrees). हर 60 डिग्री के जरा से रोटेशन पर एक नया सिलेंडर फायर हो जाता है, जिससे मशीन को भयानक और निरंतर टॉर्क मिलता है।
- Deutz V12 ऑर्डर: 1 – 8 – 5 – 10 – 3 – 7 – 6 – 11 – 2 – 9 – 4 – 12
- MWM V12 ऑर्डर: A1 – B2 – A5 – B4 – A3 – B1 – A6 – B5 – A2 – B3 – A4 – B6
इंजन के मुख्य पुर्जे (Core Components) और 3-Cam कैमशाफ्ट का विज्ञान
भारी-भरकम ऑन-ट्रैक मशीनों के डीजल पावरपैक को लोड और टॉर्क झेलना पड़ता है। इसलिए इसके पुर्जों की बनावट, मटेरियल (Metallurgy) और आंतरिक डिजाइन को बेहद मजबूत और सटीक बनाया जाता है।
1. स्थिर पुर्जे (Static Components)
1. सिलेंडर ब्लॉक और क्रैंककेस (Cylinder Block and Crankcase)
- बनावट और काम: यह पूरे इंजन का बुनियादी ढांचा (Framework) होता है। इसके ऊपरी हिस्से में इंजन सिलेंडर बने होते हैं और निचला हिस्सा क्रैंककेस कहलाता है, जो क्रैंकशाफ्ट और कैमशाफ्ट को मजबूत सपोर्ट देता है।
- मटेरियल: यह भारी लोड और थर्मल स्ट्रेस झेलने के लिए कास्ट आयरन (Cast Iron) का बना होता है।
- इंजन के बीच संरचनात्मक अंतर (Structural Variant):
- Cummins और MWM इंजन: इनमें सिलेंडर ब्लॉक और क्रैंककेस को एक साथ सिंगल कास्टिंग (Integrally Cast) करके बनाया जाता है।
- Deutz BF 12L 513C इंजन: इसमें एक स्टैंडअलोन क्रैंककेस ब्लॉक होता है, और इसके ऊपर सभी 12 सिलेंडरों की व्यक्तिगत असेंबली (Individual Cylinders) को अलग-अलग बोल्ट के जरिए मजबूत फिट किया जाता है।
- इंटरनल रास्ते: इसके भीतर मोबिल ऑयल के बहाव के लिए ऑयल गैलरीज (Inbuilt Oil Galleries) और वाटर-कूल्ड इंजनों के लिए वाटर पैसेज बने होते हैं।
2. सिलेंडर हेड (Cylinder Head)
- काम: यह सिलेंडर ब्लॉक के ऊपरी हिस्से को पूरी तरह से कवर करता है। इसके भीतर कम्बशन चैंबर (Combustion Chamber) बना होता है। इसी हेड के ऊपर इनलेट वाल्व, एग्जॉस्ट वाल्व और इंजेक्टर को फिट करने के लिए सटीक छेद बने होते हैं।
- मटेरियल: यह भी उच्च तापमान झेलने के लिए कास्ट आयरन (Cast Iron) का बनाया जाता है।
- विशेष नोट: कमिन्स (Cummins) के कुछ बड़े इंजनों में दो सिलेंडर हेड एक साथ जुड़े होते हैं (Two Heads Cast Integrally)।
3. ऑयल सम्प या ऑयल पैन (Oil Sump / Pan)
- काम: यह इंजन का सबसे निचला हिस्सा है, जो क्रैंककेस के नीचे गास्केट और स्क्रू के जरिए कसा होता है। इसका मुख्य काम इंजन लुब्रिकेशन सिस्टम के लिए मोबिल ऑयल को स्टोर रखना है। इसके सबसे नीचे मोबिल ऑयल निकालने के लिए एक ड्रेन प्लग (Drain Plug) लगा होता है।
- मटेरियल: यह स्टील शीट (Steel Sheet) या एल्युमिनियम (Aluminum) का बनता है।
- चेतावनी नियम: एल्युमिनियम या स्टील का होने के कारण मशीन की शिफ्टिंग या माउंटिंग के समय इस पर लोड देना सख्त मना है। इसे हमेशा नीचे लकड़ी के गुटकों (Wooden Blocks) का मजबूत सपोर्ट देकर सुरक्षित रखा जाता है ताकि यह फटे नहीं।
2. गतिशील पुर्जे (Moving Components)
1. पिस्टन (Piston)
- काम: कम्बशन चैंबर में डीजल जलने से जो भारी दबाव बनता है, पिस्टन उस ताकत को कनेक्टिंग रॉड के माध्यम से क्रैंकशाफ्ट तक ट्रांसफर करता है।
- मटेरियल: यह हल्के वजन और बेहतरीन हीट ट्रांसफर के लिए एल्युमिनियम अलॉय (Aluminum Alloy) का बनाया जाता है।
2. पिस्टन रिंग्स (Piston Rings)
पिस्टन के बाहरी हिस्से पर बने खांचों (Grooves) में विशेष स्प्लिट रिंग्स फिट होती हैं, जिनके जॉइंट्स लैप, एंगल्ड या बट टाइप (Lap, Angled, or Butt Joints) होते हैं। यह कास्ट आयरन अलॉय (Cast Iron Alloy) की बनती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं:
- कंप्रेशन रिंग (Compression Rings): ये पिस्टन के ऊपरी हिस्से में कम से कम दो लगी होती हैं। इनका काम कम्बशन प्रैशर और कंप्रेस हवा को नीचे क्रैंककेस में लीक होने से रोकना (Seal) है।
- ऑयल कंट्रोल रिंग (Oil Control Rings): यह पिस्टन के निचले खांचे में कम से कम एक लगी होती है। इसका काम सिलेंडर लाइनर की दीवारों पर जमे अतिरिक्त मोबिल ऑयल को खुरचकर (Scrape) वापस नीचे ऑयल सम्प में भेजना है, ताकि मोबिल ऑयल कम्बशन चैंबर में जाकर जले नहीं। यह दीवारों पर मोबिल ऑयल की एक पतली फिल्म (Film) भी बनाए रखती है।
- नोट: 4-स्ट्रोक इंजनों में ऑयल रिंग अनिवार्य है, लेकिन 2-स्ट्रोक इंजनों में यह नहीं होती।
3. गजन पिन या पिस्टन पिन (Gudgeon Pin / Piston Pin)
- काम: यह पिस्टन को कनेक्टिंग रॉड के छोटे सिरे (Small End) से जोड़ती है। यह अंदर से पूरी तरह खोखली (Hollow) होती है।
- मटेरियल: यह स्टील अलॉय (Case Hardened Steel Alloy) की बनती है।
- सेफ्टी लॉक: गजन पिन को अपनी जगह पर लॉक रखने और उसका साइड मूवमेंट रोकने के लिए पिस्टन बॉस के बाहरी सिरों पर सी-क्लिप्स या स्नैप रिंग्स (Circlips / Snap Rings) फिट की जाती हैं।
4. कनेक्टिंग रॉड (Connecting Rod)
- काम: यह पिस्टन पिन और क्रैंकशाफ्ट के क्रैंकपिन को आपस में जोड़ती है। इसका मुख्य काम पिस्टन की सीधी गति (Linear Motion) को क्रैंकशाफ्ट की घूर्णन गति (Rotary Motion) में बदलना है।
- डिजाइन और रास्ते: इसका क्रॉस-सेक्शन आमतौर पर I-Beam शेप का होता है। इसके छोटे सिरे (Small End) पर फॉस्फर ब्रॉन्ज बुश (Phosphor Bronze Bush) लगा होता है, और बड़े सिरे (Big End) पर दो भागों वाला व्हाइट मेटल का प्लेन बियरिंग लगा होता है। छोटे सिरे से बड़े सिरे तक मोबिल ऑयल पहुँचाने के लिए इसके बीच में एक सटीक ड्रिल रास्ता (Drill Passage) बना होता है।
- नंबरिंग नियम: इंजन के सभी कनेक्टिंग रॉड्स का वजन बिल्कुल बराबर होना चाहिए। मेंटेनेंस के समय इनके कैप (Bearing Cap) की आपस में अदला-बदली (Interchange) न हो, इसलिए असेंबली के समय ही इन पर मैचिंग नंबर डाल दिए जाते हैं।
5. क्रैंकशाफ्ट और भारी फ्लाईव्हील (Crankshaft and Flywheel)
- क्रैंकशाफ्ट: यह इंजन का मुख्य रीढ़ है जो पिस्टन की ताकत से गोल घूमती है। यह स्टील अलॉय (Steel Alloy) की बनती है। इसमें क्रैंकपिन, वेब्स, बैलेंसिंग वेट और मेन जर्नल होते हैं।
- डीजल इंजन का नियम: पेट्रोल इंजन के विपरीत, भारी डीजल इंजनों में अत्यधिक टॉर्क संभालने के लिए हर एक क्रैंकपिन के दोनों तरफ एक-एक मेन बियरिंग जर्नल दिया जाता है।
- फ्लाईव्हील (Flywheel): यह क्रैंकशाफ्ट के पिछले सिरे (Rear End) पर लगा एक भारी स्टील का व्हील है। चूँकि 4-स्ट्रोक इंजन में पावर सिर्फ एक स्ट्रोक में मिलती है, इसलिए फ्लाईव्हील पावर स्ट्रोक की एनर्जी को अपने अंदर स्टोर कर लेता है और बाकी के तीन स्ट्रोक (सक्शन, कंप्रेशन, एग्जॉस्ट) में उसे रिलीज करके क्रैंकशाफ्ट की स्पीड को स्थिर बनाए रखता है। इसके बाहरी हिस्से पर गियर के दांत (Teeth) बने होते हैं, जिससे सेल्फ-स्टार्टर का पिनियन मेश होकर इंजन को स्टार्ट करता है।
3 कमिन्स का अनोखा 3-Cam कैमशाफ्ट मैकेनिज्म (The 3-Cam Science)

इंजन के इनलेट और एग्जॉस्ट वाल्व को सही समय पर खोलने और बंद करने का काम कैमशाफ्ट करती है, जो क्रैंकशाफ्ट गियर के जरिए सीधे ड्राइवर होती है।
1. गियर रेशियो का नियम
कैमशाफ्ट गियर में दांतों की संख्या क्रैंकशाफ्ट गियर से ठीक दुगुनी होती है। इनका गियर रेशियो 1:2 होता है। इसका सीधा मतलब है कि जब क्रैंकशाफ्ट पूरे 2 चक्कर (720 Degrees) घूमती है, तब कैमशाफ्ट का सिर्फ 1 चक्कर (360 Degrees) पूरा होता है।
2. वाल्व ऑपरेटिंग मैकेनिज्म (Overhead Valve Drive)
जैसे ही कैमशाफ्ट घूमती है, उसका उभरा हुआ हिस्सा (Cam Lob) नीचे से वाल्व टैपेट (Tappet/Follower) को ऊपर उठाता है। टैपेट से जुड़ी पुश रॉड (Push Rod) ऊपर उठती है और सिलेंडर हेड पर लगे रॉकर आर्म (Rocker Arm) को एक तरफ से धक्का मारती है। रॉकर आर्म अपनी शाफ्ट पर घूमकर दूसरी तरफ से वाल्व स्टेम को नीचे दबा देता है, जिससे वाल्व प्रेशर से खुल जाता है। कैम लोब के हटते ही वाल्व स्प्रिंग वाल्व को वापस बंद कर देती है।
3. कमिन्स का स्पेशल 3-Cam डिजाइन (Cummins Exclusive)
सामान्य डीजल इंजनों में प्रति सिलेंडर केवल 2 कैम लोब होते हैं (एक इनलेट वाल्व के लिए, दूसरा एग्जॉस्ट वाल्व के लिए)। लेकिन कमिन्स (Cummins KTA-1150 / NTA-855) इंजन में प्रति सिलेंडर 3 कैम लोब्स होते हैं:
- पहला कैम लोब: इनलेट वाल्व को ऑपरेट करने के लिए।
- दूसरा कैम लोब: एग्जॉस्ट वाल्व को ऑपरेट करने के लिए।
- तीसरा (बीच वाला) कैम लोब: सीधे फ्यूल इंजेक्टर को मैकेनिकली दबाने (इंजेक्शन एक्चुएशन) के लिए।
कमिन्स के इस डिज़ाइन के कारण इसमें ईंधन की सप्लाई के लिए कैमशाफ्ट पर कोई अलग से एक्सेंट्रिक गियर (Eccentric) या अलग FIP पंप नहीं लगाना पड़ता। यह तीसरा कैम पुश-रॉड मैकेनिज्म के जरिए सीधे इंजेक्टर प्लंजर को दबाकर कम्बशन चैंबर के पास हाई प्रेशर जेनरेट कर देता है।
4. वाल्व का मटेरियल और सटीक फेस एंगल
- इनलेट वाल्व: यह ताजी और कम गर्म हवा के संपर्क में आता है, इसलिए इसे निकेल-क्रोमियम अलॉय स्टील (Nickel-Chromium Alloy Steel) से बनाया जाता है।
- एग्जॉस्ट वाल्व: यह धमाके के बाद निकलने वाली अत्यधिक गर्म गैसों (लगभग 700 से 800 डिग्री सेल्सियस) को झेलता है, इसलिए इसे उच्च ऊष्मा प्रतिरोधी सिलिकॉन-क्रोमियम अलॉय स्टील (Silicon-Chromium Alloy Steel / Silchrome) से बनाया जाता है।
- फेस एंगल: सिलेंडर हेड की वाल्व सीट पर सीलिंग बनाने के लिए वाल्व के हेड का कोणीय फेस एंगल 30 Degrees या 45 Degrees ग्राइंड करके बनाया जाता है।
एयर सप्लाई सिस्टम (Air Supply System) और सुपरचार्जिंग का विज्ञान
डीजल को पूरी तरह से जलाने के लिए सिलेंडर के भीतर भारी मात्रा में ऑक्सीजन की जरूरत होती है। वैज्ञानिक नियम के अनुसार, 1 लीटर हाई-स्पीड डीजल (HSD) को पूरी तरह जलाने के लिए इंजन को लगभग 12,500 से 14,000 लीटर साफ और ताजी हवा की आवश्यकता होती है। हवा का मात्र 22% से 23% ऑक्सीजन तत्व ही डीजल जलाने में काम आता है। अगर हवा कम मिलेगी, तो इंजन नुकसान झेलेगा।
1.एयर सप्लाई सर्किट का पूरा लेआउट (Air Mass Flow Layout)
इंजन के भीतर हवा के पहुँचने और बाहर निकलने का रास्ता इस प्रकार होता है I

- प्री-क्लीनर (Pre-Cleaner): यह मुख्य एयर क्लीनर के सबसे ऊपर फिट होता है। रेलवे ट्रैक के धूल-मिट्टी वाले माहौल में काम करते समय यह हवा के बड़े धूल कणों और मिट्टी को केन्द्रापसारक बल (Centrifugal Force) से घुमाकर पहले ही अलग कर देता है।
- एयर क्लीनर / फिल्टर (Air Cleaner): यह दो प्रकार का होता है:
- ऑयल बाथ टाइप (Oil Bath Type): यह भारी धूल झेलने वाला फिल्टर है जो Deutz और पुराने Kirloskar इंजनों में आता है। इसमें हवा नीचे तेल की सतह से टकराकर ऊपर वायर-मेश में जाती है, जिससे धूल तेल में चिपक जाती है।
- ड्राई पेपर टाइप (Dry Paper Element): यह Cummins और Greaves इंजनों में आता है। इसमें एक आउटर (Outer) और एक इनर (Inner) पेपर एलिमेंट होता है।
2. ड्राई एयर फिल्टर की कड़ी चेकिंग और बल्ब टेस्ट (Filter Maintenance)
ड्राई टाइप पेपर फिल्टर को साफ़ करने और उसकी लीकेज चेक करने के नियम ये हैं I
- सफाई का नियम: मेंटेनेंस के समय केवल बाहरी (Outer) एलिमेंट को साफ किया जाता है, अंदरूनी (Inner/Safety) एलिमेंट को कभी साफ नहीं किया जाता, उसे सीधे बदला जाता है।
- एयर प्रैशर की सीमा: फिल्टर को साफ करने के लिए अंदर से बाहर की तरफ (Inside to Outside) 3.5 bar से 4.5 bar के प्रैशर पर साफ हवा मारी जाती है। नोज़ल का व्यास 0.8 mm से कम नहीं होना चाहिए और नोज़ल फिल्टर पेपर से 1 इंच दूर रहना चाहिए।
- सख्त पाबंदी (Taboo): फिल्टर एलिमेंट को कभी भी किसी या रिजिड सतह (Rigid Surface) पर पटक कर या थपथपा कर (Tapping) साफ करना सख्त मना है। इससे पेपर के महीन छेद फट जाते हैं।
बल्ब टेस्ट (The 100W Bulb Test)
साफ किए गए फिल्टर में कोई बारीक क्रैक या छेद तो नहीं है, इसे चेक करने का रेलवे का आधिकारिक तरीका बल्ब टेस्ट है:
- फिल्टर एलिमेंट को एक पूरी तरह से अंधेरे कमरे (Dark Room) में ले जाएं।
- फिल्टर के खोखले छेद के भीतर 100 Watt का जलता हुआ बल्ब डालें।
- अब बाहर की सतह से ध्यान से देखें। यदि फिल्टर की कागज़ की दीवारों से रोशनी की कोई भी सीधी किरण (Light Rays) बाहर आती दिखाई दे, तो इसका मतलब फिल्टर डैमेज है। उसे तुरंत तरीके से रिजेक्ट कर दें, वरना वह धूल सिलेंडर के अंदर भेजकर लाइनर को घिस देगी।
3. टर्बोचार्जर और आफ्टरकूलर का थर्मल विज्ञान (Turbo & Aftercooler)
टर्बोचार्जर (Turbocharger)

यह इंजन की क्षमता बढ़ाने (Supercharging) का एक यंत्र है। यह सीधे इंजन से निकलने वाली बेकार एग्जॉस्ट गैसों के प्रेशर से चलता है।
- मैकेनिज्म: इसके एक शाफ्ट पर दो व्हील होते हैं—टर्बाइन व्हील (Turbine Wheel) जो एग्जॉस्ट मैनीफोल्ड से जुड़ा होता है, और इम्पेलर व्हील (Impeller Wheel) जो एयर क्लीनर से जुड़ा होता है। जली गैसें जब टर्बाइन को 1,25,000 से 1,40,000 RPM की भयानक स्पीड पर घुमाती हैं, तो इम्पेलर भी उतनी ही स्पीड से घूमकर बाहर की हवा को प्रेशर के साथ खींचकर सिलेंडर के भीतर ठूस देता है।
टर्बोचार्जर आइडलिंग का अनिवार्य सेफ्टी नियम (Idling Rule)
- नियम: इंजन को चालू (Start) करने के तुरंत बाद और इंजन को बंद (Shutdown) करने से ठीक पहले, इंजन को कम से कम 3 से 5 मिनट तक आइडल स्पीड (Idle Speed – लो आरपीएम) पर चलाना अनिवार्य है।
- वैज्ञानिक कारण: टर्बोचार्जर की बियरिंग्स को लुब्रिकेट करने के लिए मोबिल ऑयल सीधे इंजन के मुख्य ऑयल पंप से आता है। यदि आप हाई लोड पर चलते इंजन को अचानक बंद कर देंगे, तो मोबिल ऑयल का प्रेशर तुरंत जीरो हो जाएगा, लेकिन टर्बोचार्जर का व्हील अपने मोमेंटम के कारण 1 लाख आरपीएम से धीरे-धीरे रुकने में समय लेगा। तेल न मिलने के कारण सूखी बियरिंग अत्यधिक गर्मी से लाल होकर तरीके से जाम (Seize) हो जाएगी और इंटरनल ऑयल लीक शुरू हो जाएगा।
आफ्टरकूलर (Aftercooler) का महत्व

टर्बोचार्जर जब हवा को प्रेशर से दबाता है, तो कम्बशन नियमों के अनुसार हवा बहुत गर्म हो जाती है। गर्म हवा फैलती है, जिससे उसका घनत्व (Density) कम हो जाता है और सिलेंडर में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है।
- काम: आफ्टरकूलर टर्बोचार्जर से निकली गर्म हवा को इनलेट मैनीफोल्ड में जाने से पहले ठंडा करता है। हवा ठंडी होने से सिकुड़ती है, उसका घनत्व बढ़ता है और सिलेंडर के छोटे कमरे के भीतर भारी मात्रा में ऑक्सीजन तरीके से समा जाती है, जिससे high पावर मिलती है।
- प्रकार: यह दो तरह का होता है—Air-to-Air Type (जैसे Deutz BF 12L 513C में) और Air-to-Water Type (जैसे Cummins KTA 1150 L में)।
4. साइलेंसर बैक प्रैशर (Silencer Back Pressure) का असली वैज्ञानिक कारण
आम लोग सोचते हैं कि साइलेंसर (Muffler) केवल इंजन की आवाज कम करने या चिंगारी (Spark Arrestor) रोकने के लिए होता है। लेकिन रेलवे हेवी डीजल इंजनों में इसका एक बहुत वैज्ञानिक कारण है:
- वाल्व थर्मल शॉक से सुरक्षा: एग्जॉस्ट स्ट्रोक के अंत और सक्शन के शुरू में वाल्व ओवरलैप का समय आता है, जब दोनों वाल्व एक साथ खुले होते हैं। यदि साइलेंसर एग्जॉस्ट गैसों पर एक निश्चित रुकावट या बैक प्रैशर (Back Pressure) बनाकर न रखे, तो बाहर की ठंडी हवा इतनी भयानक मोमेंटम के साथ अंदर आएगी कि अत्यधिक गर्म एग्जॉस्ट वाल्व को अचानक ठंडा कर देगी। इस अचानक तापमान बदलने वाले थर्मल शॉक (Thermal Shock) के कारण मजबूत और लाल-गर्म एग्जॉस्ट वाल्व तुरंत मुड़ (Bent) जाएगा या टूट जाएगा। इसलिए साइलेंसर का बैक प्रैशर वाल्व की लाइफ के लिए अनिवार्य है।
5. एयर क्लीनर चोक होने के 5 तकनीकी नुकसान (Drawbacks of Choking)
यदि एयर फिल्टर समय पर साफ नहीं हुआ और चोक हो गया, तो कम्बशन चैंबर में हवा कम पड़ेगी, जिससे नीचे लिखे 5 नुकसान होंगे:
- अपूर्ण दहन (Incomplete Combustion): पर्याप्त ऑक्सीजन न मिलने के कारण कार्बन डाइऑक्साइड की जगह जानलेवा कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) गैस बनेगी और इंजन साइलेंसर से काला धुआं (Black Smoke) फेंकेगा।
- मोबिल ऑयल का पतला होना (Dilution of Lube Oil): अधजला डीजल पिस्टन के ऊपर जमा हो जाएगा और पिस्टन रिंग्स के किनारे से रिसकर नीचे ऑयल सम्प में गिर जाएगा, जिससे मोबिल ऑयल पतला हो जाएगा।
- पुर्जों का घिसाव (Wear and Tear): मोबिल ऑयल पतला होने से उसकी बियरिंग्स को बचाने वाली फिल्म टूट जाएगी, जिससे क्रैंकशाफ्ट और पिस्टन बियरिंग्स घर्षण से जल्दी घिस जाएंगी।
- इंजेक्टर होल्स का जाम होना (Choking of Injector Holes): अधजले डीजल की कालिख (Carbon) इंजेक्टर के बारीक स्प्रे होल्स पर जम जाएगी, जिससे डीजल का स्प्रे पैटर्न पूरी तरह खराब हो जाएगा।
- साइलेंसर चोक होना: अत्यधिक कार्बन पार्टिकल्स साइलेंसर के रिवर्स-फ्लो सेगमेंट्स के भीतर जमा होकर बैक प्रैशर को लिमिट से ज्यादा बढ़ा देंगे, जिससे इंजन अत्यधिक गर्म (Overheat) होने लगेगा।
फ्यूल सप्लाई सिस्टम (Fuel Supply System) और फील्ड प्राइमींग का विज्ञान
डीजल इंजन की ताकत पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि सिलेंडर के भीतर सही समय पर, सही दबाव के साथ डीजल की सटीक मात्रा पहुँचे। ट्रैक मशीनों में इस्तेमाल होने वाले हाई-स्पीड डीजल (HSD) की कुछ खास प्रॉपर्टीज होती हैं I
Boiling Range: 180 डिग्री सेल्सियस से 300 डिग्री सेल्सियस।
Specific Gravity: 0.82 से 0.92।
Calorific Value: 50 MJ/kg।
न्यूनतम सीटेन नंबर (Cetane No): 45 (सीटेन नंबर डीजल के स्वतः जलने की क्वालिटी और इग्निशन डिले को दर्शाता है
1. डीजल टैंक में तेल का लेवल कम रखने के 5 नुकसान
फील्ड पर काम करते समय ऑपरेटर अक्सर डीजल टैंक को पूरी तरह नहीं भरते, जिससे नीचे लिखे तकनीकी नुकसान होते हैं:
- स्लज या कीचड़ (Sludge) का बनना: जब डीजल टैंक का आधा हिस्सा खाली रहता है, तो उसमें मौजूद हवा की नमी रात को तापमान गिरने पर कंडेंस (भाप से पानी बनना) हो जाती है। यह पानी नीचे बैठ जाता है और डीजल के लुब्रिकेटिंग तत्वों के साथ मिलकर एक गाढ़ा, ग्रीसी कीचड़ बना देता है, जिसे स्लज कहते हैं। इसके कारण टैंक को बार-बार साफ करना पड़ता है।
- इंजन आउटपुट का गिरना: टैंक में कलेक्ट हुआ पानी जब फ्यूल लाइनों से होता हुआ सिलेंडर के अंदर पहुँचता है, तो उसे भाप बनाने के लिए इंजन की हीट एनर्जी बर्बाद होती है। इससे पिस्टन को मिलने वाला प्रैशर घट जाता है और इंजन की हॉर्सपावर गिर जाती है।
- पुर्जों का घिसाव (Wear and Tear): पानी के कण जब डीजल के साथ मिक्स होते हैं, तो डीजल की अपनी चिकनाई (Lubricating Quality) कम हो जाती है। इसके कारण हाई-प्रेशर फ्यूल पंप और इंजेक्टर के इंटरनल मूविंग पार्ट्स बहुत तेजी से घिसकर बर्बाद हो जाते हैं।
- एयर लॉक (Air Lock) की समस्या: डीजल का लेवल बहुत ज्यादा नीचे जाने पर फ्यूल फीड पंप तेल के साथ-साथ हवा भी खींच लेता है। फ्यूल सर्किट में हवा आते ही इंजन तुरंत बंद हो जाता है और जब तक पूरी हवा न निकाली जाए, इंजन स्टार्ट नहीं होता।
- मशीन का डाउन टाइम बढ़ना: टैंक के नीचे कीचड़ और गाद जमा होने के कारण फ्यूल फिल्टर बहुत जल्दी चोक हो जाते हैं, जिससे मशीन का कीमती वर्किंग टाइम ब्लॉक सेक्शन में बर्बाद होता है।
2. दोनों प्रणालियों का आंतरिक मैकेनिज्म (FIP vs Cummins PT)
1. माइको-बॉश सिस्टम (MICO-Bosch Circuit)
- सर्किट लेआउट: डीजल टैंक ──► फीड पंप ──► फ्यूल फिल्टर ──► FIP (फ्यूल इंजेक्शन पंप) ──► हाई-प्रेशर मेटल पाइप ──► इंजेक्टर ──► रिटर्न लाइन (वापस टैंक)।
- मैकेनिज्म: इस सिस्टम में प्रेशर बनाने का सारा काम FIP के अंदर मौजूद रेसिप्रोकेटिंग प्लंजर करता है। FIP ही डीजल को 180 bar के प्रेशर पर दबाकर सीधे इंजेक्टर की तरफ भेजता है। फ्यूल का यही हाई प्रेशर इंजेक्टर की नोजल सुई को ऊपर उठाता है और स्प्रे कम्बशन चैंबर में हो जाता है। FIP का गवर्नर ही तय करता है कि किस सिलेंडर को कितना तेल देना है।
2. कमिन्स पी.टी. सिस्टम (Cummins PT Pump & Manifold Circuit)
- सर्किट लेआउट: डीजल टैंक ──► वॉटर सेपरेटर ──► डीजल फिल्टर ──► PT Pump ──► शटडाउन वाल्व ──► कॉमन फ्यूल मैनीफोल्ड (पाइप) ──► सिलेंड्रिकल या फ्लैंज इंजेक्टर ──► रिटर्न लाइन।
- मैकेनिज्म: कमिन्स का PT (Pressure-Time) पंप क्रैंकशाफ्ट की स्पीड पर कैमशाफ्ट गियर द्वारा चलता है। यह पंप डीजल को भारी प्रेशर में नहीं बदलता, बल्कि केवल 200 से 300 PSI के लो-प्रेशर पर कॉमन फ्यूल मैनीफोल्ड (फ्यूल लाइन) में भेज देता है।
- कंट्रोल: इसमें गवर्नर रेगुलेटर कंट्रोल (PTR या PTG) प्रैशर (Pressure) को नियंत्रित करता है, और इंजन की आरपीएम (RPM) यह तय करती है कि इंजेक्टर कप के अंदर डीजल भरने के लिए कितना समय (Time) उपलब्ध है। इसी प्रैशर और टाइम के तालमेल से डीजल की मात्रा तय होती है।
- असली प्रैशर कहाँ बनता है?: जब तेल इंजेक्टर कप में भर जाता है, तब कैम मैकेनिज्म (रॉकर आर्म और पुश रॉड) द्वारा इंजेक्टर के प्लंजर को नीचे की तरफ पूरी ताकत से दबाया जाता है। यह मैकेनिकल ताकत इंजेक्टर कप के पास प्रेशर को सीधे 180 bar तक उठा देती है, जिससे डीजल पूरी तरह बारीक धुंध (Atomized) बनकर सिलेंडर में स्प्रे हो जाता है।

3. फील्ड पर एयर लॉक (Air Lock) निकालने की प्रैक्टिकल विधि
यदि ब्लॉक सेक्शन में काम करते समय इंजन हवा ले ले (Air Lock हो जाए), तो उसे तुरंत ठीक करने के लिए नीचे लिखे स्टेप्स फॉलो किए जाते हैं:
(A) माइको-बॉश (MICO-Bosch) इंजन में एयर ब्लीडिंग:
- फ्यूल फिल्टर के ऊपर या FIP की बॉडी पर लगे ब्लीडिंग स्क्रू (Bleeding Screw) को तरीके से एंटी-क्लॉकवाइज थोड़ा ढीला करें।
- फीड पंप के ऊपर लगे हैंड प्राइमर (Hand Primer) के नॉब को खोलकर उसे ऊपर-नीचे लगातार चलाएं (Pump करें)।
- ब्लीडिंग स्क्रू के रास्ते से जब तक झागदार डीजल (Air Bubbles) निकलना बंद न हो जाए और साफ, बिना बुलबुले वाला डीजल बाहर न आने लगे, तब तक हैंड प्राइमर चलाते रहें।
- जैसे ही साफ डीजल आने लगे, हैंड प्राइमर को दबाकर रखें और ब्लीडिंग स्क्रू को वापस तरीके से टाइट कर दें।
(B) कमिन्स पी.टी. (Cummins PT) इंजन में एयर ब्लीडिंग:
- कमिन्स इंजन में कोई हैंड प्राइमर नहीं होता। इसके लिए इलेक्ट्रिक शटडाउन वाल्व (Shutdown Valve) के ऊपर लगे ब्लीडिंग स्क्रू या मैनीफोल्ड इनलेट को थोड़ा ढीला किया जाता है।
- इसके बाद कम्बशन की शुरुआत के लिए इंजन के सेल्फ-स्टार्टर (Starter Motor) से क्रैंकिंग (सेल्फ मारना) की जाती है।
- क्रैंकिंग के दौरान लो-प्रेशर गियर पंप घूमता है और हवा को ढीले स्क्रू के रास्ते बाहर धकेलता है।
- जैसे ही हवा के बुलबुले खत्म हो जाएं, स्क्रू को टाइट कर दें। चेतावनी: कमिन्स इंजन में हवा निकालने के लिए सेल्फ को लगातार 30 सेकंड से ज्यादा न मारें, वरना स्टार्टर मोटर जल सकती है
लुब्रिकेशन सिस्टम (Lubrication System) और ऑयल सर्किट का विज्ञान
इंजन के भीतर मूविंग पार्ट्स (जैसे पिस्टन, बियरिंग्स, क्रैंकशाफ्ट) बहुत हाई स्पीड और तापमान पर काम करते हैं। यदि इनके बीच मोबिल ऑयल की परत (Lubrication Film) न हो, तो धातु आपस में रगड़ खाकर अत्यधिक गर्मी से पिघल जाएगी और इंजन तुरंत सीज (Seize) हो जाएगा।
1. मोबिल ऑयल के गुण और SAE 15W40 का असली मतलब
रेलवे ट्रैक मशीनों के भारी-भरकम इंजनों में SAE 15W40 ग्रेड के मोबिल ऑयल का उपयोग किया जाता है।
- मल्टीग्रेड ऑयल (Multigrade Oil): यह एक ऐसा तेल है जो बदलते मौसम और तापमान के हिसाब से अपना गाढ़ापन (Viscosity) तरीके से बनाए रखता है।
- 15W का मतलब: यहाँ ‘W’ का सीधा मतलब Winter (सर्दियों के लिए) है। यह दर्शाता है कि अत्यधिक ठंड (0°F) में भी यह तेल पानी की तरह पतला नहीं जमेगा, बल्कि इसकी विस्कोसिटी नियंत्रित (SAE 15 के बराबर) रहेगी ताकि सर्दियों में भी सुबह सेल्फ मारते ही इंजन तुरंत स्टार्ट हो जाए।
- 40 का मतलब: यह गर्मियों या हाई रनिंग टेम्परेचर (210°F) की रेटिंग है। यह दर्शाता है कि इंजन के अत्यधिक गर्म होने पर भी यह तेल पानी की तरह पतला होकर अपनी ताकत नहीं खोएगा, बल्कि गाढ़ा (SAE 40 के बराबर) बना रहेगा ताकि बियरिंग्स के बीच की ऑयल फिल्म न टूटे।
मोबिल ऑयल में मिलाए जाने वाले 7 एडिटिव्स (Additives):
कच्चे मोबिल ऑयल की ताकत बढ़ाने के लिए उसमें विशेष केमिकल मिलाए जाते हैं:
- विस्कोसिटी-इंडेक्स इम्प्रूवर: तापमान बदलने पर भी तेल के गाढ़ेपन को स्थिर रखना।
- डिटर्जेंट और डिस्पर्सेंट: कम्बशन से बनी कालिख और कार्बन को पुर्जों पर जमने से रोकना और उसे फिल्टर तक बहाकर ले जाना।
- एंटी-फोम (Anti-Foam): हाई स्पीड गियर्स के चलने से मोबिल ऑयल में झाग (Foam) बनने से रोकना।
- एंटी-रस्ट और कोरोजन इनहिबिटर: इंजन के अंदरूनी धातु के पुर्जों को जंग और एसिडिक केमिकल से बचाना।
- पोर पॉइंट डिप्रेसेन्ट: अत्यधिक ठंड में भी तेल के जमने के तापमान को नीचे गिराना ताकि तेल बहता रहे।
- ऑक्सीडेशन इनहिबिटर: हाई हीट के संपर्क में आने पर तेल को गाढ़ा होने या कीचड़ बनने से रोकना।
- Extreme Pressure (EP) एडिटिव्स: भारी दबाव में भी बियरिंग्स के बीच धातु को आपस में छूने से रोकना।
2. लुब्रिकेशन सर्किट का पूरा लेआउट (Oil Flow Circuit)
इंजन के भीतर मोबिल ऑयल के बहने का मजबूत और आधिकारिक रास्ता इस प्रकार होता है:

- ऑयल कूलर (Oil Cooler): यह सर्किट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कम्बशन की गर्मी से मोबिल ऑयल बहुत गर्म हो जाता है। ऑयल कूलर के भीतर इंजन का कूलिंग वाटर बहता है जो मोबिल ऑयल की अत्यधिक गर्मी को सोखकर उसे ठंडा बनाए रखता है।
- बायपास फिल्टर (Bypass Filter): फुल-फ्लो फिल्टर के अलावा इंजन में एक बायपास या सुपर ल्यूब फिल्टर होता है, जो बेहद महीन कार्बन कचरों को भी तरीके से छान देता है।
3. लो ऑयल प्रैशर (Low Lube Oil Pressure) के 6 मैकेनिकल कारण
ट्रैक मशीनों में ऑपरेटर के केबिन में लगे डैशबोर्ड पर ऑयल प्रैशर गेज हमेशा मॉनिटर किया जाता है। इंजन स्टार्ट होने पर आइडल स्पीड पर न्यूनतम प्रैशर 1.5 kg/cm² और फुल लोड स्पीड पर न्यूनतम 2.5 kg/cm² होना अनिवार्य है। यदि प्रैशर इससे नीचे गिरता है, तो इसके 6 कारण ये होते हैं:
- ऑयल सम्प में तेल की कमी: पैन के भीतर मोबिल ऑयल का लेवल लो होना या लीक होना।
- गलत या खराब ग्रेड का ऑयल: SAE 15W40 की जगह किसी बेहद पतले या लोकल तेल का इस्तेमाल करना, जो गर्म होते ही पानी बन जाए।
- फ्यूल डाइल्यूशन (Fuel Dilution): जैसा कि हमने पहले समझा था, इंजेक्टर लीक होने या एयर फिल्टर चोक होने से अधजला डीजल नीचे सम्प में गिरकर मोबिल ऑयल को तरीके से पतला कर देता है, जिससे प्रैशर तुरंत ड्रॉप हो जाता है।
- ऑयल प्रैशर रेगुलेटर वाल्व का जाम होना: यदि प्रैशर रेगुलेटर वाल्व का स्प्रिंग टूट जाए या वह ओपन पोजीशन में जाम हो जाए, तो सारा तेल बियरिंग्स में जाने के बजाय सीधे बायपास होकर वापस सम्प में गिर जाएगा।
- मेन और कनेक्टिंग रॉड बियरिंग्स का अत्यधिक घिसना: यदि बियरिंग्स घर्षण से घिसकर ढीली हो चुकी हैं, तो उनके बीच का क्लीयरेंस (Gap) बढ़ जाएगा और तेल बिना रेजिस्टेंस के बह जाएगा, जिससे मेन गैलरी में प्रैशर नहीं बनेगा।
- ऑयल पंप का घिसना या स्ट्रेनर चोक होना: ऑयल पंप के इंटरनल गियर्स घिस जाने से वह पूरा प्रैशर नहीं बना पाता, या नीचे लगा सक्शन स्ट्रेनर कचरे से चोक हो जाता है।
कूलिंग सिस्टम (Cooling System) और ओवरहीटिंग का विज्ञान
कम्बशन के समय इंजन सिलेंडर के अंदर का तापमान 1500°C से 2000°C तक पहुँच जाता है। यदि इस अत्यधिक गर्मी को तरीके से बाहर न निकाला जाए, तो पिस्टन पिघल जाएगा, वाल्व मुड़ जाएंगे और पूरा इंजन ब्लॉक थर्मल स्ट्रेस से फट जाएगा। कूलिंग सिस्टम का काम इंजन को न तो बहुत ठंडा रखना है और न बहुत गर्म, बल्कि उसे उसके ऑपरेटिंग टेम्परेचर (74°C से 85°C) पर बनाए रखना है।
1 इंजन कूलिंग के दो मुख्य प्रकार (Cooling Classifications)
भारतीय रेलवे की फ्लीट में कूलिंग के लिए दो सिद्धांतों का उपयोग किया जाता है:
1. एयर-कूल्ड प्रणाली (Air-Cooled Mechanism – Deutz Special)
यह तकनीक Deutz BF 12L 513C इंजन में देखने को मिलती है।
- मैकेनिज्म: इसमें कोई रेडिएटर, वाटर पंप या कूलेंट नहीं होता। सिलेंडर लाइनर और हेड के बाहरी हिस्से पर धातु के फिन्स (Fins) और फ्लैंगेस बने होते हैं, जो हीट ट्रांसफर एरिया को बढ़ा देते हैं।
- काउलिंग और ब्लोअर (Cowling & Blower): इंजन के आगे एक भारी हाइड्रोलिक-ड्रिवन एयर ब्लोअर (Air Blower) लगा होता है। यह ब्लोअर बाहर की ठंडी हवा को एक बंद धातु के कफन यानी काउलिंग (Cowling) के रास्ते सीधे सभी सिलेंडरों के फिन्स पर पूरी ताकत से फेंकता है। इसके डिज़ाइन नियमों के अनुसार, प्रति हॉर्सपावर (HP) लगभग 1,400 से 2,400 वर्ग सेंटीमीटर का कूलिंग फिन एरिया होना अनिवार्य है।
2. वाटर-कूल्ड बंद प्रणाली (Water-Cooled Closed Circuit)
यह तकनीक Cummins और MWM (Greaves) इंजनों में इस्तेमाल होती है।
- मैकेनिज्म: इसमें सिलेंडर के चारों तरफ खोखले वाटर जैकेट्स बने होते हैं। एक सेंट्रीफ्यूगल वाटर पंप पानी को इंजन के भीतर प्रेशराइज्ड सर्कुलेट कराता है। यह पानी सिलेंडर की गर्मी सोखकर सीधे आगे लगे भारी रेडिएटर में जाता है, जहाँ एक हाइड्रोलिक फैन (न्यूनतम 1600 से 1650 RPM) हवा के झोंके से पानी को वापस ठंडा कर देता है।
2. रेडिएटर केमिकल्स और नालकोल-2000 का नियम (Anti-Corrosion Practice)
वाटर-कूल्ड इंजनों में कभी भी सादा पानी नहीं डाला जाता। सादे पानी से सिलेंडर की दीवारों पर स्केल (स्केल/ नमक) जम जाता है, जो हीट ट्रांसफर को तरीके से ब्लॉक कर देता है।
- कमिन्स इंजन का नियम: इसमें सफेद गैलन वाला प्री-मिक्स कूलेंट या DCA (Diesel Coolant Additive) केमिकल का इस्तेमाल 15 लीटर पानी में 1 लीटर के अनुपात में किया जाता है। पानी का pH मान हमेशा 8 से 10 के बीच होना अनिवार्य है, जो बिल्कुल न्यूट्रल और हल्का क्षारीय हो।
- MWM / ग्रीव्स इंजन का सख्त नियम: इस इंजन में केवल नालकोल-2000 (Nalcool-2000) जंग-रोधी केमिकल का इस्तेमाल 30 लीटर पानी में 1 लीटर के अनुपात में किया जाता है।
- सख्त पाबंदी (Strict Taboo): मेंटेनेंस के समय नालकोल-2001 (Nalcool-2001) का प्रयोग करना वर्जित है। नालकोल-2001 एक बेहद मजबूत एसिडिक डी-स्केलिंग एजेंट है, जो सिर्फ इंजन ब्लॉक की इंटरनल सफाई के लिए फ्लशिंग के काम आता है। यदि इसे परमानेंट कूलेंट की तरह छोड़ दिया गया, तो यह वाटर जैकेट्स और बियरिंग्स को तरीके से गलाकर इंजन को अंदर से कबाड़ कर देगा।
3. थर्मोस्टेट वाल्व (Thermostat Valve) का थर्मल ऑपरेशन
इंजन को सुबह स्टार्ट करते ही तुरंत उसके वर्किंग टेम्परेचर पर पहुँचाने का काम थर्मोस्टेट वाल्व करता है, जो वॉटर आउटलेट मैनीफोल्ड के पास फिट होता है।
- वर्किंग साइकिल: जब इंजन का पानी 74°C से कम गर्म होता है, तो थर्मोस्टेट वाल्व पूरी तरह बंद रहता है। यह पानी को आगे रेडिएटर में जाने से तरीके से रोक देता है, जिससे पानी सीधे बाईपास लाइन से वापस इंजन ब्लॉक के भीतर ही घूमता रहता है और इंजन जल्दी गर्म हो जाता है।
- फुल ओपन पोजीशन: जैसे ही पानी का तापमान 74°C पहुँचता है, वाल्व का वैक्स कोर फैलना शुरू होता है और वाल्व खुल जाता है। 85°C पर थर्मोस्टेट वाल्व पूरी तरह (Fully Open) खुल जाता है और बाईपास लाइन को तरीके से ब्लॉक करके पूरे पानी के फ्लो को रेडिएटर की तरफ मोड़ देता है ताकि पानी ठंडा हो सके।
7.4 इंजन ओवरहीटिंग (Engine Overheating) के 6 मैकेनिकल कारण
यदि केबिन के डैशबोर्ड पर लगा वाटर टेम्परेचर गेज 95°C से ऊपर भागने लगे, तो इसका मतलब इंजन तरीके से ओवरहीट हो रहा है। इसके 6 मुख्य कारण ये होते हैं:
- कूलेंट या पानी की कमी: रेडिएटर या होज़ पाइप्स (Hose Pipes) से पानी का लीकेज होना।
- थर्मोस्टेट वाल्व का जाम होना: यदि थर्मोस्टेट वाल्व बंद (Closed) पोजीशन में ही तरीके से जाम हो जाए, तो पानी कितना भी गर्म हो जाए, वह रेडिएटर तक पहुँच ही नहीं पाएगा और इंजन तुरंत ओवरहीट हो जाएगा।
- रेडिएटर मेश का बाहर से चोक होना: रेलवे ट्रैक पर काम करते समय धूल और सूखी घास उड़कर रेडिएटर की जाली (Mesh) में फंस जाती है, जिससे हवा का पास होना तरीके से ब्लॉक हो जाता है।
- वाटर जैकेट्स में स्केलिंग होना: गलत केमिकल या सादा पानी डालने से सिलेंडरों के चारों तरफ नमक की कड़क परत जम जाना, जिससे हीट पानी तक ट्रांसफर नहीं हो पाती।
- कूलिंग फैन बेल्ट का ढीला होना या हाइड्रोलिक मोटर फेलियर: रेडिएटर फैन को घुमाने वाली V-बेल्ट का ढीला होना (बेल्ट का सेंटर डिफ्लेक्शन 15 mm से कम होना चाहिए) या फैन को चलाने वाली हाइड्रोलिक मोटर का आरपीएम 1600 से नीचे गिर जाना।
- Deutz इंजन में ब्लोअर का जाम होना या फिन्स पर कीचड़ जमना: एयर-कूल्ड इंजनों में यदि सिलेंडरों के फिन्स पर मोबिल ऑयल और धूल का कीचड़ जम जाए, या एयर ब्लोअर का हाइड्रोलिक कपलिंग मैकेनिज्म फेल हो जाए।
RDSO मेंटेनेंस शेड्यूल्स और सटीक टैपेट क्लीयरेंस (Tappet Clearance) का विज्ञान
रेलवे ट्रैक मशीनों के भारी इंजनों को धूल-मिट्टी और मौसम में लगातार काम करना पड़ता है। इसलिए इनके मेंटेनेंस के लिए RDSO ने टाइम-बेस्ड (Time-based) शेड्यूल्स तय किए हैं। इनका पालन न करने पर इंजन बीच ब्लॉक सेक्शन में फेल हो सकता है, जिससे रेलवे यातायात ठप होने का खतरा रहता है।
1 RDSO के आधिकारिक इंजन मेंटेनेंस शेड्यूल्स (Maintenance Checklist)
ट्रैक मशीन इंजनों (जैसे Cummins, Deutz, MWM) के रख-रखाव के लिए मुख्यतः नीचे लिखे 7 शेड्यूल्स लागू होते हैं:
- Schedule I (डेली चेक / Daily): यह काम हर रोज मशीन चलाने से पहले ऑपरेटर द्वारा किया जाता है। इसमें मोबिल ऑयल लेवल, कूलेंट वाटर लेवल, वाटर लीकेज की जांच, एयर क्लीनर के वैक्यूम इंडिकेटर (Vacuum Indicator) का लाल निशान चेक करना, वॉटर सेपरेटर से पानी ड्रेन करना और इंजन चालू होने पर ऑयल प्रैशर गेज की मॉनिटरिंग शामिल है।
- Schedule II (50 घंटे / 50 Hours): इसके अंतर्गत इंजन की V-बेल्ट का टेंशन (Deflection < 15 mm) चेक करना, बैटरी के इलेक्ट्रोलाइट का लेवल और उसकी स्पेसिफिक ग्रेविटी (न्यूनतम 1.24) नापना, और ड्राई एयर क्लीनर के आउटर फिल्टर की हवा से सफाई शामिल है।
- Schedule III (100 घंटे / 100 Hours): इंजन के सुरक्षा उपकरणों यानी सेफ्टी डिवाइसेज (Safety Devices) जैसे- High Water Temperature और Low Lube Oil Pressure की ट्रिपिंग टेस्टिंग करना। इसके अलावा थ्रॉटल लिंकेज और इंजन माउंटिंग बोल्ट्स की सटीक से जांच करना।
- Schedule IV (250/500 घंटे / 250 or 500 Hours): यह सबसे क्रिटिकल रनिंग शेड्यूल है। इसके तहत इंजन का पुराना मोबिल ऑयल पूरी तरह बदला जाता है, ल्यूब ऑयल फिल्टर्स, फ्यूल फिल्टर्स और सुपर ल्यूब बाय-पास फिल्टर्स को तरीके से नया डाला जाता है, और क्रैंककेस ब्रीदर (Breather) की सफाई की जाती है। (नोट: ड्राई टाइप एयर क्लीनर के दोनों एलिमेंट्स (आउटर व इनर) को हर 500 घंटे पर अनिवार्य रूप से बदल दिया जाता है)।
- Schedule V (1000/3000 घंटे / 1000 or 3000 Hours): इसके तहत रेडिएटर के सभी वाटर होज़ (Hose Pipes) बदले जाते हैं, सेल्फ़-स्टार्टर मोटर और अल्टरनेटर की ओवरहालिंग की जाती है, और सभी फ्यूल इंजेक्टर्स व FIP (फ्यूल इंजेक्शन पंप) को बाहर निकालकर बेंच पर टेस्ट और कैलिब्रेट किया जाता है।
- Schedule VI – IOH (Intermediate Overhauling – 2000 या 4000 घंटे): जरूरत पड़ने पर इंजन का टॉप ओवरहॉल (Top Overhaul) किया जाता है, जिसमें सिलेंडर हेड की डी-कार्बोनाइजेशन (कालिख सफाई), वाल्वों की लैपिंग/ग्राइंडिंग और एयर कंप्रेसर की ओवरहालिंग शामिल है।
- Schedule VII – POH (Periodic Overhauling – 6000 घंटे): यह इंजन का अंतिम पुनर्जन्म है। इंजन को मशीन चेसिस से पूरी तरह तरीके से बाहर निकाला जाता है। क्रैंकशाफ्ट का डायनेमिक बैलेंस, डैम्पर की चेकिंग, क्रैंक जर्नल का साइज, सिलेंडर लाइनर्स और पिस्टन्स को तरीके से रिप्लेस या री-बोर (Re-bore) करके इंजन को 100% नया जैसा बनाया जाता है।
2. चारों प्रमुख इंजनों का टैपेट क्लीयरेंस (Valve Clearance) चार्ट
जब इंजन गर्म होता है, तो थर्मल एक्सपेंशन के कारण वाल्व की धातु की लंबाई थोड़ी बढ़ जाती है। यदि रॉकर आर्म और वाल्व स्टेम के बीच थोड़ा खाली गैप (क्लीयरेंस) न रखा जाए, तो वाल्व पूरी तरह अपनी सीट पर तरीके से बंद नहीं होगा, जिससे कंप्रेस हवा लीक होगी और भारी पावर लॉस (Power Loss) होगा। इसे सेट करने के लिए नीचे लिखे आधिकारिक डेटा का ही उपयोग किया जाता है:
| इंजन का नाम (Engine Model) | इनलेट वाल्व क्लीयरेंस (Inlet Clearance) | एग्जॉस्ट वाल्व क्लीयरेंस (Exhaust Clearance) |
|---|---|---|
| Cummins (NTA-855 / KTA-1150) | 0.014 Inches (0.36 mm) | 0.027 Inches (0.69 mm) |
| MWM / ग्रीव्स (TBD 232 / 234 V12) | 0.20 mm | 0.20 mm |
| Deutz (BF 12L 513C Air-Cooled) | 0.20 mm | 0.30 mm |
| Kirloskar (HA / RB Series) | 0.15 mm | 0.15 mm |
- नियम: एग्जॉस्ट वाल्व अत्यधिक गर्म गैसों के संपर्क में आता है, इसलिए थर्मल एक्सपेंशन ज्यादा होने के कारण इसका क्लीयरेंस हमेशा इनलेट वाल्व से अधिक रखा जाता है।
3. फील्ड पर टीडीसी (TDC) और वाल्व क्लीयरेंस सेट करने की विधि
फील्ड पर जब मेंटेनेंस स्टाफ टैपेट सेटिंग (Tappet Setting) करता है, तो वाल्व सेट करने के लिए उस सिलेंडर का कंप्रेशन स्ट्रोक का टीडीसी (TDC) लाना अनिवार्य होता है, जहाँ दोनों वाल्व पूरी तरह बंद और ढीले होते हैं। इसे सेट करने के दोतरीके हैं:
(A) MICO-Bosch (FIP) वाले इंजनों की विधि (MWM V-12 Special):
- फ्लाईव्हील साइड से इंजन को तरीके से एंटी-क्लॉकवाइज धीरे-धीरे घुमाएं।
- जैसे ही सिलेंडर नंबर A1 का इनलेट वाल्व दबकर वापस पूरा बंद हो, फ्लाईव्हील पर मार्क देखें।
- क्रैंक को और 180 Degrees आगे घुमाएं, जिससे सिलेंडर A1 अपनेकंप्रेशन टीडीसी पर आ जाएगा। यहाँ रॉकर लीवर को हाथ से हिलाकर देखें, दोनों वाल्वों में गैप मिलेगा। फीलर गेज (Feeler Gauge) की पत्ती डालकर एडजस्टिंग स्क्रू से गैप सेट कर दें।
- अगले सिलेंडरों के लिए क्रैंक को फायरिंग ऑर्डर के हिसाब से 120 Degrees (यानी 1/3 चक्कर) घुमाते जाएं और सेट करते जाएं।
(B) कमिन्स (Cummins 3-Cam) इंजनों की अनोखी विधि:
- कमिन्स इंजन में प्रति सिलेंडर 3 रॉकर आर्म होते हैं (इनलेट, एग्जॉस्ट और बीच वाला इंजेक्टर के लिए)।
- प्रैक्टिकल नियम: कंप्रेशन स्ट्रोक खत्म होने से ठीक पहले जब सिलेंडर फ्यूल लेने के लिए तैयार होता है, तब बीच वाला इंजेक्टर रॉकर आर्म पहले तरीके से ऊपर उठता है और फिर नीचे बैठता है। इस मूवमेंट के ठीक दौरान इनलेट और एग्जॉस्ट दोनों वाल्व पूरी तरह बंद होते हैं। इसी पोजीशन पर फीलर गेज डालकर इनलेट को 0.014 इंच और एग्जॉस्ट को 0.027 इंच पर मजबूत लॉक कर दिया जाता है।
Advanced Troubleshooting और आपातकालीन सेक्शन क्लीयरिंग प्रोटोकॉल
ब्लॉक सेक्शन में काम करते समय यदि भारी इंजन में कोई खराबी आ जाए, तो ऑपरेटर और तकनीशियनों को तुरंत मैकेनिकल और डायग्नोस्टिक नियमों के तहत फॉल्ट को पकड़ना होता है।
1. फ्यूल इंजेक्टर टेस्टिंग मशीन के 3 टेस्ट (Injector Diagnostics)

फ्यूल इंजेक्टर की सेहत जांचने के लिए उसे इंजन से बाहर निकालकर इंजेक्टर टेस्टिंग बेंच मशीन पर नीचे लिखे 3 टेस्ट से गुजरना पड़ता
- प्रैशर टेस्ट (Pressure Test): इस टेस्ट में देखा जाता है कि इंजेक्टर का नोजल किस सटीक दबाव पर डीजल स्प्रे करना शुरू करता है। यदि यह 180 bar से कम पर खुल रहा है, तो इंजेक्टर के ऊपर लगे एडजस्टिंग स्क्रू (Adjusting Screw) या शिमीज़ को सेट करके नोजल स्प्रिंग के टेंशन को टाइट किया जाता है।
- लीक-ऑफ टेस्ट (Leak-off Test): इंजेक्टर की अंदरूनी सुई और उसकी सीट की सीलिंग चेक करने के लिए मशीन का हैंडल चलाकर 150 Kg/cm² का दबाव बनाया जाता है। इस प्रेशर को पूरे 10 सेकंड तक होल्ड (रोककर) रखा जाता है। यदि 10 सेकंड के भीतर प्रेशर डायल गेज पर गिरता है, तो इसका मतलब नोजल सीट लीक है, जिसे लैपिंग/ग्राइंडिंग कंपाउंड से ठीक किया जाता है।
- स्प्रे टेस्ट (Spray Test): इसमें देखा जाता है कि इंजेक्टर से निकलने वाला डीजल पानी की धार या बड़ी बूंदों (Droplets) के रूप में तो नहीं गिर रहा। डीजल पूरी तरह ऑटोमाइज्ड (Atomized – बारीक कोहरे या धुंध) के रूप में स्प्रे होना चाहिए। यदि नोजल से ड्रिपिंग (बूंद टपकना) हो रही है, तो वह सिलेंडर में काला धुआं पैदा करेगी।
2. ट्रबलशूटिंग मैट्रिक्स: लक्षण, कारण और मैकेनिकल उपाय
क्षेत्र में काम आने वाली RDSO की आधिकारिक डायग्नोस्टिक गाइड इस प्रकार है:
1: इंजन क्रैंकिंग (सेल्फ) ले रहा है पर स्टार्ट नहीं हो रहा
- संभावित कारण:
- फ्यूल सिस्टम में एयर लॉक (Air Lock) होना।
- इलेक्ट्रिक शटडाउन वाल्व (Solenoid Valve) का जाम होना या तार टूटा होना।
- इमरजेंसी स्टॉप स्विच का दबा होना।
- डीजल फिल्टर का पूरी तरह कचरे से चोक होना।
- मैकेनिकल उपाय: ब्लीडिंग स्क्रू खोलकर पूरी हवा निकालें, शटडाउन वाल्व के मैन्युअल ओवरराइड स्क्रू को टाइट करें, और चोक हो चुके फ्यूल फिल्टर को नया बदलें।
2: इंजन चालू है पर साइलेंसर से घना काला धुआं (Black Smoke) फेंक रहा है
- संभावित कारण:
- एयर क्लीनर/फिल्टर का तरीके से चोक होना (हवा की भारी कमी)।
- इंजेक्टर नोजल का जाम होना या ड्रिपिंग (Dripping) होना।
- गलत वाल्व टाइमिंग या टैपेट क्लीयरेंस का बहुत कम होना।
- टर्बोचार्जर का आरपीएम बुरी तरह गिर जाना।
- मैकेनिकल उपाय: बल्ब टेस्ट करके एयर फिल्टर बदलें, इंजेक्टरों को बेंच पर टेस्ट करके नोजल बदलें, और फीलर गेज डालकर टैपेट क्लीयरेंस दोबारा सेट करें।
3: इंजन साइलेंसर से सफेद या नीला धुआं (White / Blue Smoke) दे रहा है
- संभावित कारण:
- नीला धुआं: पिस्टन की कंप्रेशन और ऑयल रिंग्स का घिस जाना, जिससे मोबिल ऑयल कम्बशन चैंबर में आकर डीजल के साथ जल रहा है।
- सफेद धुआं: डीजल में पानी के कणों की मिलावट होना या सिलेंडर हेड गास्केट का फटना, जिससे कूलिंग वाटर सिलेंडर के अंदर रिस रहा है।
- मैकेनिकल उपाय: पिस्टन रिंग्स और लाइनर बदलें (POH स्तर), वॉटर सेपरेटर को ड्रेन करें, और फटी हुई हेड गास्केट को नया डालें।
3. ब्लॉक सेक्शन में इंजन फेल होने पर सेक्शन क्लीयरिंग के आपातकालीन नियम
रेलवे ट्रैक पर सबसे भयानक स्थिति तब होती है जब काम के दौरान बीच ब्लॉक सेक्शन में Track Machine IC Engine पूरी तरह फेल हो जाए। ऐसी आपातकालीन स्थिति में सेक्शन को तरीके से तुरंत खाली करने (Clear) के लिए नीचे लिखे नियमों का पालन किया जाता है:
(A) इंजन 1 (Engine 1) फेल होने पर प्रोटोकॉल:
- यदि मशीन का मुख्य वर्किंग इंजन (Engine 1) फेल हो जाता है, तो आधुनिक मॉडिफाइड सिस्टम ऑपरेटर को बिना किसी मैन्युअल लाइन डिस्कनेक्शन के तेजी से काम समेटने (Winding Up) की अनुमति देता है।
- मशीन के वर्किंग असेंबली (जैसे कटर चेन, टैंपिंग यूनिट) को बाहरी हाइड्रोलिक प्रेशर इनपुट देकर तुरंत ऊपर उठाकर तरीके से लॉक कर दिया जाता है।
- इसके बाद, मशीन केवल इंजन 2 (Engine 2) को चालू करके, केवल एक्सेल 3 और एक्सेल 4 (Axles 3 & 4) की ड्राइविंग पावर का उपयोग करके सेक्शन से बाहर भागती है। इस दौरान एक्सेल 1 और एक्सेल 2 के इलेक्ट्रिकल सिस्टम ऑटोमैटिक तरीके से डिस्कनेक्ट हो जाते हैं।
(B) इंजन 2 (Engine 2) फेल होने पर प्रोटोकॉल:
- यदि इंजन 2 फेल होता है, तो पूरा वाइंडिंग-अप ऑपरेशन्स सामान्य रूप से काम करता है क्योंकि सारा कंट्रोल इंजन 1 के पास आ जाता है।
- मशीन एक्सेल 1 और एक्सेल 2 (Axles 1 & 2) की पावर का उपयोग करके सुरक्षित सेक्शन को क्लियर करती है, जबकि एक्सेल 3 और 4 ऑटोमैटिक आइसोलेट हो जाते हैं।
(C) दोनों इंजन फेल होने पर महा-आपातकालीन नियम (Dual Engine Failure Backup):
यह स्थिति सबसे खतरनाक है। यदि इंजन 1 और इंजन 2 दोनों पूरी तरह डेड हो जाएं, तो सेक्शन क्लियर करने का आधिकारिक तरीका यह है:
- पीछे खड़ी या पास की सपोर्टिंग टैंपिंग मशीन (Assisting Machine) को तुरंत मदद के लिए पास बुलाया जाता है।
- मददगार मशीन से 30 मीटर लंबी, SAE 100R2 साइज और 5/8 इंच मोटी हाई-प्रैशर हाइड्रोलिक पाइप लाइन को मृत पड़ी मशीन के इमरजेंसी इनलेट मैनीफोल्ड से तरीके से पैच (जोड़ा) किया जाता है।
- सपोर्टिंग मशीन के हाइड्रोलिक प्रेशर की मदद से मृत मशीन की भारी असेंबली (जैसे BCM की विशाल चेन ट्रफ या टैंपिंग यूनिट) को ऊपर उठाकर तरीके से मैकेनिकल लॉक कर दिया जाता है।
- विशेष नोट: जिन मशीनों का सीरियल नंबर 285 से 291 के दायरे से बाहर है, उनमें एक मैन्युअल हैंड-ऑपरेटेड हाइड्रोलिक पंप (Hand Pump) दिया होता है, जिसे हाथ से लगातार चलाकर प्रेशर से असेंबली को ऊपर लॉक किया जाता है। इसके बाद सहयोगी मशीन से टो (Tow) करके सेक्शन को तुरंत नियमों के तहत खाली कराया जाता है।
कुछ जरूरी सवाल जो फील्ड पर काम करने वाले हर भाई को पता होने चाहिए
Q1. कमिन्स (Cummins) इंजन में प्रति सिलेंडर 3 कैम लोब क्यों दिए जाते हैं?
उत्तर: सामान्य इंजनों में केवल 2 कैम लोब (Inlet और Exhaust) होते हैं। लेकिन कमिन्स इंजनों में तीसरा कैम लोब सीधे फ्यूल इंजेक्टर को मैकेनिकली दबाने (इंजेक्शन एक्चुएशन) के लिए होता है। इसे यूनिट इंजेक्टर मैकेनिज्म कहते हैं, जो कम्बशन चैंबर के पास डीजल के प्रेशर को सीधे 180 bar तक उठा देता है। इसी कारण कमिन्स इंजन में अलग से भारी हाई-प्रेशर फ्यूल पंप (FIP) की जरूरत नहीं पड़ती।
Q2. इंजन बंद करने से पहले और चालू करने के बाद 3-5 मिनट आइडल स्पीड पर चलाना क्यों अनिवार्य है?
उत्तर: टर्बोचार्जर की बियरिंग्स को ठंडा रखने और लुब्रिकेट करने के लिए मोबिल ऑयल सीधे इंजन के मुख्य ऑयल पंप से आता है। हाई लोड पर चलते इंजन को अचानक बंद करने से मोबिल ऑयल का प्रैशर तुरंत जीरो हो जाता है, लेकिन टर्बोचार्जर का व्हील अपने मोमेंटम के कारण 1,25,000 RPM से धीरे-धीरे रुकता है। तेल न मिलने के कारण सूखी बियरिंग अत्यधिक गर्मी से तरीके से जाम (Seize) हो जाती है। इसलिए टर्बोचार्जर की सुरक्षा के लिए आइडलिंग नियम अनिवार्य है।
Q3. मोबिल ऑयल में ‘फ्यूल डाइल्यूशन’ (Fuel Dilution) क्या है और इसके क्या नुकसान हैं?
उत्तर: जब एयर फिल्टर चोक होने या इंजेक्टर लीक होने के कारण सिलेंडर में डीजल पूरी तरह नहीं जल पाता, तो वह कच्चा डीजल पिस्टन रिंग्स के किनारे से रिसकर नीचे ऑयल सम्प (Oil Sump) में गिर जाता है और मोबिल ऑयल में मिक्स हो जाता है। इसी को फ्यूल डाइल्यूशन कहते हैं। इसके कारण मोबिल ऑयल पतला हो जाता है, उसकी लुब्रिकेशन फिल्म टूट जाती है और इंजन के मुख्य पार्ट्स (क्रैंकशाफ्ट, बियरिंग्स) घर्षण से जल्दी घिस जाते हैं।
Q4. वाटर-कूल्ड इंजनों में ‘नालकोल-2001’ (Nalcool-2001) का प्रयोग रनिंग कूलेंट की तरह करना क्यों सख्त मना है?
उत्तर:नालकोल-2001 एक बेहद मजबूत एसिडिक डी-स्केलिंग एजेंट (Flushing Chemical) है। इसका उपयोग केवल मेंटेनेंस के समय वाटर जैकेट्स के भीतर जमे नमक और स्केल को साफ करने के लिए किया जाता है। यदि इसे रनिंग कूलेंट की तरह रेडिएटर में छोड़ दिया गया, तो यह अपनी एसिडिक प्रॉपर्टी के कारण इंजन ब्लॉक की धातु और वाटर होज़ पाइप्स को तरीके से गलाकर पूरे कूलिंग सर्किट को अंदर से कबाड़ कर देगा। रनिंग के लिए केवल नालकोल-2000 का ही उपयोग करना चाहिए।
Q5. साइलेंसर बैक प्रैशर (Silencer Back Pressure) इंजन के वाल्वों की सुरक्षा कैसे करता है?
उत्तर: सक्शन के शुरू और एग्जॉस्ट के अंत में वाल्व ओवरलैप का समय आता है, जब इनलेट और एग्जॉस्ट दोनों वाल्व एक साथ खुले होते हैं। यदि साइलेंसर गैसों पर एक निश्चित रुकावट या बैक प्रैशर बनाकर न रखे, तो बाहर की ठंडी हवा भयानक मोमेंटम के साथ अंदर आएगी और अत्यधिक गर्म (लाल-गर्म) एग्जॉस्ट वाल्व को अचानक ठंडा कर देगी। इस अचानक थर्मल शॉक (Thermal Shock) के कारण एग्जॉस्ट वाल्व तुरंत मुड़ (Bent) जाएगा या टूट जाएगा।
Q6. ब्लॉक सेक्शन में काम करते समय यदि मशीन के दोनों इंजन पूरी तरह डेड हो जाएं, तो असेंबली को कैसे उठाया जाता है?
उत्तर: ऐसी आपातकालीन स्थिति में पास की सपोर्टिंग टैंपिंग मशीन को बुलाया जाता है। मददगार मशीन से 30 मीटर लंबी, SAE 100R2 साइज और 5/8 इंच मोटी हाई-प्रैशर हाइड्रोलिक पाइप लाइन को डेड पड़ी मशीन के इमरजेंसी इनलेट मैनीफोल्ड से Tight तरीके से जोड़ा जाता है। सहयोगी मशीन के हाइड्रोलिक प्रेशर की मदद से डेड मशीन की भारी असेंबली (जैसे BCM की कटर चेन या टैंपिंग यूनिट) को ऊपर उठाकर tight तरीके से मैकेनिकल लॉक कर दिया जाता है। जिन मशीनों में यह सिस्टम नहीं है, उनमें दिए गए मैन्युअल हैंड-ऑपरेटेड हाइड्रोलिक पंप को हाथ से लगातार चलाकर असेंबली लॉक की जाती है।
आखिरी बात
रेलवे ट्रैक मशीनों का यह भारी-भरकम IC Engine सिर्फ एक मशीन का पुर्जा नहीं है, बल्कि पूरी भारतीय रेलवे की फ्लीट की असली धड़कन है। चाहे गर्मियों में लगातार चलने वाला Deutz का एयर-कूल्ड ढांचा हो, या फिर Cummins का जादुई 3-Cam मैकेनिज्म; इन भारी इंजनों की लंबी उम्र सिर्फ और सिर्फ समय-आधारित RDSO मेंटेनेंस शेड्यूल्स और फील्ड पर सही ऑपरेशन्स पर टिकी होती है।
एक जरूरी बात जो जानना बेहद जरूरी है
इस ब्लॉग पोस्ट में दी गई सभी तकनीकी विशिष्टताओं (Technical Specifications), RDSO मेंटेनेंस टाइम-टेबल और आपातकालीन दिशानिर्देशों (Emergency Protocols) का संकलन विशुद्ध रूप से शैक्षणिक अध्ययन (Educational Purposes), IRTMTC इलाहाबाद के पुराने लेक्चर नोट्स और भारतीय रेलवे के सामान्य मैनुअल के सार्वजनिक संदर्भों पर आधारित है। इसे किसी भी प्रकार की आधिकारिक रेलवे गाइडबुक या अंतिम प्राधिकृत आदेश न माना जाए।
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